06/04/2025
Dear Comrade,
आज बहुत हिम्मत करके तुम्हें ये ख़त लिख रहा हूँ। शायद इसलिए नहीं कि मेरे पास कहने को कुछ ख़ास है, बल्कि इसलिए क्योंकि अब चुप रहना और मुश्किल लगने लगा है।सुबहें अब "सुबह" जैसी नहीं लगतीं। अलार्म बजता है, मगर मैं उठ नहीं पाता। जैसे मेरा शरीर तो जागता है, लेकिन मेरी रूह अब भी किसी गहराई में डूबी रहती है।नींद... अब वो भी नहीं आती। रात भर बस छत को देखता हूँ — बिना किसी ख्याल के, फिर भी दिमाग़ इतना भरा हुआ कि दम घुटता है।कामरेड मेरा शरीर अब सिर्फ़ शरीर बचा है, एहसास नहीं करता। सुन्न हो गया है। घुटनों में दर्द रहता है, दिल की धड़कन तेज़ हो जाती है जैसे कोई भाग रहा हो... पर मैं तो कहीं गया ही नहीं।
हर चीज़ पर एक धुंध छाई है। पढ़ाई नहीं हो रही, ध्यान टिकता नहीं। कुछ भी पढ़ूँ तो सब बेमतलब लगता है।मूड पल-पल में बदल जाता है, और अब तो भावनाएँ भी साथ नहीं देतीं।
ना कोई डर, ना कोई उम्मीद... बस एक खालीपन है। एक ऐसा खाली कमरा, जिसमें मैं गुम होता जा रहा हूँ।आत्मविश्वास? शायद पीछे कहीं छूट गया है।अब ना कोई शारीरिक गतिविधि बची है, ना मन की ऊर्जा।जैसे मैं हूँ... फिर भी नहीं हूँ।
Comrade, कभी-कभी लगता है, मैं सिर्फ़ सो रहा हूँ — लगातार, बिना जगे हुए।जैसे कोई धीमा-सा भ्रम बन गया हूँ, जिसे कोई समझ नहीं पा रहा, और मैं खुद भी नहीं।आज मैं अस्पताल जाऊँगा।कहीं भीतर एक उम्मीद बाकी है कि शायद कुछ बदल जाए।मैं चाहता हूँ लौटना — खुद में, अपने जीवन में, और शायद… फिर तुम्हारे साथ उस जज़्बे में भी जो कभी "हमारा इंकलाब" हुआ करता था।बस दुआ करना कि ये धुंध छँट जाए… और अगर मैं खो भी जाऊँ कुछ वक्त के लिए,तो तुम वहीं रहना, उसी मोड़ पर…जहाँ से वापस जीना शुरू किया जा सके।
तुम्हारा
✍️हसन एक एहसास