Dear Comreds

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Dear Comreds हाथ श्रम करने के लिए ही नहीं होते,
शोषक हाथों को तोड़ने के लिए भी होते है...
-पाश

Dear Comrade,आज बहुत हिम्मत करके तुम्हें ये ख़त लिख रहा हूँ। शायद इसलिए नहीं कि मेरे पास कहने को कुछ ख़ास है, बल्कि इसलि...
06/04/2025

Dear Comrade,

आज बहुत हिम्मत करके तुम्हें ये ख़त लिख रहा हूँ। शायद इसलिए नहीं कि मेरे पास कहने को कुछ ख़ास है, बल्कि इसलिए क्योंकि अब चुप रहना और मुश्किल लगने लगा है।सुबहें अब "सुबह" जैसी नहीं लगतीं। अलार्म बजता है, मगर मैं उठ नहीं पाता। जैसे मेरा शरीर तो जागता है, लेकिन मेरी रूह अब भी किसी गहराई में डूबी रहती है।नींद... अब वो भी नहीं आती। रात भर बस छत को देखता हूँ — बिना किसी ख्याल के, फिर भी दिमाग़ इतना भरा हुआ कि दम घुटता है।कामरेड मेरा शरीर अब सिर्फ़ शरीर बचा है, एहसास नहीं करता। सुन्न हो गया है। घुटनों में दर्द रहता है, दिल की धड़कन तेज़ हो जाती है जैसे कोई भाग रहा हो... पर मैं तो कहीं गया ही नहीं।
हर चीज़ पर एक धुंध छाई है। पढ़ाई नहीं हो रही, ध्यान टिकता नहीं। कुछ भी पढ़ूँ तो सब बेमतलब लगता है।मूड पल-पल में बदल जाता है, और अब तो भावनाएँ भी साथ नहीं देतीं।
ना कोई डर, ना कोई उम्मीद... बस एक खालीपन है। एक ऐसा खाली कमरा, जिसमें मैं गुम होता जा रहा हूँ।आत्मविश्वास? शायद पीछे कहीं छूट गया है।अब ना कोई शारीरिक गतिविधि बची है, ना मन की ऊर्जा।जैसे मैं हूँ... फिर भी नहीं हूँ।
Comrade, कभी-कभी लगता है, मैं सिर्फ़ सो रहा हूँ — लगातार, बिना जगे हुए।जैसे कोई धीमा-सा भ्रम बन गया हूँ, जिसे कोई समझ नहीं पा रहा, और मैं खुद भी नहीं।आज मैं अस्पताल जाऊँगा।कहीं भीतर एक उम्मीद बाकी है कि शायद कुछ बदल जाए।मैं चाहता हूँ लौटना — खुद में, अपने जीवन में, और शायद… फिर तुम्हारे साथ उस जज़्बे में भी जो कभी "हमारा इंकलाब" हुआ करता था।बस दुआ करना कि ये धुंध छँट जाए… और अगर मैं खो भी जाऊँ कुछ वक्त के लिए,तो तुम वहीं रहना, उसी मोड़ पर…जहाँ से वापस जीना शुरू किया जा सके।

तुम्हारा
✍️हसन एक एहसास

Dear Comrade, आज यह खत लिखते हुए शब्द जैसे मेरा साथ छोड़ रहे हैं। दिल भारी है, साँसें बोझिल हैं, और अकेलापन—जैसे मेरी रग...
02/04/2025

Dear Comrade,

आज यह खत लिखते हुए शब्द जैसे मेरा साथ छोड़ रहे हैं। दिल भारी है, साँसें बोझिल हैं, और अकेलापन—जैसे मेरी रगों में घुल गया हो। दुनिया चल रही है, लेकिन मैं कहीं ठहर गया हूँ… एक ऐसे मोड़ पर, जहाँ से न आगे बढ़ सकता हूँ, न पीछे लौट सकता हूँ।
कमरा आज जेल सा लग रहा है। दीवारें चुप हैं, मगर उनकी चुप्पी मुझे चीखती हुई महसूस हो रही है। घड़ी की टिक-टिक भी जैसे मेरे दर्द को गिन रही है। खिड़कियों से झाँकता हूँ, बाहर सब कुछ वैसा ही है—सड़कें, रोशनी, भागती ज़िन्दगी। लेकिन यह शहर मुझे अपने भीतर घुला नहीं सका, न ही मैं इसे अपना बना सका।

आज बहुत कोशिश की कि इस उदासी से भाग सकूँ। बाहर गया, राहों पर भटका, लेकिन हर चेहरा अजनबी सा लगा। दुनिया की भीड़ में भी मैं अकेला था, जैसे एक परछाईं जिसे कोई नहीं देखता। हर मोड़ पर, हर गली में, यह एहसास और गहराता गया कि मेरा अपना कोई नहीं।
फिर सोचा, किसी को फोन कर लूँ, शायद बातों से मन हल्का हो जाए। पर स्क्रीन पर कोई नाम नहीं था, जिसे देखकर दिल कहता—"हाँ, यह सुनेगा मुझे।" और तब अहसास हुआ कि असल अकेलापन यही होता है—जब न सुनने वाला कोई हो, न पुकारने की हिम्मत बचे।

कॉमरेड, यह तन्हाई अब दर्द से आगे बढ़कर एक सज़ा बन गई है। हर रात, हर खामोशी, हर उदास सुबह… सब मिलकर मुझे भीतर से तोड़ रहे हैं। लगता है, इस अंधेरे का कोई अंत नहीं। बस एक अंतहीन सन्नाटा, जिसमें मेरी हर चीख खो जाती है।
शायद यह खत भी किसी सन्नाटे में खो जाएगा। शायद यह शब्द भी मेरे अकेलेपन की तरह किसी कोने में दब जाएंगे। लेकिन अगर तुम इसे पढ़ रहे हो, तो बस इतना जान लो—मैं आज बहुत टूटा हुआ हूँ। और शायद, इस बार उठ न सकूँ…

तुम्हारा कॉमरेड

Dear Comradeरिश्तों का तानाबाना बेहद नाजुक होता है। हम सोचते हैं कि जो लोग हमारे करीब हैं, वो हमेशा वैसे ही रहेंगे—बिना ...
01/04/2025

Dear Comrade

रिश्तों का तानाबाना बेहद नाजुक होता है। हम सोचते हैं कि जो लोग हमारे करीब हैं, वो हमेशा वैसे ही रहेंगे—बिना बदले, बिना हटे। मगर हकीकत अक्सर हमारी उम्मीदों से परे होती है। हम जिन्हें अपनी दुनिया मानते हैं, वही लोग कभी-कभी हमें यह एहसास दिला जाते हैं कि कोई भी किसी के लिए अपरिहार्य नहीं होता। हम अक्सर सोचते हैं कि हमारा रिश्ता सबसे खास है, हमारी जगह कोई नहीं ले सकता, या फिर सामने वाला हमें जितना हम उसे समझते हैं, उतना ही समझता होगा। लेकिन असलियत कुछ और ही होती है। दुनिया में हर कोई बदलता है, परिस्थितियां बदलती हैं, और रिश्ते भी।

रिश्तों में सबसे ज्यादा तकलीफ तब होती है, जब हमारी उम्मीदें टूटती हैं। हम जितना ज्यादा उम्मीद लगाते हैं, उतनी ही ज्यादा चोट खाते हैं। हम सोचते हैं कि जो हमने दिया है, वही हमें लौटकर मिलेगा। मगर सच यह है कि कोई किसी के लिए इतना ज़रूरी नहीं होता कि उसके बिना दुनिया रुक जाए।हर इंसान अपनी प्राथमिकताओं के हिसाब से जीता है। हमें लगता है कि हम किसी के लिए सबसे जरूरी हैं, लेकिन कभी-कभी वो हमें एक विकल्प से ज्यादा कुछ नहीं समझते। यही कारण है कि जब कोई दूर चला जाता है या बदल जाता है, तो हमें दर्द होता है। मगर यह दर्द खुद हमारी ही बनाई हुई उम्मीदों का नतीजा होता है।

इसी जगह पर एक सच्चे कॉमरेड की अहमियत समझ में आती है। एक कॉमरेड सिर्फ वो नहीं होता जो आपके अच्छे दिनों में हंसकर साथ दे, बल्कि वो होता है जो बुरे दिनों में भी बिना किसी शर्त के आपके साथ खड़ा रहे। वो जो आपको तब भी समझे, जब पूरी दुनिया आपको गलत ठहराए।कॉमरेडशिप का असली मतलब ही यही है—बिना स्वार्थ, बिना उम्मीद, सिर्फ भरोसे और समझदारी का रिश्ता। ऐसे रिश्ते में धोखा नहीं होता, क्योंकि इसमें अपेक्षाएं नहीं होतीं। इसमें साथ निभाने का वादा होता है, मगर किसी कीमत पर खुद को खोने का डर नहीं।
शायद नहीं। क्योंकि दुनिया में हर कोई इतना भावनात्मक रूप से जुड़ा नहीं होता। कुछ लोग सिर्फ मौकों के लिए रिश्ते बनाते हैं, कुछ समय बिताने के लिए, तो कुछ सिर्फ अपने फायदे के लिए। मगर अगर आपको कोई ऐसा मिल जाए, जो बिना किसी स्वार्थ के, सिर्फ आपके लिए आपके साथ खड़ा हो, तो उसे कभी मत छोड़िए।

क्योंकि रिश्तों की दुनिया में दोस्त बहुत मिलते हैं, मगर सच्चे कॉमरेड बहुत कम।ख़ैर, अब इस सच को भी अपना लेते हैं...

अब जब हमें यह समझ आ गया कि हर रिश्ता वैसा नहीं होता, जैसा हम सोचते हैं, तो हमें खुद को इस दर्द से उबारना भी सीखना होगा। हमें यह समझना होगा कि उम्मीदें जितनी कम रखेंगे, तकलीफ भी उतनी ही कम होगी।अगर आपको कोई ऐसा मिला है, जो हर हाल में आपका साथ देता है, जो आपकी गलतियों पर आपको टोकता है, मगर फिर भी आपका हाथ नहीं छोड़ता—तो उसे Dear Comrade कहने में हिचकिचाइए मत।
क्योंकि यही वो रिश्ता है जो असली है, बाकी तो सब बस वक्त के साथ बदल जाने वाली कहानियां हैं।

तुम्हारा कॉमरेड
✍️ हसन एक एहसास

Dear Comradeजानते हो, इस दौर में कितना दर्द भरा पड़ा है?हर इंसान के अंदर एक बेचैनी पलती है,जिसे वो खुद से भी छुपाए फिरता...
31/03/2025

Dear Comrade

जानते हो, इस दौर में कितना दर्द भरा पड़ा है?हर इंसान के अंदर एक बेचैनी पलती है,जिसे वो खुद से भी छुपाए फिरता है।लोग हंसते हैं, महफ़िलों में शामिल होते हैं,ख़ुद को बेफ़िक्र दिखाने की कोशिश करते हैं,मगर जब रात ढलती है और अकेलापन घेरता है,
तो अंदर कहीं कुछ टूटने लगता है।तुम्हें देखकर समझ आता है कि
जो इंसान सबसे शांत दिखता है,उसके भीतर सबसे ज़्यादा हलचल होती है।जो सबसे कम बोलता है,वो अपने अंदर पूरी दुनिया को समेटे होता है।तुम उन चंद लोगों में से हो,जो जब अपनी बात कहते हैं,तो उसमें सिर्फ़ अल्फ़ाज़ नहीं होते,बल्कि एहसासों का एक समंदर बहता है।

मैंने तुम्हें देखा है, सुना है, महसूस किया है।तुम्हारी आँखों में वो कहानियाँ हैं,जो शायद ही किसी ने पढ़ी हों।तुम जब अपने जज़्बात बयान करते हो,तो कितनी मजबूती से—जैसे कोई दरख़्त आँधियों में भी अडिग खड़ा हो।और कितनी कोमलता से—जैसे कोई फूल टूटकर भी अपनी महक नहीं खोता।

मगर इस दुनिया को सिर्फ़ बाहर की चीज़ें दिखती हैं।लोग तुम्हारी सख़्ती को देखते हैं,तुम्हारी ठहरी हुई बातों को,तुम्हारे बेपरवाह से नज़र आने वाले फैसलों को,पर वो ये नहीं समझते कि हर बार जब तुम किसी रिश्ते को एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ देते हो,तो तुम्हारा भी एक हिस्सा वहीं रह जाता है।तुम्हारी खामोशी में जितनी मोहब्बत छुपी होती है,शायद इस शोर भरी दुनिया में उतनी मोहब्बत किसी के पास नहीं।

तुम्हें सुनते हुए मुझे एहसास हुआ,कि इंसान जब अंदर से सच में टूट जाता है,तो वो शिकायत करना छोड़ देता है।फिर वो सिर्फ़ मुस्कुराता है,कुछ गहरी बातें करता है,और फिर एक दिन चुपचाप आगे बढ़ जाता है।तुम भी यही करते हो,रिश्तों को जबरदस्ती निभाने से बेहतर उन्हें एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ देना समझते हो।शायद लोग तुम्हें गलत समझते होंगे,पर मैं जानता हूँ,तुम्हारी ठहराव भरी आँखों में कितनी कहानियाँ दबी हैं।तुम्हारी खामोशी भी उतनी ही गहरी है जितनी तुम्हारी बातें।तुम्हारी सख़्ती के पीछे एक नर्म दिल है,जो शायद अब थक चुका है,या शायद दुनिया से बहुत आगे निकल चुका है।

बस इतना कहना चाहता हूँ,कि जिस तरह तुम दूसरों के एहसासों को संभालते हो,उसी तरह कभी खुद को भी संभाल लेना।क्योंकि दुनिया हर दर्द को समझने के लिए नहीं बनी,मगर तुम जैसे लोग…
वो दर्द को भी मोहब्बत की तरह संभाल लेते हैं।

तुम्हारा कॉमरेड
✍️हसन ' एक एहसास '

31 - 03 -2025

29/03/2025

Dear Comrade,

आजकल जब मैं यूनिवर्सिटी के गलियारों में चलता हूँ, तो ऐसा लगता है जैसे ये मुझसे बातें कर रही है। हर बढ़ती फीस, हर निलंबित छात्र, हर दबी हुई आवाज़ मुझे किसी अनकही साजिश का हिस्सा लगती है। मैं जब अख़बार में पढ़ता हूँ कि फिर किसी यूनिवर्सिटी में पुलिस घुस आई, फिर किसी छात्र को सिर्फ़ सवाल पूछने के लिए दबा दिया गया—तब मुझे एहसास होता है कि हमारी यूनिवर्सिटीज़ चीख रही हैं।
मैं सोचता था, यहाँ ज्ञान मिलेगा, नए विचार जन्म लेंगे, सोच को परवाज़ मिलेगी। लेकिन अब... दीवारें ऊँची हो रही हैं, मगर सोच को बौना किया जा रहा है। इमारतें चमक रही हैं, मगर विचारों को अंधेरे में धकेला जा रहा है। फीस आसमान छू रही है, मगर बोलने की आज़ादी ज़मीन में गाड़ी जा रही है।
कॉमरेड, जब मैंने पहली बार यहाँ कदम रखा था, तो सोचा था कि यह जगह मुझे मेरे उत्तर देगी। लेकिन आज, सवाल पूछना ही अपराध बन चुका है। मैंने चाहा कि मेरी यूनिवर्सिटी मुझे सिखाए कि सोचो, सवाल करो, लिखो... पर अब जब हम सोचते हैं, तो हमें बस मान लेने के लिए मजबूर किया जाता है। जब हम सवाल करते हैं, तो हमें खामोश किया जाता है। जब हम लिखते हैं, तो हमारे शब्दों पर पाबंदी लगा दी जाती है।पर क्या सच में हमारे शब्दों को रोका जा सकता है? क्या हमारे विचारों को कैद किया जा सकता है? क्या हम इतने डरपोक हो चुके हैं कि अब सिर्फ़ सहते रहेंगे?

कॉमरेड, अगर हम अब भी चुप रहे, तो हमारी यूनिवर्सिटीज़ सिर्फ़ ईंट-पत्थर की इमारत बनकर रह जाएँगी। वो जगह, जहाँ कभी इंक़लाब जन्म लेता था, अब बस एक खामोश बस्ती बन जाएगी। इसलिए, हमें बोलना होगा। हमें लड़ना होगा। हमें बचाना होगा—इस यूनिवर्सिटी को, इस आज़ादी को, इस क्रांति को।

याद रखना, यह सिर्फ़ एक इमारत नहीं, एक मुकम्मल इंक़लाब है।

तुम्हार कॉमरेड

Dear Comrade,इस दुनिया में सब भाग रहे हैं, लेकिन कोई नहीं जानता कि कहाँ जाना है।कोई दौलत के पीछे, कोई इज़्ज़त के पीछे,तो...
26/03/2025

Dear Comrade,

इस दुनिया में सब भाग रहे हैं, लेकिन कोई नहीं जानता कि कहाँ जाना है।
कोई दौलत के पीछे, कोई इज़्ज़त के पीछे,तो कोई बस इसलिए भाग रहा है क्योंकि बाक़ी सब भाग रहे हैं।

मुझे कभी-कभी डर लगता है कि कहीं हम भी उसी भीड़ का हिस्सा तो नहीं बन रहे?जहाँ हर कोई दौड़ रहा है, लेकिन कोई ये नहीं पूछता कि आखिर किस मंज़िल तक जाना है। हम बचपन में सोचते थे कि बड़े होकर सुकून मिलेगा,
फिर जवानी में सोचते हैं कि बस थोड़ा और संघर्ष, फिर सब ठीक हो जाएगा।
पर क्या सुकून कभी आता भी है, या बस एक और छलावा बनकर रह जाता है?

"रास्ते भागते रहे, मैं वहीं ठहर गया,
जहाँ शोर किसी घटा की ख़ामोशी में था।

"कॉमरेड, यह दुनिया एक बाज़ार की तरह है,जहाँ हर चीज़ बिकती है—ख़्वाब, मोहब्बत, वक़्त और यहाँ तक कि इंसान भी।हमें इस बाज़ार का हिस्सा बनाया जाता है,जहाँ हमारी क़ीमत हमारे बैंक बैलेंस से तय होती है।अगर जेब में पैसे हैं, तो लोग तुम्हें सुनेंगे,अगर नहीं, तो तुम्हारी आवाज़ भी भीड़ में गुम हो जाएगी।

"जो बिखरा धूप में और बहता था पानी में था,कौन समझता वो साया जो मेरी ख़ामोशी में था।"

लेकिन क्या वाकई पैसा ही सबकुछ है?
क्या दुनिया के सारे सवालों का जवाब सिर्फ़ नोटों में छुपा है?या फिर सुकून कहीं और भी है—किसी ठहराव में, किसी ख़ामोशी में,किसी ऐसे शहर में जो पराया नहीं, बल्कि अपना हो।
कॉमरेड, पैसा कमाना ज़रूरी है, मगर उससे भी ज़रूरी है खुद को न खोना।
अगर कभी लगे कि दुनिया तुम्हें अपने हिसाब से ढाल रही है,तो एक बार ठहरकर सोचो

"क्या मैं अपने हालात से बड़ा हूँ, या ये दुनिया मुझसे बड़ी है?"तुम्हें जवाब मिल जाएगा।

तुम्हारा कॉमरेड

डियर कामरेड रात की तन्हाइयाँ अक्सर तुम्हारी यादों की चादर ओढ़कर मेरे दिल के आँगन में उतर आती हैं। किताबों के पन्ने पलटते...
25/03/2025

डियर कामरेड

रात की तन्हाइयाँ अक्सर तुम्हारी यादों की चादर ओढ़कर मेरे दिल के आँगन में उतर आती हैं। किताबों के पन्ने पलटते हुए सोचा करता हूँ, काश! ज़िन्दगी भी यूँ पलट जाती, जैसे एक पुरानी किताब की कोई भूली-बिसरी दास्तान। लेकिन अफ़सोस, हक़ीक़त के पन्ने इतने आसान नहीं होते कि एक झटके में पलट दिए जाएँ।तुम्हारे साथ गुज़रे लम्हे आज भी किसी नज़्म की तरह दिल में दर्ज हैं। वो बहसें, वो हँसी, वो खामोश इकरार—सब कुछ आज भी उसी तरह ताज़ा है, जैसे किसी शाम की मदहोश करने वाली हवा। लेकिन शायद तक़दीर के पास हमारी कहानी का कोई दूसरा मक़सद था… एक ऐसा अंजाम, जिसे हमने चाहकर भी नहीं बदला।

कुछ लोग सिर्फ़ मतलब के लिए करीब आते हैं, और फिर वैसे ही दूर चले जाते हैं, जैसे किनारा छोड़कर लहरें लौट जाती हैं। मगर तुम… तुम उन लहरों की तरह नहीं थे। तुम वो साहिल थे, जिस पर ठहरने का मन करता था, वो साया थे, जो धूप में सुकून देता था।कभी-कभी सोचता हूँ, लोग दिल को कत्ल करके हासिल करने की होड़ में लगे हैं, मगर काश! कोई इसे अपना बनाकर भी देखता। इस मतलबी दुनिया में कोई बे-मतलब सिर्फ़ हाल पूछने भी आ जाता, तो शायद दिल को थोड़ा सुकून मिल जाता।
सुना है, शरीफ़ों की महफ़िल में हमारी बातें जगह नहीं पातीं, मगर जो बातें एक शराबी की जुबां से निकलकर भी असर छोड़ जाएँ, वो कहीं ज्यादा सच्ची लगती हैं।

ज़िन्दगी तो हमने हँसते-हँसते गुज़ार दी, लोगों को खुशियाँ भी बाँट दीं। मगर कहीं ऐसा न हो कि हमारी मौत पर भी किसी के होंठों पर खुशी आ जाए... बस यही ख्याल बेचैन कर देता है।अगर कभी इस ख़त के अल्फ़ाज़ तक तुम तक पहुँचें, तो जान लेना, कोई आज भी दूर बैठा, किसी शाम के धुंधलके में, तुम्हारी यादों की रोशनी में जी रहा है।

तुम्हारा,
एक हमदर्द, एक हमसफ़र, एक बिछड़ा हुआ कॉमरेड…

डियर कॉमरेड तुम्हें याद है, हमने एक बार कहा था कि मुहब्बत सबसे पाक जज़्बा है? कि यह ज़िन्दगी को नई रौशनी देता है, साँसों...
25/03/2025

डियर कॉमरेड

तुम्हें याद है, हमने एक बार कहा था कि मुहब्बत सबसे पाक जज़्बा है? कि यह ज़िन्दगी को नई रौशनी देता है, साँसों को मायने देता है? मगर आज… इस दुनिया में मुहब्बत का अंजाम क्या रह गया है?

अब इश्क़ की दास्तानें किताबों में नहीं, अख़बारों में लहू से लिखी जा रही हैं। कभी किसी महबूब का जिस्म सूटकेस में मिलता है, कभी फ्रीज़ में, कभी ड्रम में, कभी प्रेशर कुकर में। यह वही इश्क़ है, जिसे कभी चाँद-तारों की सौगंध दी जाती थी? क्या यही मुहब्बत का अंजाम था, जो हमने सपनों में देखा था? हम जैसे लोग, जो मुहब्बत में सिर्फ़ लफ्ज़ नहीं, एहसास तलाशते हैं, जो इसे बंदिशों से परे एक आज़ाद परवाज़ समझते हैं—अब सहमे हुए हैं। सवाल ये नहीं कि हमें किससे डर लग रहा है, सवाल ये है कि हम कहाँ जाएँ?

कहा जाता है कि मुहब्बत करने वालों के लिए अलग से दुनिया नहीं बनाई जा सकती। मगर जब इस दुनिया में मुहब्बत महज़ एक जुर्म बन जाए, तो हम कहाँ जाएँ, कॉमरेड? क्या हमें भी किसी दिन किसी ठंडे, बे-रूह फ्रीज़ में सिमट जाना होगा? या किसी सूटकेस में मुहब्बत की आख़िरी चीख़ बनकर दफ़्न हो जाना होगा?

कभी-कभी सोचता हूँ, इस ज़माने में मुहब्बत करना बहादुरी है या बेवकूफ़ी? मगर फिर दिल कहता है—अगर मुहब्बत बेवकूफ़ी है, तो यही बेवकूफ़ी आख़िर तक निभानी है। जो लोग इस दुनिया को इतना बेरहम बना रहे हैं, उनके आगे हारना मुमकिन नहीं। हमें मुहब्बत को ज़िन्दा रखना है—कम से कम अपनी साँसों में, अपनी रूह में, अपनी लड़ाई में।

अगर हम मिट भी जाएँ, तो कोई बाकी बचे जो फिर से इश्क़ पर यक़ीन कर सके। इस खौफनाक दौर में, मुहब्बत को मारे जाने नहीं देना है, कॉमरेड। क्योंकि जिस दिन दुनिया से मुहब्बत चली गई, उस दिन इंसानियत भी मर जाएगी।

तुम्हारा कॉमरेड
एक मुहब्बत को जीने वाला इंसान।

डियर कॉमरेड मुझे नहीं पता तुम कहाँ हो, और मेरा ये ख़त तुम्हें कब और किस हाल में मिल रहा है… पर फिर भी, ये अल्फ़ाज़ तुम्ह...
25/03/2025

डियर कॉमरेड

मुझे नहीं पता तुम कहाँ हो, और मेरा ये ख़त तुम्हें कब और किस हाल में मिल रहा है… पर फिर भी, ये अल्फ़ाज़ तुम्हारे लिए हैं।

कभी-कभी ज़िन्दगी हमें ऐसे मोड़ पर ले आती है, जहाँ हर रास्ता वीरान लगता है, हर दरवाज़ा बंद और हर आवाज़ ख़ामोश। ऐसा लगता है कि ये दुनिया हमारे लिए बनी ही नहीं… कि शायद हम ही ग़लत हैं, शायद हमारी तक़लीफ़ों की कोई कीमत नहीं, शायद हमारी मौजूदगी का कोई मतलब नहीं। और सबसे दर्दनाक बात ये होती है कि लोग कहते हैं—"सब ठीक हो जाएगा," जबकि हमें पता होता है कि कुछ भी पहले जैसा नहीं होगा।

अगर तुम आज किसी गहरी उदासी में हो, अगर तुम्हारे सीने में एक ऐसा दर्द छुपा है, जो किसी से कह नहीं सकते, अगर तुम्हें लगता है कि कोई तुम्हें नहीं समझ सकता—तो बस इतना जान लो, कहीं न कहीं, कोई और भी ठीक यही महसूस कर रहा है। कोई और भी है जो रातों को जागकर अपनी टूटन समेट रहा है, जो किसी कोने में बैठकर रो रहा है और जिसे भी इस दुनिया की चकाचौंध फीकी लगती है।शायद तुम्हें लगे कि अब और सहन नहीं होगा, कि अब कोई उम्मीद नहीं बची… पर एक बार, सिर्फ़ एक बार, ये सोचना कि अगर इस दर्द को पार कर लिया, तो आगे क्या हो सकता है? क्या पता, एक दिन तुम मुस्कुराने लगो, और तुम्हारी ये मुस्कान किसी और के लिए उम्मीद बन जाए।

क्योंकि, कॉमरेड, हम सिर्फ़ अपने लिए नहीं जीते। हम उन सबके लिए जीते हैं, जो हमें देख रहे हैं, जो हमारे वजूद से जुड़ते हैं, जो हमारी कहानी से हिम्मत पाते हैं। अगर तुम आज इस दर्द को सहकर ज़िंदा रह गए, तो हो सकता है कल कोई और तुम्हारी कहानी सुनकर ज़िन्दा रहने का फैसला कर ले।

मत हारो, कॉमरेड। दुनिया बेरहम हो सकती है, लेकिन तुम्हारा दिल अब भी धड़क रहा है। और जब तक वो धड़क रहा है, तब तक तुम्हारी कहानी का अंत नहीं लिखा गया।

तुम्हारा कामरेड
एक अनजान हमदर्द

डियर कॉमरेड आज कलम उठाई है, मगर समझ नहीं आ रहा कि इसे शिकवा लिखूँ या इज़हार-ए-मुहब्बत… तुम्हें अपना दर्द सुनाऊँ या अपनी ...
25/03/2025

डियर कॉमरेड

आज कलम उठाई है, मगर समझ नहीं आ रहा कि इसे शिकवा लिखूँ या इज़हार-ए-मुहब्बत… तुम्हें अपना दर्द सुनाऊँ या अपनी चाहत का पैग़ाम दूँ… अपने अल्फ़ाज़ों को रोने दूँ या हँसी में छुपा दूँ । कभी-कभी सोचता हूँ, क्या मुहब्बत वाक़ई इतनी नाज़ुक होती है कि उसे हर रोज़ शब्दों का सहारा देना पड़े? क्या कोई ऐसा भी होता है जो बिना कहे सब समझ लेता है? अगर होता है, तो क्या तुम वैसे हो, कॉमरेड?

मैंने सुना था, जब दो रूहें एक-दूसरे को समझती हैं, तो उन्हें लफ्ज़ों की ज़रूरत नहीं होती। मगर अफ़सोस, इस दौर में लोग अल्फ़ाज़ सुनते हैं, मगर जज़्बात नहीं पढ़ते… खामोशी देखते हैं, मगर बेचैनी नहीं समझते…कभी सोचता हूँ, तुमसे नाराज़ रहूँ, कोई लफ़्ज़ भी न कहूँ, बस देखूँ कि क्या तुम मेरी ख़ामोशी की तासीर को महसूस कर पाओगे? अगर मैं कुछ न लिखूँ, कुछ न कहूँ, तो क्या तुम मेरी धड़कनों में दबी हुई सदाएँ सुन सकोगी? कभी मेरी आँखों में झाँककर देखना, वहाँ वो सब मिलेगा जो लफ्ज़ों में नहीं कहा जा सकता।

कभी मेरे काँपते हाथों को थामकर महसूस करना, वहाँ वो सिहरन मिलेगी जो मेरी ज़ुबान कह नहीं सकती। कभी मेरे सर को अपने सीने पर रखने देना, शायद वहाँ मेरी वो सिसकियाँ सुन सको, जो इस दुनिया के शोर में कहीं खो गई हैं।

कहो कॉमरेड, क्या तुम मेरे बिना कहे मेरी मुहब्बत पढ़ पाओगी?
या इसे भी किसी ख़त में लिखकर तुम्हें भेजना होगा—ताकि तुम इसे पढ़ो और फिर मुझे देखकर कहो—

"अब कुछ मत कहो… सब समझ गयी हूँ!"

तुम्हारा कॉमरेड
खामोश मगर तुम्हारा ही…

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Thokar No 8
Delhi

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