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31/03/2026
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के महासचिव एम. ए. बेबी ने आज प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखा है, जिसमें 'विदेशी अंश...
30/03/2026

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के महासचिव एम. ए. बेबी ने आज प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखा है, जिसमें 'विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026' को तत्काल रद्द करने की मांग की गई है। हम इस पत्र का मूल पाठ प्रकाशन के लिए जारी कर रहे हैं।

प्रेषित,

श्री नरेंद्र मोदी जी,
माननीय प्रधानमंत्री,
भारत सरकार,
नई दिल्ली।

विषय: 'विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026' को तत्काल रद्द करने की मांग

प्रिय श्री मोदी जी,

मैं आपको 'विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026' जिसे 26 मार्च, 2026 को लोकसभा में पेश किया गया था, के संबंध में गहरी चिंता व्यक्त करते हुए यह पत्र लिख रहा हूँ। हम इस विधेयक में निहित प्रावधानों पर अपनी कड़ी से कड़ी आपत्ति दर्ज कराने के लिए विवश हैं। हम संवैधानिक नैतिकता और लोकतांत्रिक सिद्धांतों के हित में यह मांग करते हैं कि सरकार इस कानून को तत्काल प्रभाव से रद्द करे।

हम इस बात को स्वीकार करते हैं कि पारदर्शिता और राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से विदेशी अंशदान (फंड) के प्रवाह को विनियमित करने का विशेषाधिकार राज्य के पास है। तथापि, प्रस्तावित संशोधन 'उचित विनियमन' की सीमा को पार करके 'अत्यधिक नियंत्रण' की श्रेणी में आ जाते हैं, जिससे कार्यपालिका को अपनी अधिकार-सीमा से बाहर जाकर हस्तक्षेप करने का अवसर मिल जाता है।

*1. 'नामित प्राधिकारी' के माध्यम से संपत्ति ज़ब्त करने की असीमित शक्ति:* यह विधेयक एक शक्तिशाली 'नामित प्राधिकारी' (Designated Authority) के गठन का प्रस्ताव करता है, जिसे उन NGO की संपत्तियों को अपने अधिकार में लेने, उनका प्रबंधन करने और उनका निपटान करने का अधिकार होगा, जिनकी विदेशी फंड से निर्मित संपत्तियों का पंजीकरण निलंबित, रद्द कर दिया गया है, अथवा जिनका नवीनीकरण नहीं किया गया है। यह एक अत्यंत कठोर प्रावधान है, जो नागरिक समाज संगठनों के अस्तित्व के लिए ही खतरा उत्पन्न करता है। अनेक मामलों में, संपत्तियों का निर्माण घरेलू और विदेशी, दोनों प्रकार के फंड के मिश्रण से किया जाता है। प्रस्तावित 'पूर्ण अधिग्रहण' (blanket takeover) के प्रावधान में स्थानीय स्रोतों से अर्जित संपत्तियों की सुरक्षा हेतु कोई व्यवस्था नहीं की गई है। कार्यपालिका को, बिना किसी पर्याप्त न्यायिक निगरानी के, ऐसी संपत्तियों को स्थायी रूप से अपने अधिकार में लेने की शक्ति प्रदान करना एक दंडात्मक कार्रवाई के समान है, जो कि 'विनियमनकारी निगरानी' के दायरे से कहीं अधिक विस्तृत है।
*2. अत्यधिक सरकारी नियंत्रण और संघवाद का क्षरण:* यह बिल राज्य सरकारों को विदेशी अंशदान विनियमन कानून (FCRA) से संबंधित कोई भी जाँच शुरू करने के लिए केंद्र सरकार से पहले मंज़ूरी लेने को अनिवार्य शर्त बनाता है। यह प्रावधान हमारे संविधान में निहित संघीय ढाँचे को कमज़ोर करता है। कानून प्रवर्तन और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना समवर्ती विषय हैं; राज्य की जाँच शक्तियों पर केंद्रीय वीटो लगाना शक्ति का केंद्रीकरण करता है, जो संघवाद के विपरीत है।

*3. विवेकाधीन शक्तियाँ जो व्यक्तिपरकता और मनमानी की ओर ले जाती हैं:* यह बिल 'नामित प्राधिकारी' (Designated Authority) को अत्यधिक विवेकाधीन शक्तियाँ, बिना उनके दुरुपयोग के खिलाफ पर्याप्त सुरक्षा उपाय निर्धारित किए, प्रदान करता है। इससे वहां पर डर का माहौल बनता है, जहाँ मानवाधिकार, पर्यावरण संरक्षण और अल्पसंख्यक कल्याण जैसे क्षेत्रों में काम करने वाले संगठन खुद को कानून के उल्लंघन के लिए नहीं, बल्कि सरकार की नीतियों के खिलाफ असहमति व्यक्त करने के लिए निशाना बनते हुए पा सकते हैं।

गृह मंत्रालय के पोर्टल के अनुसार, जहाँ वर्तमान में लगभग 15,000 संगठन पंजीकृत हैं, वहीं लगभग 20,711 संगठनों का पंजीकरण रद्द कर दिया गया है। विदेशी अंशदान विनियमन कानून (FCRA) को अब विनियमन के एक साधन के रूप में कम, बल्कि असहमति को दबाने और सरकारी नीतियों पर सवाल उठाने वाले संगठनों को परेशान करने के लिए एक राजनीतिक हथियार के रूप में अधिक देखा जा रहा है।

*4. अल्पसंख्यक संस्थानों पर प्रभाव:* यह बिल अल्पसंख्यक संस्थानों को एक अत्यधिक कठोर नियामक ढाँचे के तहत रखता है, जिससे उनके कामकाज में अनुचित हस्तक्षेप के बारे में गंभीर चिंताएँ पैदा होती हैं। ऐसे प्रावधान जो सरकार को लाइसेंस के नवीनीकरण से इनकार करने या उन्हें रद्द करने, और इन संस्थानों के धन और संपत्तियों पर नियंत्रण रखने की अनुमति देते हैं, संवैधानिक रूप से गारंटीकृत स्वतंत्रताओं के लिए सीधा खतरा हैं - जिसमें धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यक संस्थानों का प्रबंधन करने का अधिकार भी शामिल है।

*5. परामर्श का अभाव:* हम खेद के साथ यह नोट करते हैं कि यह बिल विपक्षी सांसदों द्वारा इसका विरोध किया जाने के बावजूद एकतरफा रूप से पेश किया गया था। ऐसा कानून जो मौलिक अधिकारों को इतनी गहराई से प्रभावित करता है, उसके लिए व्यापक परामर्श और विचार-विमर्श की आवश्यकता होती है। पर्याप्त परामर्श के बिना ऐसे बिल को पेश करना लोकतांत्रिक कानून-निर्माण की सहभागी प्रकृति की उपेक्षा को दर्शाता है।
गैर-सरकारी संगठनों के प्रति सरकार की शत्रुता 2016 से विदेशी अंशदान विनियमन कानून (FCRA) में किए गए संशोधनों की श्रृंखला में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। इन संशोधनों का कुल प्रभाव यह रहा है कि एनजीओ (NGOs) का कामकाज लगातार मुश्किल होता गया है। 2026 का विधेयक इसी प्रवृत्ति की निरंतरता है, जो उन संगठनों को प्रभावी रूप से 'खत्म' करने का खतरा पैदा करता है, जो धर्मार्थ, शैक्षिक या मानवाधिकार कार्यों के लिए वैध विदेशी योगदान स्वीकार करते हैं।

किसी कानून का पालन करने की शर्त, सरकार की राजनीतिक विचारधारा के अनुरूप चलने की शर्त नहीं बननी चाहिए। कार्यपालिका के हाथों में अत्यधिक शक्ति एक ऐसा माहौल बनाती है, जहाँ सामाजिक क्षेत्र में स्वतंत्र विचारों को दबा दिया जाता है।

उपरोक्त बातों की पृष्ठभूमि में, हम सरकार से यह मांग करते हैं कि:

1. वह तत्काल 'विदेशी योगदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026' को रद्द करे;

2. वह उन सभी विवादास्पद प्रावधानों को वापस ले, जो कार्यपालिका को बिना किसी न्यायिक निगरानी के संपत्तियों को जब्त करने और उनका प्रबंधन करने का अधिकार देते हैं;

3. वह यह सुनिश्चित करे कि भविष्य का कोई भी विनियामक ढांचा, संगठन बनाने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की संवैधानिक गारंटियों के अनुरूप हो; और

4. वह विदेशी अंशदान विनियमन कानून (FCRA) में कोई भी और संशोधन पेश करने से पहले नागरिक समाज, अल्पसंख्यक संस्थानों और कानूनी विशेषज्ञों के साथ व्यापक परामर्श करे।

हम आपकी सकारात्मक प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा कर रहे हैं और आपसे आग्रह करते हैं कि आप तत्काल सुधारात्मक कार्रवाई करें।

भवदीय,
एम. ए. बेबी
(महासचिव)

Communist Party of India (Marxist)
CPIM Kerala
Dear Comrade
CPIM RajasthanAmra Ram

04/01/2026
27/11/2025
किसान मजदूर विरोधी नीतियों के खिलाफ संयुक्त किसान मोर्चा व केंद्रीय श्रम संगठनों की तरफ से राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम के तह...
26/11/2025

किसान मजदूर विरोधी नीतियों के खिलाफ संयुक्त किसान मोर्चा व केंद्रीय श्रम संगठनों की तरफ से राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम के तहत जिला कलेक्ट्रेट पर दिया धरना
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झुंझुनूं. 26 नवंबर. संयुक्त किसान मोर्चा के ऐतिहासिक किसान आन्दोलन की पांचवीं वर्षगांठ पर केंद्र सरकार की किसान मजदूर विरोधी नीतियों के खिलाफ राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम के तहत आज झुंझुनूं जिला कलेक्ट्रेट पर धरना दिया जिसमें संयुक्त किसान मोर्चा के घटक संगठनों अखिल भारतीय किसान सभा, अखिल भारतीय किसान महासभा, क्रांतिकारी किसान यूनियन,जय किसान आंदोलन व केंद्रीय श्रम संगठनों की तरफ से घटक संगठनों सीटू,एटक व ऐक्टू के कार्यकर्ताओं की भागीदारी रही ।

एम एस पी सी2+ 50 प्रतिशत लाभ से तय कर एम एस पी को कानूनी गारंटी देने,असमय बारिस की वजह से वर्तमान 17 प्रतिशत फसलों में नमी को 22 प्रतिशत करने, किसानों और कृषि मजदूरों के लिए व्यापक कर्ज माफी योजना घोषित करने, किसानों को ब्याज मुक्त ऋण देने,चार श्रम संहिता कानूनों को रद्द करने,बिजली सुधार विधेयक 2025 वापस लेने, बिजली का नीजिकरण रोकने,स्मार्ट मीटरों पर रोक लगाने,सभी परिवारों को 300 युनिट प्रतिमाह और खेती में बिजली मुफ्त देने, चार श्रम संहिता कानूनों को रद्द करने, सार्वजनिक उपक्रम के निजीकरण को समाप्त करने, न्यूनतम वेतन 26000 रूपए प्रतिमाह करने तथा असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों सहित सभी कृषि मजदूरों व गरीब किसानों को 10000 रूपए प्रतिमाह पेंशन देने,मनरेगा बजट बढ़ाकर 200 दिन काम की गारंटी तथा 700 रूपए दैनिक मजदूरी तय करने, किसानों व मजदूरों के हितों को नुक्सान पहुंचाने वाले एफ टी ए समझौता को मंजूर न करने,पी डी एस व एफ सी आई को संरक्षित करने,84000 करोड़ रुपए की खाद सब्सिडी बहाल करने,जनता पर बुलडोजर राज समाप्त करने, पुनर्वास व पुनर्स्थापन के बिना भूमिहीनों व गरीबों का विस्थापन रोकने,बीज विधेयक 2025, राष्ट्रीय सहकारिता नीति, नई शिक्षा नीति व कृषि विपणन पर राष्ट्रीय नीति रूपरेखा वापस लेने, यमुना नहर का पानी झुंझुनूं जिला में सिघ्र लाने व खेतड़ी कोपर काम्प्लेक्स के स्मेलटर रिफाइनरी से उत्पादन चालू करने तथा सेमी कंडक्टर व क्रिटिकल मिनरल के रिसाइकल के प्लांट लगाने की मांग को लेकर राष्ट्रपति के नाम जिला कलेक्टर को ज्ञापन दिया।
Dear Comrade
Amra Ram
Communist Party of India (Marxist)
SFI Rajasthan
CPIM Jhunjhunu
राजेश बिजारणियॉं
Vijay Yadav
Bilal Qureshi
Pankaj Gurjar Sfi Jhunjhunu
Mahipal Poonia
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DYFI Kerala

किसान नेता कॉमरेड सुरेंद्र लाम्बा ने अपनी शादी की सालगिरह पर CPIM Jhunjhunu   भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) को...
25/11/2025

किसान नेता कॉमरेड सुरेंद्र लाम्बा ने अपनी शादी की सालगिरह पर CPIM Jhunjhunu भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) को 1100 रूपए का आर्थिक सहयोग किया । साथी की वैवाहिक ज़िंदगी यों ही फले-फुले एवं आबाद रहे । साथी को शादी की सालगिरह मुबारक हो । लाल सलाम
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भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के पोलिट ब्यूरो की बैठक 13-14 नवंबर 2025 को नई दिल्ली में हुई और निम्नलिखित विज्...
18/11/2025

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के पोलिट ब्यूरो की बैठक 13-14 नवंबर 2025 को नई दिल्ली में हुई और निम्नलिखित विज्ञप्ति जारी की गई।

🔴 बिहार चुनाव: बिहार विधानसभा चुनावों में रिकॉर्ड 67 प्रतिशत मतदाताओं ने भाग लिया - पिछले चुनाव की तुलना में 9.6 प्रतिशत की वृद्धि। उल्लेखनीय रूप से, 71.6 प्रतिशत महिलाओं ने मतदान किया, जो महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि दर्शाता है। वोट शेयर के आंकड़ों से पता चलता है कि हालांकि एनडीए को वोटों के मामले में (2024 के लोकसभा चुनावों की तुलना में) ज़्यादा लाभ नहीं हुआ, लेकिन वह विधानसभा में अपनी संख्या बढ़ाने में सफल रहा। सत्तारूढ़ गठबंधन ने पूरी राज्य मशीनरी का इस्तेमाल किया, तरह-तरह की जोड़-तोड़ की, भारी मात्रा में धन और राज्य के बाहर से लाए गए बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं का इस्तेमाल किया। प्रधानमंत्री और गृह मंत्री सहित अपने नेताओं की सांप्रदायिक और जातिवादी बयानबाजी से उसे फायदा हुआ। कॉर्पोरेट मीडिया द्वारा प्रचारित इस बयानबाजी ने महागठबंधन द्वारा उठाए गए जन मुद्दों को दबा दिया। बिहार चुनाव दर्शाते हैं कि भाजपा को हराने के लिए, विपक्षी दलों को उसकी जनविरोधी नीतियों के विरुद्ध संयुक्त संघर्ष का नेतृत्व करते हुए और अधिक संगठित प्रयास करने होंगे। माकपा, चुनाव आयोग के पक्षपातपूर्ण रवैये, एसआईआर की अचानक शुरुआत और इन परिणामों के पीछे के सभी अन्य कारकों, यदि कोई हों, की विस्तार से जाँच करेगी। माकपा पोलिट ब्यूरो बिहार की जनता का आभार व्यक्त करता है जिन्होंने उसके और अन्य विपक्षी दलों के उम्मीदवारों को वोट दिया।

🔴दिल्ली में बम विस्फोट: दिल्ली में हुए बम विस्फोट ने इस हमले को अंजाम देने में एक व्यापक नेटवर्क की संलिप्तता का खुलासा किया। इस घटना से लोगों को सुरक्षा प्रदान करने और ऐसे आतंकवादी हमलों को रोकने में सरकार की विफलता एक बार फिर उजागर हुई है। पहलगाम आतंकवादी हमले के बाद, सरकार ने दावा किया था कि 'ऑपरेशन सिंदूर' ने आतंकवादी ढाँचे को नष्ट कर दिया है, खासकर जब इसमें जैश-ए-मोहम्मद के मुख्यालय को निशाना बनाया गया था। हालाँकि, दिल्ली विस्फोट इन दावों की हवा निकाल देता है, क्योंकि सरकार ने स्वयं इस नवीनतम हमले के लिए जैश को ज़िम्मेदार ठहराया है। सरकार को ज़िम्मेदार आतंकवादी नेटवर्क का पर्दाफाश करने के लिए तेज़ी से कार्रवाई करनी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सभी अपराधियों को न्याय के कटघरे में लाया जाए। इस घटना का इस्तेमाल करके समाज को सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकृत करने के प्रयासों से सख्ती से निपटा जाना चाहिए।

🔴केरल एलडीएफ सरकार की ऐतिहासिक उपलब्धि:
1 नवंबर को, केरल की एलडीएफ सरकार ने राज्य में अत्यधिक गरीबी उन्मूलन में ऐतिहासिक सफलता की घोषणा की। यह उपलब्धि अत्यंत गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम (ईपीईपी) की सावधानीपूर्वक योजना और क्रियान्वयन का परिणाम है, जो एक चार-वर्षीय, आँकड़ों पर आधारित पहल है, जिसने स्थानीय स्व-शासन को 64,006 परिवारों की पहचान करने और उनके उत्थान के लिए प्रेरित किया। यह सफलता केरल के विकास मॉडल की प्रभावशीलता का प्रमाण है, जो प्रगतिशील राजनीति, विकेन्द्रीकृत शासन और अधिकार-आधारित दृष्टिकोण पर आधारित है। केरल की यह सफलता केंद्र सरकार द्वारा छेड़े गए अथक राजकोषीय युद्ध, जिसने विपक्षी शासित राज्यों को व्यवस्थित रूप से धन से वंचित रखा है, के बावजूद हासिल हुई। यह उपलब्धि और भी महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि यह बाधाओं के बावजूद बेहतर कल्याणकारी परिणाम प्राप्त करने के लिए एक वामपंथी सरकार की राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

पोलिट ब्यूरो केरल की जनता से आगामी स्थानीय निकाय चुनावों में एलडीएफ उम्मीदवारों को वोट देने और यूडीएफ तथा भाजपा जैसी सांप्रदायिक ताकतों की पूर्ण हार सुनिश्चित करने की अपील करता है। यूडीएफ ने खुद को भाजपा और अन्य सांप्रदायिक ताकतों के साथ मिलीभगत वाला साबित कर दिया है।

🔴बिजली संशोधन विधेयक 2025: संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में पेश और पारित किए जाने वाले नए विधेयक द्वारा बिजली क्षेत्र के निजीकरण के प्रयासों को आक्रामक रूप से आगे बढ़ाया जा रहा है। इसका उद्देश्य बिजली क्षेत्र के सार्वजनिक चरित्र को नष्ट करना और इसे पूरी तरह से वित्तीयकृत, लाभ-संचालित बाजार के रूप में पुनर्निर्मित करना है। यदि यह विधेयक पारित हो जाता है, तो इससे कृषि और घरेलू उपभोक्ताओं के लिए टैरिफ में भारी बढ़ोतरी का झटका लाएगी, राज्य की डिस्कॉम कंपनियां पंगु हो जाएँगी और राष्ट्रीय ऊर्जा संप्रभुता भी निजी एकाधिकारियों के हाथों में चली जाएगी। यह विधेयक संघवाद, आजीविका के अधिकार और सार्वजनिक वस्तु के रूप में बिजली की अवधारणा पर सीधा हमला है।

सीपीआई(एम) प्रस्तावित बदलावों के खिलाफ जनमत जुटाएगी। यह उन ट्रेड यूनियनों और किसान संगठनों को समर्थन देती है जो पहले से ही बिजली निजीकरण के खिलाफ संघर्ष का नेतृत्व कर रहे हैं। पोलिट ब्यूरो समाज के सभी वर्गों से इस संघर्ष में शामिल होने और इसे मज़बूत करने की अपील करता है।

🔴 श्रम शक्ति नीति: श्रम एवं रोजगार मंत्रालय द्वारा जारी श्रम शक्ति नीति 2025 के मसौदे का मुख्य उद्देश्य श्रमिकों की सुरक्षा, प्रवर्तन तंत्र और सामूहिक सौदेबाजी के अधिकारों को व्यवस्थित रूप से समाप्त करना है। यह विधेयक 'धर्मशास्त्रों' से प्रेरणा लेने का दावा करता है और लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष, गणतांत्रिक संविधान पर सीधा प्रहार है। यह नीति राज्यों को केंद्र सरकार के कॉर्पोरेट-समर्थक श्रम संहिताओं को लागू करने के लिए मजबूर करने हेतु वित्तीय प्रोत्साहनों का उपयोग करके संघीय ढाँचे को सक्रिय रूप से कमज़ोर करती है। यह श्रम संहिताओं को लागू करने का एक भ्रामक प्रयास है और इसे कॉर्पोरेट, सांप्रदायिक हिंदुत्ववादी सत्तावादी शासन के अनुरूप तैयार किया गया है।

🔴 मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण: बारह राज्यों को लक्षित करते हुए मतदाता सूचियों का चल रहा विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) भाजपा-आरएसएस गठबंधन द्वारा एक सुनियोजित राजनीतिक परियोजना है, जिसे भारत के चुनाव आयोग (ईसीआई) के माध्यम से संचालित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य लाखों मतदाताओं को व्यवस्थित रूप से मताधिकार से वंचित करना है। विवादास्पद बिहार प्रक्रिया की तर्ज पर, एसआईआर जानबूझकर काफी सारे दस्तावेजों को दर्ज करने की आवश्यकता पैदा करती है और 2002 की एक पुरानी आधार रेखा का उपयोग करके पिछले दरवाजे से राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) का कार्य करती है। इसका प्राथमिक उद्देश्य चुनावी गणित को सत्तारूढ़ दल के पक्ष में बदलना और सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की नींव को कमजोर करना है, जो चुनावी लोकतंत्र पर सबसे बड़ा हमला है।

पार्टी नागरिकता निर्धारित करने के अधिकार को हड़पने के चुनाव आयोग के प्रयास के खिलाफ व्यापक रूप से अभियान चलाएगी और यह सुनिश्चित करेगी कि किसी भी योग्य मतदाता का नाम मतदाता सूची से न हटे। इसी प्रकार, यह लोगों से सतर्क रहने और यह सुनिश्चित करने का आह्वान करती है कि भाजपा और चुनाव आयोग की मिलीभगत से फर्जी मतदाताओं का नाम मतदाता सूची में दर्ज न हो।

🔴 महिलाओं, दलितों और आदिवासियों पर हमले: महिलाओं, दलितों और आदिवासियों पर हमले लगातार जारी हैं, खासकर उन राज्यों में जहाँ भाजपा सत्ता में है। ये हमले आरएसएस और उसके सहयोगी संगठनों द्वारा प्रचारित मनुवादी विचारधारा का प्रतिबिम्ब हैं। राज्य और केंद्र दोनों में भाजपा सरकारों की मिलीभगत और आरोपी अपराधियों को दंडित करने से उनका स्पष्ट इनकार अपराधियों के हौसले बढ़ा रहा है, जिससे ऐसे हमलों में वृद्धि हो रही है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा जारी आधिकारिक आँकड़े स्वयं मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के 11 वर्षों के दौरान महिलाओं, दलितों और आदिवासियों के खिलाफ अपराधों में भारी वृद्धि दर्शाते हैं।

🔴 आरएसएस शताब्दी: आरएसएस के शताब्दी समारोह की शुरुआत उसके नेताओं द्वारा व्याख्यानों की एक श्रृंखला के साथ हुई। इस अवसर का उपयोग अपनी सांप्रदायिक और विभाजनकारी विचारधारा को व्यापक रूप से फैलाने के लिए किया जा रहा है। मार्क्सवाद के प्रति संघ की घृणा उसके नेताओं द्वारा स्पष्ट रूप से व्यक्त की गई है, जिन्होंने केरल पर कुछ अपमानजनक टिप्पणियाँ भी कीं और उसे 'अशांत राज्य' कहा। आरएसएस राज्य के विभिन्न अंगों पर अपने नियंत्रण का इस्तेमाल 'हिंदू राष्ट्र' की स्थापना के अपने उद्देश्य को साकार करने के लिए कर रहा है।

🔴 अर्थव्यवस्था: हाल ही में जारी आँकड़े बताते हैं कि केंद्र सरकार के दावों के विपरीत, हमारी अर्थव्यवस्था अच्छी स्थिति में नहीं है। बेरोज़गारी, रोज़गार के अवसरों की कमी, वेतन में स्थिरता, ये सभी लोगों में आक्रोश बढ़ा रहे हैं। अर्थव्यवस्था के सामने मौजूद संरचनात्मक मुद्दों का समाधान करने के बजाय, सरकार अमेरिका और यूरोपीय संघ के साथ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर हस्ताक्षर करके और कुछ अस्थायी मौद्रिक प्रोत्साहन देकर अर्थव्यवस्था को विदेशी पूंजी के लिए खोलकर इस संकट से उबरने की कोशिश कर रही है।
अमेरिका द्वारा लगाए गए शुल्कों के परिणामस्वरूप, भारत के निर्यात में 37.5 प्रतिशत की गिरावट आई है, जो वर्षों में सबसे तेज़ अल्पकालिक गिरावटों में से एक है। सरकार के तत्काल हस्तक्षेप के बिना, भारत उन क्षेत्रों में बाजार हिस्सेदारी खोने का जोखिम उठा रहा है जहाँ पहले उसकी मजबूत स्थिति थी।

🔴 अमेरिका के साथ व्यापार समझौता: अमेरिका भारत सरकार पर एक ऐसे व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करने का दबाव बना रहा है जो सभी क्षेत्रों में अमेरिकी उत्पादों को व्यापक बाजार पहुँच प्रदान करे। अमेरिका चाहता है कि भारत ज़्यादातर औद्योगिक वस्तुओं पर टैरिफ़ हटा दे, कृषि और डेयरी क्षेत्रों को खोले, जिसमें आनुवंशिक रूप से संशोधित मक्का और सोयाबीन तक पहुँच, अप्रतिबंधित सीमा-पार डेटा प्रवाह, उदार ई-कॉमर्स और बौद्धिक संपदा (आईपी) नियम और अमेरिकी तेल, एलएनजी और रक्षा उपकरण ख़रीदने के लिए व्यापक प्रतिबद्धताएँ शामिल हों। रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि सरकार अमेरिकी दबाव के आगे झुक रही है और एक ऐसे समझौते पर हस्ताक्षर करने वाली है जो हमारे हितों के लिए हानिकारक होगा।

🔴 अमेरिका-भारत प्रमुख रक्षा साझेदारी की रूपरेखा: भारत-अमेरिका 10-वर्षीय रक्षा सहयोग रूपरेखा, अमेरिकी साम्राज्यवादी उद्देश्यों के साथ भारत के रणनीतिक एकीकरण को आगे बढ़ाती है। इस समझौते का उद्देश्य सभी क्षेत्रों में गहन सहयोग स्थापित करना है: भूमि, वायु, समुद्र, अंतरिक्ष और साइबरस्पेस, जो केवल हथियारों की बिक्री से आगे बढ़कर पूर्ण-स्पेक्ट्रम सैन्य अंतर-संचालन क्षमता तक पहुँचता है। इसके प्रावधान मूल रूप से भारत की रणनीतिक स्वायत्तता से समझौता करते हैं, इसकी सैन्य और विदेश नीति को अमेरिका के निर्देशों के अधीन करते हैं। यह रूपरेखा तकनीकी निर्भरता को गहरा करती है और भारत के रक्षा औद्योगिक आधार को अमेरिकी एकाधिकार के हितों के अधीन करती है, और क्षेत्रीय टकराव के जोखिम को बढ़ाती है। समझौते में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि इसका उद्देश्य चीन को नियंत्रित करना और भारत को औपचारिक रूप से अमेरिकी नेतृत्व वाली सैन्य संरचना में बाँधना है।

पोलित ब्यूरो वर्तमान भाजपा-नेतृत्व वाली सरकार की निंदा करता है क्योंकि वह हमारे देश को बहुत गहराई से अमेरिका के साथ नत्थी कर रही है जो हमारे हितों के लिए हानिकारक साबित हो रहा है।

🔴अमेरिका के आक्रामक कदम: संयुक्त राज्य अमेरिका ने घोषणा की है कि उसने वेनेजुएला पर सैन्य हमला - ऑपरेशन सदर्न स्फीयर - शुरू करने की पूरी तैयारी कर ली है। उसने कैरेबियन सागर में संचालित नौकाओं पर बीस हमले किए थे जिनमें लगभग 80 लोग मारे गए थे। उन पर मादक पदार्थों की तस्करी का आरोप लगाया गया था। ये दावे बिना किसी विश्वसनीय प्रमाण के किए गए थे। इस क्षेत्र में 10,000 से अधिक अमेरिकी सैन्य कर्मियों को तैनात किया गया है, जिनका समर्थन नौसेना वाहक समूहों द्वारा किया जा रहा है। अमेरिकी कार्रवाई वेनेजुएला को अमेरिकी साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं के प्रति उसके दृढ़ विरोध के लिए निशाना बनाने के उसके दृढ़ संकल्प को दर्शाती है। ऐसा प्रतीत होता है कि अमेरिका लैटिन अमेरिका में सभी वामपंथी और प्रगतिशील सरकारों को गिराने पर आमादा है। अमेरिका वेनेजुएला सरकार को गिराने को समाजवादी क्यूबा को अलग-थलग करने और अंततः उस पर हमला करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानता है।

पोलिट ब्यूरो वेनेजुएला को निशाना बनाकर किए गए अमेरिकी आक्रामक कदमों की निंदा करता है और वेनेजुएला के लोगों के साथ अपनी एकजुटता व्यक्त करता है जो अपने देश को अस्थिर करने के सभी प्रयासों का विरोध कर रहे हैं।

🔴 युद्धविराम और गाजा शांति योजना: गाजा में युद्धविराम और इजरायली बमबारी और शत्रुता की समाप्ति ने गाजा के लंबे समय से पीड़ित लोगों को कुछ राहत दी है। फिलिस्तीन के साथ एकजुटता में बढ़ते जन आंदोलन के भारी दबाव के कारण अमेरिका को इजरायल पर युद्धविराम स्वीकार करने के लिए दबाव डालना पड़ा। हालाँकि, यहूदीवादी इज़राइल युद्धविराम का उल्लंघन और फिलिस्तीनी इलाकों में बसाए गए यहूदियों द्वारा हिंसा जारी रखे हुए है। भारत सरकार को इज़राइल के प्रति अपनी नीति की समीक्षा करनी चाहिए, अपने सभी रक्षा और सुरक्षा संबंधों को समाप्त कर देना चाहिए और फ़िलिस्तीन के साथ एकजुटता दिखानी चाहिए।

🔴केंद्रीय कमेटी की बैठक: केंद्रीय कमेटी की अगली बैठक 16-18 जनवरी, 2026 को तिरुवनंतपुरम, केरल में होगी।

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