25/02/2018
ओ शिव से अपनी तुलना करने वालों
स्वयं के मद में मदमस्त रहने वालों
समुद्र मंथन का भी वह पल याद कर लो
क्या शिव के बिन मंथन हो सकता था ?
बासुकी को भी तो शिव ने ही दिया था |
आदि योगी को किस बात की इच्छा थी ?
उसकी तो सब इच्छाएँ शेष पड़ी थी ,
फिर भी; मंथन का आधार वही था ;
सबकी , देवों और दानवों की
कुछ न कुछ इच्छा थी स्वयं विष्णु भी ; सर्वज्ञ; वहीँ थे
किसी को रत्नों , किसीको अमृत घट की ही पड़ी थी
शिव ने तो कालकूट को ही पिया था |
चन्द्रमा से अपने को शांत; सुषोभित किया था
हर परिस्थिति में स्वयं को एकरूप शांत रखने पर
योग ध्यान में रत रह; शक्ति संजोने पर
अपनी नहीं सम्पूर्ण सृष्टि का चिंतन करने पर
कालकूट भी पानी बन जाता है
यही तो शिव हमें समझाता है
काम, क्रोध , लोभ , मोह , मद , मात्सर्य से विरत वही है
पर परिवार का महत्व जो समझा , शिव वही है|
सांप , मोर मूषक में जो प्रेम करादे शिव वही हैं
सिंह के साथ बैल भी जिसके परिवार में हो शिव वही है
नर-नारायण , देव-दानव , भूत पिशाच भी जिसकी माने , शिव वही है
पत्नी के यज्ञकुंड में जाने पर; जो महाकाल; प्रलय ला दे ; शिव वही है
है छोटा सा परिवार जिसका
है हम दो हमारे दो का ज्ञान जिसका
है पूरा का पूरा संसार जिसका
हाँ ! वही शिव है |
Post by : Shri Himanshu Chaudhary
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