कविता सिंधु

कविता सिंधु भारतीय काव्य , भाषा और साहित्य के महान गौरव को समर्पित

12/10/2024
आप सभी को नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएंWish you all a very happy Navratri
22/10/2023

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Wish you all a very happy Navratri

महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् | mahisasur mardini stotram | ayigiri nandini | अयि गिरिनन्दिनि ...

12/08/2023

अनन्य रसिक शिरोमणि स्वामी श्री हरिदासजी कृत 'अष्टादश सिद्धान्त' के पद

ज्यौंही-ज्यौंही तुम राखत हौ, त्यौंही-त्यौंही रहियत हौं, हो हरि।
और तौ अचरचे पाँय धरौं सो तौ कहौ, कौन के पैंड़ भरि?
जद्यपि कियौ चाहौ, अपनौ मनभायौ, सो तौ क्यों करि सकौं, जो तुम राखौ पकरि।
कहिं श्रीहरिदास पिंजरा के जानवर ज्यौं, तरफ़राय रह्यौ उड़िबे कौं कितौऊ करि॥1॥ [राग विभास]

काहू कौ बस नाहिं, तुम्हारी कृपा तें सब होय बिहारी-बिहारिनि।
और मिथ्या प्रपंच, काहे कौं भाषियै, सु तौ है हारिनि॥
जाहि तुमसौं हित, तासौं तुम हित करौ, सब सुख कारनि।
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा-कुंजबिहारी, प्रानन के आधारनि॥2॥ [राग विभास]

कबहूँ-कबहूँ मन इत-उत जात, यातैंब कौन अधिक सुख।
बहुत भाँतिन घत आनि राख्यौ, नाहिं तौ पावतौ दुख॥
कोटि काम लावन्य बिहारी, ताके मुहांचुहीं सब सुख लियैं रहत रुख।
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा-कुंजबिहारी कौ दिन देखत रहौं विचित्र मुख॥3॥ [राग विभास]

हरि भज हरि भज, छाँड़ि न मान नर-तन कौ।
मत बंछै मत बंछै रे, तिल-तिल धन कौ॥
अनमाँग्यौं आगै आवैगौ, ज्यौं पल लागै पल कौं।
कहिं श्रीहरिदास मीचु ज्यौं आवैं, त्यौं धन है आपुन कौं॥4॥ [राग विभास]

ए हरि, मो-सौ न बिगारन कौ, तो-सौ न सँवारन कौ, मोहिं-तोहिं परी होड़।
कौन धौं जीतै, कौन धौं हारै, पर बदी न छोड़॥
तुम्हारी माया बाजी विचित्र पसारी, मोहे सुर मुनि, का के भूले कोड़।
कहिं श्रीहरिदास हम जीते, हारे तुम, तऊ न तोड़॥5॥ [राग बिलावल]

बंदे, अखत्यार भला।
चित न डुलाव, आव समाधि-भीतर, न होहु अगला॥
न फ़िर दर-दर पिदर-दर, न होहु अँधला।
कहिं श्रीहरिदास करता किया सो हुआ, सुमेर अचल चला॥6॥ [राग आसावरी]

हित तौ कीजै कमलनैन सौं, जा हित के आगैं और हित लागै फ़ीकौ।
कै हित कीजै साधु-संगति सौं, ज्यौं कलमष जाय सब जी कौ॥
हरि कौ हित ऐसौ, जैसौ रंग मजीठ, संसार हित रंग कसूँभ दिन दुती कौ।
कहिं श्रीहरिदास हित कीजै श्रीबिहारीजू सौं, और निबाहु जानि जी कौ॥7॥ [राग आसावरी]

तिनका ज्यौं बयार के बस।
ज्यौं चाहै त्यौं उड़ाय लै डारै, अपने रस॥
ब्रह्मलोक, सिवलोक और लोक अस।
कहिं श्रीहरिदास बिचारि देखौ, बिना बिहारी नाहिं जस॥8॥ [ राग आसावरी]

संसार समुद्र, मनुष्य-मीन-नक्र-मगर, और जीव बहु बंदसि।
मन बयार प्रेरे, स्नेह फ़ंद फ़ंदसि॥
लोभ पिंजर, लोभी मरजिया, पदारथ चार खंद खंदसि।
कहिं श्रीहरिदास तेई जीव पार भए, जे गहि रहे चरन आनंद-नंदसि॥9॥ [राग आसावरी]

हरि के नाम कौ आलस कत करत है रे, काल फ़िरत सर साँधे।
बेर-कुबेर कछु नहिं जानत, चढ़्यौ रहत है कांधैं॥
हीर बहुत जवाहर संचे, कहा भयौ हस्ती दर बाँधैं।
कहिं श्रीहरिदास महल में बनिता बनि ठाढ़ी भई, एकौ न चलत, जब आवत अंत की आँधैं॥10॥ [राग आसावरी]

देखौ इन लोगन की लावनि।
बूझत नाँहिं हरि चरन-कमल कौं, मिथ्या जनम गँवावनि॥
जब जमदूत आइ घेरत, तब करत आप मन-भावनि।
कहिं श्रीहरिदास तबहिं चिरजीवौ, जब कुंजबिहारी चितावनि॥11॥ [राग आसावरी]

मन लगाय प्रीति कीजै, कर करवा सौं ब्रज-बीथिन दीजै सोहनी।
वृन्दावन सौं, बन-उपवन सौं, गुंज-माल हाथ पोहनी॥
गो गो-सुतन सौं, मृगी मृग-सुतन सौं, और तन नैंकु न जोहनी।
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा-कुंजबिहारी सौं चित, ज्यौं सिर पर दोहनी॥12॥ [राग आसावरी]

हरि कौ ऐसौई सब खेल।
मृग तृष्ना जग व्यापि रह्यौ है, कहूं बिजौरौ न बेल।
धन-मद, जोवन-मद, राज-मद, ज्यौं पंछिन में डेल।
कहिं श्रीहरिदास यहै जिय जानौ, तीरथ कौसौ मेल॥13॥ [राग कल्यान]

झूँठी बात सांची करि-दिखावत हौ हरि नागर।
निस-दिन बुनत-उधेरत जात, प्रपंच कौ सागर॥
ठाठ बनाइ धरयौ मिहरी कौ, है पुरुष तैं आगर।
सुनि श्रीहरिदास यहै जिय जानौ, सपने कौ सौ जागर॥14॥ [राग कल्यान]

जगत प्रीति करि देखी, नाहिंनें गटी कौ कोऊ।
छत्रपति रंक लौं देखे, प्रकृति-विरोध बन्यौ नहीं कोऊ॥
दिन जो गये बहुत जनमनि के, ऐसैं जाउ जिन कोऊ।
कहिं श्रीहरिदास मीत भले पाये बिहारी, ऐसे पावौ सब कोऊ॥15॥ [राग कल्यान]

लोग तौ भूलैं भलैं भूलैं, तुम जिनि भूलौ मालाधारी।
अपुनौ पति छँड़ि औरन सौं रति, ज्यों दारनि में दारी॥
स्याम कहत ते जीव मोते बिमुख भये, सोऊ कौन जिन दूसरी करि डारी।
कहिं श्रीहरिदास जज्ञ-देवता-पितरन कों श्रद्धा भारी॥16॥ [राग कल्यान]

जौलौं जीवै तौलौं हरि भज रे मन और बात सब बादि।
द्यौस चार के हला-भला में कहा लेइगौ लादि?
माया-मद, गुन-मद, जोवन-मद भूल्यौ नगर विवादि।
कहिं श्रीहरिदास लोभ चरपट भयौ, काहे की लगै फ़िरादि॥17॥ [राग कल्यान]

प्रेम-समुद्र रूप-रस गहरे, कैसैं लागैं घाट।
बेकारयौं दै जान कहावत, जानिपन्यौं की कहा परी बाट?
काहू कौ सर सूधौ न परै, मारत गाल गली-गली हाट।
कहिं श्रीहरिदास जानि ठाकुर-बिहारी तकत ओट पाट॥18॥ [राग कल्यान]

बाबा तुलसीदास की विनय पत्रिका के ४५ पृष्ठ से ली गई  और राग गौरी में गाई जाने वाली ये श्री राम स्तुति भारत वर्ष में लगभग ...
31/03/2023

बाबा तुलसीदास की विनय पत्रिका के ४५ पृष्ठ से ली गई और राग गौरी में गाई जाने वाली ये श्री राम स्तुति भारत वर्ष में लगभग हर घर में गाई जाती है।


Always a delight to read...
27/03/2023

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कृष्‍ण का अलौकिकत्‍व / सुजान-रसखान - कविता कोश भारतीय काव्य का विशालतम और अव्यवसायिक संकलन है जिसमें हिन्दी उर्दू, ....

A wonderful poem composed by   for  .Shubh     (१)गिरिपूजेयं विहितं केन? अरचि शक्रपदमभयं येनगिरिपूजेयं विहितं केन? पूतनि...
26/10/2022

A wonderful poem composed by for .
Shubh

(१)
गिरिपूजेयं विहितं केन? अरचि शक्रपदमभयं येन
गिरिपूजेयं विहितं केन? पूतनिका सा निहता येन

(२)
गिरिपूजेयं विहितं केन? तृणावर्ततनुदलनं येन
गिरिपूजेयं विहितं केन? यमलार्जुनतरुम् उदकलि येन

(३)
गिरिपूजेयं विहितं केन? वत्सबकासुरहननं येन
गिरिपूजेयं विहितं केन? व्योमाघासुरमरणं येन

(४)
गिरिपूजेयं विहितं केन? कालियदमनं कलितं येन
गिरिपूजेयं विहितं केन? खरप्रलम्बकशमनं येन

(५)
गिरिपूजेयं विहितं केन? दवयुग्मं परिपीतं येन
गिरिपूजेयं विहितं केन? त्रस्यति कंसः सततं येन

Meaning
1) Who has arranged the worship of Govardhana Hill? The One who arranged this worship is the One who freed us from the fear of Indra!

Who has arranged the worship of Govardhana Hill? The killer of the demon Putana is the One who arranged this!

2) Who has arranged the worship of Govardhana Hill? The One who destroyed the body of the cyclone-demon Trnavarta is the One who arranged this!
Who has arranged the worship of Govardhana Hill? The One who uprooted the twin yamala-arjuna trees is the One who arranged this!

3) Who has arranged the worship of Govardhana Hill? The killer of the calf demon, Vatsasura, and stork demon, Bakasura, is the One who arranged this!
Who has arranged the worship of Govardhana Hill? The killer of the flying demon, Vyomasura, and the python demon, Aghasura, is the One who arranged this!

4) Who has arranged the worship of Govardhana Hill? The One who subdued the cobra, Kaliya, is the One who arranged this!
Who has arranged the worship of Govardhana Hill? The killer of the donkey demon, Dhenukasura, and the demon Pralambasura is the One who arranged this!

5) Who has arranged the worship of Govardhana Hill? The One who swallowed two forest fires is the one who arranged this!
Who has arranged the worship of Govardhana Hill? The One who Kamsa is always afraid of!

 #सूरदास"ऊधो, मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं।बृंदावन गोकुल तन आवत सघन तृनन की छाहीं॥प्रात समय माता जसुमति अरु नंद देखि सुख पावत।...
22/10/2022

#सूरदास

"
ऊधो, मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं।
बृंदावन गोकुल तन आवत सघन तृनन की छाहीं॥
प्रात समय माता जसुमति अरु नंद देखि सुख पावत।
माखन रोटी दह्यो सजायौ अति हित साथ खवावत॥
गोपी ग्वाल बाल संग खेलत सब दिन हंसत सिरात।
सूरदास, धनि धनि ब्रजबासी जिनसों हंसत ब्रजनाथ॥
"

भावार्थ :- निर्मोही मोहन को अपने ब्रज की सुध आ गई। व्याकुल हो उठे, बाल्यकाल का एक-एक दृष्य आंखों में नाचने लगा। वह प्यारा गोकुल, वह सघन लताओं की शीतल छाया, वह मैया का स्नेह, वह बाबा का प्यार, मीठी-मीठी माखन रोटी और वह सुंदर सुगंधित दही, वह माखन-चोरी और ग्वाल बालों के साथ वह ऊधम मचाना ! कहां गये वे दिन? कहां गई वे घड़ियां ?

Source: KavitaKosh

रस के कवि रसखान की एक बहुत सुंदर सवैया रचना जिसमें भगवान श्री कृष्ण के अनादि अनंत भागवत तत्व और भक्तों के हाथों उनकी विव...
07/09/2022

रस के कवि रसखान की एक बहुत सुंदर सवैया रचना जिसमें भगवान श्री कृष्ण के अनादि अनंत भागवत तत्व और भक्तों के हाथों उनकी विवशता - दोनों को बहुत ही सुंदर तरीके से दर्शाया गया है.

आनंद लें

**
संकर से सुर जाहि भजैं चतुरानन ध्यानन यानन धर्म बढ़ावैं।
नैंक हियें जिहि आनत ही जड़ मूढ़ महा रसखान कहावैं।
जा पर देव अदेव भू-अंगना वारत प्रानन प्रानन पावैं।
ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं

सेष, गनेस, महेस, दिनेस, सुरेसहु जाहि निरंतर गावैं।
जाहि अनादि अनंत अखंड अछेद अभेद सुबेद बतावैं।
नारद से सुक ब्यास यास रहैं पचि हारे तऊ पुनि पार न पावैं।
ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं।।

गावैं सुनि गनिका गंधरब्ब और सारद सेष सबै गुन गावत।
नाम अनंत गनंत गनेस ज्यौं ब्रह्मा त्रिलोचन पार न पावत।
जोगी जती तपसी अरु सिद्ध निरंतर जाहि समायि लगावत।
ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पै नाच नचावत।।

लाय समाधि रहे ब्रह्मादिक योगी भये पर अंत न पावैं।
साँझ ते भोरहिं भोर ते साँझति सेस सदा नित नाम जपावैं।
ढूँढ़ फिरै तिरलोक में साख सुनारद लै कर बीन बजावैं।
ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं।।

गुंज गरें सिर मोरपखा अरु चाल गयंद की मो मन भावै।
साँवरो नंदकुमार सबै ब्रजमंडली में ब्रजराज कहावै।
साज समाज सबै सिरताज औ लाज की बात नहीं कहि आवै।
ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पै नाच नचावै।।
**

उनकी और भी कई सुंदर रचनाएं इस किताब में उपलब्ध हैं

https://ia600603.us.archive.org/11/items/HindiBook-raskhan-ka-amar-kavya.pdf/HindiBook-raskhan-ka-amar-kavyahindi.pdf

02/08/2022

Current India will forever be indebted to the great Adi because of the numerous commentaries and translations he did on various and his marvelous and beautiful compositions. His work and wisdom made him immortal in the world.
He was an enlightened being who not only fully realized his true nature of pure , but also, through his various visits all over India and teachings, paved the way for common men to realize their true self as well.
Had it not been because of him, a vast ocean of divine knowledge would have forever be hidden from us.

28/07/2022

rediscovering a marvelous by


This entry was posted on Friday, January 6th, 2012 at 10:02 pm and is filed under Complete Works of Swami Vivekananda. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0 feed. Both comments and pings are currently closed.

13/03/2022

गजानन माधव मुक्तिबोध हिंदी काव्य जगत के एक प्रमुख कवी थे। उनके द्वारा प्रकाशित साहित्य: कामायनी: एक पुनर्विचार, नई कविता का आत्म-संघर्ष तथा अन्य निबन्ध, नए साहित्य का सौंदर्यशास्त्र, समीक्षा की समस्याएँ, चाँद का मुँह टेढ़ा है, भूरी-भूरी खाक धूल, एक साहित्यिक की डायरी, काठ का सपना, विपात्र, सतह से उठता आदमी, मेरे युवजन मेरे परिजन, भारत: इतिहास और संस्कृति, शेष-अशेष....

उनकी 'मुक्तिबोध रचनावली' संग्रह से एक प्रसिद्ध रचना

"
घोर धनुर्धर, बाण तुम्हारा सब प्राणों को पार करेगा
तेरी प्रत्यंचा का कम्पन सूनेपन का भार हरेगा
हिमवत, जड़, निःस्पन्द हृदय के अन्धकार में जीवन-भय है
तेरे तीक्ष्ण बाण की नोकों पर जीवन-सँचार करेगा।

तेरे क्रुद्ध वचन बाणों की गति से अन्तर में उतरेंगे
तेरे क्षुब्ध हृदय के शोले उर की पीड़ा में ठहरेंगे
कोपित तेरा अधर-संस्फुरण उर में होगा जीवन-वेदन
रुष्ट दृगों की चमक बनेगी आत्म-ज्योति की किरण सचेतन।

सभी उरों के अन्धकार में एक तड़ित वेदना उठेगी
तभी सृजन की बीज-वृद्धि हित, जड़ावरण की महि फटेगी
शत-शत बाणों से घायल हो बढ़ा चलेगा जीवन-अँकुर
दंशन की चेतन किरणों के द्वारा काली अमा हटेगी।

हे रहस्यमय ! ध्वंस-महाप्रभु, ओ ! जीवन के तेज सनातन
तेरे अग्निकणों से जीवन, तीक्ष्ण बाण से नूतन सर्जन
हम घुटने पर, नाश-देवता ! बैठ तुझे करते हैं वन्दन
मेरे सर पर एक पैर रख, नाप तीन जग तू असीम बन ।
"

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