10/07/2015
▀श्री इंदर सिंह नेगी के द्वारा।।
लाखामंडल के बारे में कहा जाता हे कि दुर्योधन ने यहाँ लाक्षागृह का निर्माण कराया था जिसमें पाण्डवों को जलाकर मार देने की योजना बनायीं थी किन्तु वो सुरक्षित बच निकल गए थे ! अंग्रेज लेखक वाल्टन के अनुसार “ सम्भवत: यहाँ दुर्ग भी था, यहाँ अभी भी एक सुरंग मिलती हे जो अब दिखाई नहीं देती !’’ आज भी यहाँ खेत खोदने से लेकर हल जोतने में अनेक तरह की मुर्तियें यदा-कदा मिल जाया करती हे ! यहाँ अनेक तरह के शिवलिंग और मूर्तियों का भण्डार हैं साथ ही बड़ी-बड़ी गुफाएं भी हे जो इसके ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व को रेखांकित करता हे ! लाखामंडल के बारे में भी अनेक कहानियां व्याप्त हे, कुछ विद्वान् लाखामंडल को केदारखंड का समृद्ध राज्य मानते हैं, कुछ का तो ये भी मानना हे कि यहाँ की समृद्धि के आकर्षण ने महमूद गजनबी को इसको लुटने के लिए बाध्य किया ! सन १७५७ में रोहिल्लाओं के सरदार नजीब उद्दौला ने और सन १७८६ में उनके पोते गुलाम कादिर ने पुंह: लूटपाट की तथा मूर्तियों को खंडित कर दिया, आज भी अनेक मुर्तियें खण्डित अवस्था में यहाँ विद्यमान हैं ! जौनसार बावर में अनेक तरह की लोक मान्यताएं/कथाएँ, स्थल हैं जिनके बारे में तरह-तरह की दंतकथाएं बढ़े- बुजुर्गों के श्रीमुख से सुनी जा सकती हैं , इसमें से अनेक कथाएँ पाण्डवों के यहाँ से सामीप्य की कहानियाँ वयां करती हे , यहाँ के लोकगीतों में तो पाण्डव नायक के रूप में विद्यमान ही हे अनेक त्योहारों, उत्सवों तथा शादी-व्याह हे अवसर पर गाये जाने वाले लोक गीतों जैसे छोड़े, भारत, बाकणा आदि में पाण्ड्वों का चित्रण हे
अंग्रेजो के समय लगभग १८१५ के आस-पास सिरमौर के राजा और अंग्रेजो के बीच एक संधि हुई थी उसका मकसद ये था कि जौनसार बावर सिरमौर के साथ रहेगा या अंग्रेजो के अधीन, बताते हैं कि इसका उल्लेख “पॉलिटिकल नोट्स ऑफ़ नाहन” में अंकित हे जिसको नागथात की संधि की संज्ञा दी गयी ! नागथात भी किसी समय महत्वपूर्ण स्थल रहा हे, अपनी पुस्तक “यमुना उपत्यका” में राजेन्द्र सिंह राणा “नयन” इस स्थान का सम्बन्ध महाभारतकालीन “नागसत” से जोड़तें हैं ! एक प्रश्न और मेरे जेहन में रह-रहकर उठता हे कि जब ये क्षेत्र इतना समृद्ध था जहां पांडवों ने शरण ली, जहां अशोक ने शिलालेख खुदवाया तो आखिर कौन से कारण रहे जिनके कारण तो जौनसार बावर अन्य से क्षेत्रों से पिछड़ गया ? अंग्रेजो के काल की हम बात करे तो टिहरी रियासत का पौड़ी गढ़वाल का क्षेत्र जिसको ब्रिटिश गढ़वाल कहा गया और सम्पूर्ण कुमाऊं क्षेत्र जो कत्युरी शासन से अंग्रेजो के अधीन आ गया था ये स्थान शिक्षा आदि के क्षेत्र में बहुत आगे निकल गए किन्तु जौनसार बावर क्षेत्र मैदान के इतने निकट होने के बाद भी पीछे रह गया इसका उत्तर खोजना अभी बाकी हे !
हमारा जिसमे की अन्य साथी भी शामिल हे मानना हे कि इस क्षेत्र के इतिहास से सम्बन्धित जितनी भी कड़ियाँ मौजूद हे उनको जोड़ने का काम किया जाय, इसको अलग-अलग कालखंडों में हुए घटनाक्रमों के अनुसार लिखने का काम किया, पांडव काल से लेकर गुप्त काल तक, इसके पश्चात बहुत सा हिस्सा इतिहास से गायब हे इसको खोजा जाए फिर कुछ वर्णन सिरमोर रियासत के समय मिलता हे लेकिन इसके बाद फिर एक अस्पष्टता हे तत्पश्चात अंग्रेजो के समय का वर्णन मिलता हे वो प्रशासनिक और राजनीतिक तो हे किन्तु सामाजिक नहीं हे, आजादी के बाद के इतिहास का भी निरपेक्ष विश्लेषण की जरुरत हे, जिसके चिन्ह हमारे पास अभी मौजूद भी हैं ! इतिहास लेखन एक गंभीर विषय हे जो साथ धेर्य, निरपेक्षता मांगता हे, समय, समर्पण और संसाधन की इस कार्य को करने की महत्वपूर्ण कड़ी हे ! ये काम तभी सम्पन्न किया जा सकता हे जब यहाँ के इतिहास से सम्बन्धित श्रोतों तक पहुँच कर उनको खंगाला जाए. इसके बाद तथ्यों को व्यवस्थित कर लिख लिया जाए !
चूँकि ये किसी समय हिमांचल के सिरमौर का हिस्सा रहा तो कुछ सूत्र वहाँ के संग्राहलयों, पुस्तकालयों में मौजूद भी होंगे, कुछ सरकारी दस्तावेजों मैं से भी सामग्री उपलब्ध हो सकती हे, कुछ पुरात्व बिभाग आदि से भी सामग्री मिल सकती हे ! इन सभी जगहों से सामग्री का एकत्रीकरण किया जा सकता हे, इसके बाद कुछ जानकार लोग इसको क्रमबद्ध करने का काम करें!
अभी तक तो हम लोगो का इतिहास शंक, सुणाद अर्थात मौखिक इतिहास (Oral History), बामणों के साँचो या कुछ पुस्तको में अंशो तक ही सीमित हे ! इस कार्य के लिए अपने लोगो को ही आगे आना ही पड़ेगा, नहीं तो समय के साथ वो इतिहास के ये पगचिह्न भी मिटते जायेंगें ! ध्यान रहे “इतिहास वो नहीं हे जो कहा जाता हे बल्कि वो हे जो लिखा जाता हे ! specially thanks to _indrer singh negi