The buransh international school lakhamandal dehradun

The buransh international school lakhamandal dehradun it is totaly information technology school.

Inauguration at lakhwar.
14/05/2016

Inauguration at lakhwar.

11/05/2016
अब स्कूल का नाम। द बुरांश इंटरनेशनल स्कूल रहेगा   पलायन पर पूर्ण विराम लगेगा।
14/04/2016

अब स्कूल का नाम। द बुरांश इंटरनेशनल स्कूल रहेगा पलायन पर पूर्ण विराम लगेगा।

नगाधिराज हिमालय की यमुना घाटी मंदिर स्थापत्य कला की दृष्टि से अत्यंत वैभवशाली व सम्पन्न रही है। उत्तराखंड की राजधानी देह...
23/03/2016

नगाधिराज हिमालय की यमुना घाटी मंदिर स्थापत्य कला की दृष्टि से अत्यंत वैभवशाली व सम्पन्न रही है। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के जौनसार बावर क्षेत्र में स्थित लाखामंडल स्थान पुरातात्विक धरोहर के रूप में विश्व विख्यात है। यह स्थान जनपद मुख्यालय से मसूरी होकर जाने वाले राजमार्ग पर लगभग किमी. दूर मध्य हिमालय उपत्यका में अवस्थित है। चकराता होकर भी लाखामंडल को एक अन्य राजमार्ग जाता है, किंतु यह अपेक्षाकृत अधिक लंबा मार्ग है। समुद्र तल से इस स्थान की ऊंचाई लगभग १३७२मीटर है। इस स्थल का संबंध महाभारत की एक ऐतिहासिक घटना से जोड़ा जाता है। इस घटना के अनुसार कौरवों ने अज्ञातवास के दौरान छलपूर्वक पांडवों को लाक्षागृह में बंदी बना कर जला कर नष्ट करने का कूटनैतिक षडयंत्र रचा था, किंतु कौरव गण अपने षडयंत्र में सफ ल नहीं हो सके थे। गुप्तोत्तर काल में सातवीं शताब्दी में सिंहपुर के यदुवंशीय शासक भास्कर वर्मन की पुत्री ईश्वरा ने अपने पति चन्द्र गुप्त जालंधर का शासक की पुण्य स्मृति में लाखा मंडल में शिव मंदिर का निर्माण कराया था। उक्त ऐतिहासिक मंदिर के परिसर से दो शिला लेख प्राप्त हुए है। लाखामंडल का खंडित शिला लेख २ रानी ईश्वरा की लाखामंडल प्रशस्ति। प्रस्तुत लेख में ईश्वरा प्रशस्ति का सविस्तार विवेचन किया गया है। यह अभिलेख गुप्तोत्तर कालीन बार्ह्मी लिपि में संस्कृत भाषा में उत्कीर्ण किया गया है। पुरातत्व विभाग से जुड़े रहे एवं वर्तमान में शिक्षा विभाग में कार्यरत शोधार्थी एवं पुरातत्व के जानकार वेद पी. सिंह ने जानकारी देते हुए बताया कि अभिलेख का आकार २ फीट ३१०.५ इंच ३ १फीट ३ ९इंच है। वही श्री राकेश तोमर उत्तराखंडी प्रबंधक द लाखामंडल इंटरनेशनल स्कूल का कहना है कि इसमें २२ श्लोक हैं। लिपि के आधार पर ब्यूलर महोदय ने इसे सातवीं शताब्दी ई. तथा प्रोफेसर एफ .कील हार्न ने सातवीं शताब्दी ई.के अंत का माना है। अन्य पुरावेत्ता दया राम साहनी एवं प्रोफेसर काशी प्रसाद जायसवाल ने इसका काल छठवीं शताब्दी ई.निर्धारित किया है। उक्त प्रशस्ति में११ पीढियों के बारह राजाओं का नामोल्लेख है जिनकी स्थिति प्राक गुप्त काल से ले कर हर्षवर्धन के शासनकाल तक रही होगी।इन शासकों का क्रम बद्ध विवरण निम्नवत है। राजर्षिश्री सेन वर्मन यह सिंह पुर के यदुवंश का संस्थापक था। संभवतरू सेनवर्मन के पश्चात यदुवंश ने प्रसिद्धि पायी थी। प्रो. जायसवाल के अनुसार यह २५०ई. में सिंहासनारूढ़ हुआ। लगभग ६३५ ई. तक यदुवंश के१२शासकों ने लाखामंडल तथा यमुना घाटी के निकटवर्ती जौनसार बावर क्षेत्र में शासन किया।
शासकों का क्रम
१. नृपति आर्यवर्मन यह एक चरित्र वान शासक था।
२. देववर्मन यह प्रजा वत्सल सम्राट था। इसने प्रजा के भय को सदा के लिए समाप्त कर दिया। यह दानदाता तथा शत्रुओं का विध्वंस करने वाला था।
३. देवप्रदीप्तवर्मन क्रोधी स्वभाव का होने के कारण इसने कभी अपने शत्रुओं को क्षमा नहीं किया। इस प्रकार यह स्वाभिमानी शासक था।
४. ईश्वर वर्मन यह एक धार्मिक प्रवृत्ति का राजा था।
५. वृद्धि वर्मन यह समृद्धि शाली शासक व लोगों को सहायता प्रदान करने वाला शासक था।
६. श्री सिंह वर्मन यह बलवान शासक था जो शत्रुओं के लिए खतरनाक किंतु दूसरों के लिए मृदु स्वभाव वाला था। यह अपने दान कार्य के लिए भी प्रसिद्ध था।
७. श्री जलवर्मन यह एक शान्ति प्रिय राजा था।
८. श्री यज्ञवर्मन यह भी धार्मिक प्रवृत्ति का शासक था। वंश के अंतिम तीन शासकों हेतु घांघल शब्द प्रयुक्त हुआ है जिस का अर्थ वीर योद्धा से है।
९. श्री अचलवर्मन यह एक शान्ति प्रिय शासक था किंतु युद्ध काल में अपने शत्रुओं को बहुत दंडित भी करता था।
१०. श्री दिवाकर वर्मन यह एक अत्यधिक शक्ति शाली शासक था। अभिलेख में इसके लिए महा घांघल महान वीर योद्धा शब्द प्रयुक्त हुआ है।
११. श्री भास्कर वर्मन दुवंश का अंतिम शासक भास्कर वर्मन था। इसके लिए प्रशस्ति में रिपु घांघल शत्रुओं के लिए महान वीर योद्धा शब्द प्रयुक्त हुआ है। इसने अन्य राजाओं पर विजय प्राप्त की। ऐसा प्रतीत होता है कि इसने उत्तर काशी के दक्षिण भूभाग को विजित करने हेतु एक अभियान किया था। इसकी एक मात्र रानी जयावली थी जो राजा कपिलवर्धन की पुत्री थी।
झरानी ईश्वरा श्री भास्कर वर्मन की पुत्री का नाम ईश्वरा था। ईश्वरा की माँ का नाम जयावली था। इसका विवाह जालंधर के राजकुमार चन्द्र गुप्त से हुआ था तथा यह अपनी युवावस्था में ही दुर्भाग्य वश विधवा हो गयी थी। पति के मरणोपरांत यह अपने पैतृक घर मायकेआ गयी थी। पतिव्रता नारी होने के कारण इसने सिंह पुर लाखामंडल में शिव मंदिर का निर्माण कराया ताकि उसके पति चन्द्र गुप्त का नाम व यश अमर रहे।
इस अभिलेख का रचयिता वसुदेव भट्ट था जिसके पिता का नाम भट्ट स्कंद था।इसके पिता मह का नाम क्षेमशिव भट्ट था।वसुदेव भट्ट एक राज दरबारी कवि था। प्रशस्ति के अंत में प्रशस्तिकार अयोध्या देश शब्द का उल्लेख हुआ है। अर्थात कवि का संबंध अयोध्या स्थान से था और संभवतरू उसके पूर्वज कभी वहाँ से हिमालय क्षेत्र में आकर बस गए हों।
सिंह पुर स्थान के अभिज्ञान के संबंध में विद्वानों में मतभेद रहा है।
वही श्री सुशील गौड़ ग्राम लाखामंडल भी इस बात को कहते हैं कि यह स्थल वर्तमान सहारनपुर का सुधगांव सुर्घ्नपुर ही है जो कालसी के अधिक निकट स्थित है। अन्य इतिहासकार डा. यशवंत सिंह कठोच के मतानुसार सिंह पुर स्थान को लाखामंडल क्षेत्र से समीकृत किया गया है। अन्ततरू सातवीं शताब्दी के पश्चात यमुना घाटी क्षेत्र से यदुवंश के शासकों का सदैव के लिए पतन हो गया।

31/12/2015

आपको और आपके परिवार को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ।भगवान आपको नववर्ष में बहुत सुख, समृद्धि , खुशियाँ दे ।एेसी भगवान से हम कामना करते हैं।
राकेश तोमर उत्तराखंडी

11/12/2015

विख्यात कवि एवं साहित्यकार श्री रतनसिंह जौनसारी का आज रात निधन हो गया है. श्री जौनसारी जी 78 वर्ष के थे उनका अंतिम संस्कार 2:00 बजे लखीबाग देहरादून में होगा.
श्री रतनसिंह जौनसारी का जौनसार बावर के साहित्य लोक संस्कृति गीत में बडा योगदान है. जौनसार बावर से संबंधित अनेक पुस्तकों का प्रकाशन भी किया है. श्री जौनसारी जी 60 के दशक में आकाशवाणी से जुड़ गये थे. और क्षेत्र को जागरूक करने के लिए उन्होंने अनेक रचनाओं को प्रस्तुत किया है. उनके निधन से जौनसार बावर ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण प्रदेश को क्षति पहुंची है. अनेक सम्मानों से सम्मानित एवं दर्जनों संस्थाओं के संरक्षक भी थे. वर्तमान में जौनसारी भाषा परिषद् के अध्यक्ष थे. उनके निधन पर द लाखामंडल इंटरनेशनल स्कूल परिवार व युवा केसरी शिक्षण समिति व वीर केसरी चंद समिति व गढ़ बेहराट समाचार पत्र अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है.

10/11/2015

आपको और आपके सहपरिवार को दीपावली पर्व की हार्दिक शुभकामानाएं। इस प्रकाश पर्व में ईश्वर आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करें। ऐसी हमारी प्रार्थना है।

आपका
राकेश तोमर उत्तराखंडी

22/10/2015

बधाई हो हर बेटा आप जैसा मिले। मेरा भतिजा अमित भट्ट हमे गर्व है कि आप मेरे से भी उम्र में छोटे हो । उम्र २३ वर्ष। डायरेक्ट जज वाह तुने तो हमारा ही नहीं पूरे जौनसार बावर का सीना बहुत बड़ा कर दिया। धन्य हो भाई जी श्री माया दत्त भट्ट जी को जिन्होंने ऐसे बेटे को जन्म दिया। जौनसार से सबसे छोटी उम्र का जज।।।भगवान आपको लंबी उम्र दे।

The Lakhamandal International school
16/08/2015

The Lakhamandal International school

10/07/2015

▀श्री इंदर सिंह नेगी के द्वारा।।
लाखामंडल के बारे में कहा जाता हे कि दुर्योधन ने यहाँ लाक्षागृह का निर्माण कराया था जिसमें पाण्डवों को जलाकर मार देने की योजना बनायीं थी किन्तु वो सुरक्षित बच निकल गए थे ! अंग्रेज लेखक वाल्टन के अनुसार “ सम्भवत: यहाँ दुर्ग भी था, यहाँ अभी भी एक सुरंग मिलती हे जो अब दिखाई नहीं देती !’’ आज भी यहाँ खेत खोदने से लेकर हल जोतने में अनेक तरह की मुर्तियें यदा-कदा मिल जाया करती हे ! यहाँ अनेक तरह के शिवलिंग और मूर्तियों का भण्डार हैं साथ ही बड़ी-बड़ी गुफाएं भी हे जो इसके ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व को रेखांकित करता हे ! लाखामंडल के बारे में भी अनेक कहानियां व्याप्त हे, कुछ विद्वान् लाखामंडल को केदारखंड का समृद्ध राज्य मानते हैं, कुछ का तो ये भी मानना हे कि यहाँ की समृद्धि के आकर्षण ने महमूद गजनबी को इसको लुटने के लिए बाध्य किया ! सन १७५७ में रोहिल्लाओं के सरदार नजीब उद्दौला ने और सन १७८६ में उनके पोते गुलाम कादिर ने पुंह: लूटपाट की तथा मूर्तियों को खंडित कर दिया, आज भी अनेक मुर्तियें खण्डित अवस्था में यहाँ विद्यमान हैं ! जौनसार बावर में अनेक तरह की लोक मान्यताएं/कथाएँ, स्थल हैं जिनके बारे में तरह-तरह की दंतकथाएं बढ़े- बुजुर्गों के श्रीमुख से सुनी जा सकती हैं , इसमें से अनेक कथाएँ पाण्डवों के यहाँ से सामीप्य की कहानियाँ वयां करती हे , यहाँ के लोकगीतों में तो पाण्डव नायक के रूप में विद्यमान ही हे अनेक त्योहारों, उत्सवों तथा शादी-व्याह हे अवसर पर गाये जाने वाले लोक गीतों जैसे छोड़े, भारत, बाकणा आदि में पाण्ड्वों का चित्रण हे

अंग्रेजो के समय लगभग १८१५ के आस-पास सिरमौर के राजा और अंग्रेजो के बीच एक संधि हुई थी उसका मकसद ये था कि जौनसार बावर सिरमौर के साथ रहेगा या अंग्रेजो के अधीन, बताते हैं कि इसका उल्लेख “पॉलिटिकल नोट्स ऑफ़ नाहन” में अंकित हे जिसको नागथात की संधि की संज्ञा दी गयी ! नागथात भी किसी समय महत्वपूर्ण स्थल रहा हे, अपनी पुस्तक “यमुना उपत्यका” में राजेन्द्र सिंह राणा “नयन” इस स्थान का सम्बन्ध महाभारतकालीन “नागसत” से जोड़तें हैं ! एक प्रश्न और मेरे जेहन में रह-रहकर उठता हे कि जब ये क्षेत्र इतना समृद्ध था जहां पांडवों ने शरण ली, जहां अशोक ने शिलालेख खुदवाया तो आखिर कौन से कारण रहे जिनके कारण तो जौनसार बावर अन्य से क्षेत्रों से पिछड़ गया ? अंग्रेजो के काल की हम बात करे तो टिहरी रियासत का पौड़ी गढ़वाल का क्षेत्र जिसको ब्रिटिश गढ़वाल कहा गया और सम्पूर्ण कुमाऊं क्षेत्र जो कत्युरी शासन से अंग्रेजो के अधीन आ गया था ये स्थान शिक्षा आदि के क्षेत्र में बहुत आगे निकल गए किन्तु जौनसार बावर क्षेत्र मैदान के इतने निकट होने के बाद भी पीछे रह गया इसका उत्तर खोजना अभी बाकी हे !

हमारा जिसमे की अन्य साथी भी शामिल हे मानना हे कि इस क्षेत्र के इतिहास से सम्बन्धित जितनी भी कड़ियाँ मौजूद हे उनको जोड़ने का काम किया जाय, इसको अलग-अलग कालखंडों में हुए घटनाक्रमों के अनुसार लिखने का काम किया, पांडव काल से लेकर गुप्त काल तक, इसके पश्चात बहुत सा हिस्सा इतिहास से गायब हे इसको खोजा जाए फिर कुछ वर्णन सिरमोर रियासत के समय मिलता हे लेकिन इसके बाद फिर एक अस्पष्टता हे तत्पश्चात अंग्रेजो के समय का वर्णन मिलता हे वो प्रशासनिक और राजनीतिक तो हे किन्तु सामाजिक नहीं हे, आजादी के बाद के इतिहास का भी निरपेक्ष विश्लेषण की जरुरत हे, जिसके चिन्ह हमारे पास अभी मौजूद भी हैं ! इतिहास लेखन एक गंभीर विषय हे जो साथ धेर्य, निरपेक्षता मांगता हे, समय, समर्पण और संसाधन की इस कार्य को करने की महत्वपूर्ण कड़ी हे ! ये काम तभी सम्पन्न किया जा सकता हे जब यहाँ के इतिहास से सम्बन्धित श्रोतों तक पहुँच कर उनको खंगाला जाए. इसके बाद तथ्यों को व्यवस्थित कर लिख लिया जाए !
चूँकि ये किसी समय हिमांचल के सिरमौर का हिस्सा रहा तो कुछ सूत्र वहाँ के संग्राहलयों, पुस्तकालयों में मौजूद भी होंगे, कुछ सरकारी दस्तावेजों मैं से भी सामग्री उपलब्ध हो सकती हे, कुछ पुरात्व बिभाग आदि से भी सामग्री मिल सकती हे ! इन सभी जगहों से सामग्री का एकत्रीकरण किया जा सकता हे, इसके बाद कुछ जानकार लोग इसको क्रमबद्ध करने का काम करें!
अभी तक तो हम लोगो का इतिहास शंक, सुणाद अर्थात मौखिक इतिहास (Oral History), बामणों के साँचो या कुछ पुस्तको में अंशो तक ही सीमित हे ! इस कार्य के लिए अपने लोगो को ही आगे आना ही पड़ेगा, नहीं तो समय के साथ वो इतिहास के ये पगचिह्न भी मिटते जायेंगें ! ध्यान रहे “इतिहास वो नहीं हे जो कहा जाता हे बल्कि वो हे जो लिखा जाता हे ! specially thanks to _indrer singh negi

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