11/10/2022
जला दो इसे फूँक डालो ये दुनिया,
मेरे सामने से हटालो ये दुनिया
तुम्हारी है तुम्ही सम्भालो ये दुनिया,
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है "
साहिर लुधियानवी साहब का ये गीत, गुरुदत्त द्वारा निर्देशित " प्यासा " का है। ये गीत फिल्माया भी गुरुदत्त साहब पर गया है, लेकिन गुरुदत्त साहब इस फिल्म में कभी अभिनय करना नहीं चाहते थे। जब पहले दिन दिलीप कुमार साहब सेट पर लेट हुए, तब गुरु दत्त ने अभिनय करने का फैसला किया और " प्यासा " के " विजय " ने अपना नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया।
गुरु दत्त का जन्म बेंगलुरु में हुआ था। बचपन से ही उनको पढ़ने में इतनी ख़ास रूचि नहीं थी और मैट्रिक्स की परीक्षा पास करके उन्होंने बॉम्बे टॉकीज की फिल्म संग्राम में ,असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर काम किया। यहां उनकी मुलाक़ात दो ऐसे ही बेहतरीन लोगों से हुई जो आगे चल कर भारतीय सिनेमा के दिग्गज बनें। देव आनंद और रेहमान, जिनकी भी ये ,अभिनेता के तौर पर पहली फिल्म थी। उन दिनों इन काफी अच्छी दोस्ती हो गयी और तीनों ने एक साथ फिल्म में काम करने का तय किया। आगे चल कर चेतन आनंद द्वारा बनाई गयी " बाज़ी " में गुरु दत्त ने निर्देशक की भूमिका निभायी। और इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
लेकिन गुरु दत्त कभी खुद से खुश न हो पाए। कुछ ना करने की झुंझलाहट, लोगों द्वारा उनको ना समझा जाना और ऐसी तमाम चीज़ों से गुरु दत्त शराब के आदि हो गए। कोई न कोई कहानी उनके ज़हन में हमेशा रहती थी और उसी में वे इतना खोये रहते थे की उनको किसी और चीज़ की सुध ही नहीं हुआ करती थी। निर्देशन एक प्रकार की स्टोरीटेलिंग ही है, जिसमें शायद वह माहिर थे। उनकी काफी कहानियां आज , लगभग 80 वर्षों बाद भी सार्थक हैं। वहीदा रेहमान ने अपने एक इंटरव्यू में गुरु दत्त साहब को " बोर्न फिल्मकार " कहा था। वे ये भी मानती हैं कि गुरु दत्त साहब की कहानियां, अपने समय से 20 साल आगे है।शायद यही कारण था के उस वक़्त भी लोग गुरुदत्त की फिल्मों को नहीं समझ पाए और उनकी फिल्मों को नकार दिया। " कागज़ के फूल " इन्ही में से एक फिल्म है। भारत की पहली सिनेमास्कोप फिल्म, कागज़ के फूल, उस वक़्त की सबसे आधुनिक तरीके से बनी फिल्म थी लेकिन लोग उस समय तक इस तरह की फिल्मों को नहीं देखना चाहते थे, अतः उन्होंने इसको भी नकार दिया। इस फिल्म का फ्लॉप होना गुरु दत्त नहीं सेहेन कर पाए और मृत्यु की नींद में हमेशा के लिए सो गए।
अबरार अल्वी, जिन्होंने प्यासा और कागज़ के फूल लिखी है उन्होंने गुरु दत्त को किसी भी रिश्ते में न बंधने वाला व्यक्तित्व बताया। गुरु दत्त का अभिनय आज भी कई ड्रामा स्कूलों में पढ़ाया जाता है। गुरु दत्त का मानना था कि अभिनय 80 % आँखों से होता है और 20 % दूसरी चीज़ों से। शायद इसी कारण उनका अभिनय आज भी उनके किरदार को अमर बनाता है।
बहुत से निर्देशक आएंगे और चले जाएंगे लेकिन गुरु दत्त एक ही था, है, और रहेगा।
- उत्कर्ष चतुर्वेदी | Utkarsh Chaturvedi