Varanasi - Banaras - Kashi

Varanasi - Banaras - Kashi Varanasi - The oldest living city in the world.... Varanasi, or Benaras, (also known as Kashi) is one of the oldest living cities in the world.

Varanasi`s Prominence in Hindu mythology is virtually unrevealed. Mark Twain, the English author and literature, who was enthralled by the legend and sanctity of Benaras, once wrote : "Benaras is older than history, older than tradition, older even than legend and looks twice as old as all of them put together" . According to the ‘Vamana Purana’, the Varuna and the Assi rivers originated from the

body of the primordial Person at the beginning of time itself. The tract of land lying between them is believed to be ‘Varanasi’, the holiest of all pilgrimages.

31/03/2026

On this auspicious day, let us rededicate ourselves to Mahavir’s teachings of compassion, forgiveness, and truth.

Experience the spiritual and cultural richness of Varanasi in this immersive 3 Nights - 4 Days journey designed for thos...
29/03/2026

Experience the spiritual and cultural richness of Varanasi in this immersive 3 Nights - 4 Days journey designed for those who wish to explore beyond the usual sightseeing. Starting with a serene boat ride on the sacred Ganges River, witness the mesmerizing Ganga Aarti at Dashashwamedh Ghat – an awe-inspiring ritual of light and chants that embodies the city’s divine spirit. Visit iconic temples such as the Kashi Vishwanath Temple, one of Hinduism’s holiest shrines, and soak in the deep religious significance of Varanasi, believed to be the eternal flame of life.

The second day focuses on Varanasi’s profound spiritual trail, with visits to ancient temples including Annapurna Mandir, Kaal Bhairav Mandir, and the revered Sankat Mochan Hanuman Mandir. Experience the birthplace of Buddhism with a trip to Sarnath, where Lord Buddha delivered his first sermon, exploring the archaeological ruins, museums, and tranquil stupas.

Day three uncovers Varanasi’s hidden gems, starting with Swarved Mahamandir, a modern temple dedicated to meditation and spiritual growth. Explore the historic Ramnagar Fort with its royal museum and riverside views, and visit Banaras Hindu University’s Bharat Kala Bhawan Museum, showcasing India’s rich cultural heritage. The journey concludes with the New Kashi Vishwanath Temple, a serene place for reflection. This itinerary offers a deep, soulful exploration of Varanasi’s timeless charm.

Discover the eternal city of Varanasi with ghats, temples and Ganga Aarti on a deeply spiritual 3 Nights - 4 Days journey through sacred India.

 #देवराहा_बाबा भारत के उत्तर प्रदेश के देवरिया जनपद को एक योगी, सिद्ध महापुरुष एवं सन्तपुरुष ने अपने नाम से ख्याति दिलाई...
18/12/2025

#देवराहा_बाबा

भारत के उत्तर प्रदेश के देवरिया जनपद को एक योगी, सिद्ध महापुरुष एवं सन्तपुरुष ने अपने नाम से ख्याति दिलाई। कहा जाता है कि इनके दर्शन मात्र से जीवन सफल हो जाता है। वह अपने चमत्कार से हजारों लोगों को तृप्त करते रहे। उनके आशीर्वाद को आतुर सिर्फ़ आम लोग ही नहीं, बल्कि कई विशिष्ट लोग भी थे।उनके भक्तों में जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री , इंदिरा गांधी, राजेन्द्र प्रसाद, महामना मदन मोहन मालवीय, पुरुषोत्तमदास टंडन, जैसी महान विभूतियां रही हैं। अत्यंत सहज, सरल और सुलभ बाबा के सानिध्य में जैसे वृक्ष, वनस्पति भी अपने को आश्वस्त अनुभव करते रहे। कुछ ऐसे ही थे चमत्कारिक, अलौकिक रहस्यमई ‘देवरहा बाबा’।देवरहा बाबा की उम्र आज भी रहस्य है।

लोगों का विश्वास है कि वे दो शताब्दी से भी अधिक जिए। बाबा के संपूर्ण जीवन के बारे में अलग-अलग मत है। कुछ लोग उनका जीवन 250 साल तो कुछ लोग 500 साल मानते हैं। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने उन्हें अपने बचपन में देखा था। उनके अनुसार इस बात के पुख्ता सबूत थे कि बाबा की आयु बहुत अधिक थी।इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक बैरिस्टर के अनुसार उनका परिवार 7 पीढ़ियों से बाबा का आशीर्वाद लेता रहा था।

19 जून, 1990 को योगिनी एकादशी के दिन अपने प्राण त्यागने वाले बाबा के जन्म के बारे में आज तक संशय है। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि वह करीब 900 साल तक जिन्दा रहे थे।देवरहा बाबा को खेचरी मुद्रा पर सिद्धि थी, जिस कारण वे अपनी भूख और आयु पर नियंत्रण प्राप्त कर लेते थे। बाबा का आशीर्वाद देने का ढंग निराला था। मचान पर बैठे-बैठे ही अपना पैर जिसके सिर पर रख दिया, वह धन्य हो गया। श्रद्धालुओं के कथनानुसार बाबा अपने पास आने वाले प्रत्येक व्यक्ति से बड़े प्रेम से मिलते थे और सबको कुछ न कुछ प्रसाद अवश्य देते थे।प्रसाद देने के लिए बाबा अपना हाथ ऐसे ही मचान के खाली भाग में रखते थे और उनके हाथ में फल, मेवे या कुछ अन्य खाद्य पदार्थ आ जाते थे, जबकि मचान पर ऐसी कोई भी वस्तु नहीं रहती थी।

श्रद्धालुओं को कौतुहल होता था कि आखिर यह प्रसाद बाबा के हाथ में कहां से और कैसे आता है। जनश्रूति के मुताबिक वह खेचरी मुद्रा की वजह से आवागमन से कहीं भी कभी भी चले जाते थे। उनको जानवरों की भाषा समझ में आती थी। खतरनाक जंगली जानवरों को वह पल भर में काबू कर लेते थे।बाबा की सिद्धियों के बारे में हर तरफ खूब चर्चा होती थी। कहते हैं कि जॉर्ज पंचम जब भारत आए तो उनसे मिले। जॉर्ज को उनके भाई ने देवरहा बाबा के बारे में बताया था कि भारत में सिद्ध योगी पुरुष रहते हैं। उन्होंने जॉर्ज से कहा था कि अगर भारत जाओ तो किसी और से मिलो या न मिलो, देवरिया जिले में दियरा इलाके में, मइल गांव जाकर, देवरहा बाबा से जरूर मिलना। भारत के प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को बचपन में जब उनकी मां बाबा के पास ले गईं, तो उन्होंने कह दिया था कि यह बच्चा बहुत ऊंची कुर्सी पर बैठेगा। राष्ट्रपति बनने पर डॉ राजेंद्र प्रसाद ने बाबा को एक पत्र लिखकर कृतज्ञता प्रकट की थी।

कोई 1987 के जून महीने की बात है। देवरहा बाबा का वृंदावन में यमुना पार पर डेरा जमा हुआ था। प्रधानमंत्री राजीव गांधी को बाबा के दर्शन करने के आतुर थे। अधिकारियों में उनकी सुरक्षा को लेकर हलचल मची हुई थी। प्रधानमंत्री के आगमन का ब्लू प्रिंट तैयार हो चुका था। आला अफसरों ने हैलीपैड बनाने के लिए वहां लगे एक बबूल के पेड़ की डाल काटने के निर्देश दिए। यह सुन कर बाबा आग-बबूला हो गये।उन्होंने साफ शब्दों में अधिकारियों को बोला,“तुम यहां अपने पीएम को लाओगे, उनकी प्रशंसा पाओगे। पीएम का नाम भी होगा कि वह साधु-संतों के पास जाता है, लेकिन इसका दंड तो बेचारे पेड़ को भुगतना पड़ेगा वह मुझसे इस बारे में पूछेगा तो मैं उसे क्या जवाब दूंगा? यह पेड़ होगा तुम्हारी निगाह में, मेरा तो यह सबसे पुराना साथी है। दिन-रात मुझसे बतियाता है। यह पेड़ नहीं काटा जाएगा।”अफसरों ने अपनी दुविधा प्रकट की बाबा ने ही उन्हें सांत्वना दी और कहा कि फिक्र मत करो, अब तुम्हारे प्रधानमंत्री का कार्यक्रम टल जाएगा। तुम्हारे पीएम का कार्यक्रम मैं कैन्सिल करा देता हूं। दो घंटे बाद ही पीएम ऑफिस से रेडियोग्राम आ गया कि प्रोग्राम स्थगित हो गया है। कुछ हफ्तों बाद राजीव गांधी वहां स्वयं बाबा के दर्शन करने के लिए आए, लेकिन पेड़ नहीं कटा। इसे क्या कहेंगे चमत्कार या संयोग?देवरहा बाबा से ही प्रभावित होकर इंदिरा गांधी ने कांग्रेस का चुनाव चिह्न हाथ का पंजा निर्धारित किया।

आपातकाल के बाद हुए चुनावों में जब इंदिरा गांधी को पराजय का सामना करना पड़ा, तो वह भी देवरहा बाबा के चरणों में आईं। ऐसा लोग कहते हैं कि देवरहा बाबा ने अपने हाथ के पंजे से उन्हें आशीर्वाद दिया। उसी के बाद से इंदिरा गांधी ने कांग्रेस का चुनाव चिह्न हाथ का पंजा निर्धारित कर दिया। इसके बाद 1980 में इंदिरा के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने प्रचंड बहुमत प्राप्त किया और वह देश की प्रधानमंत्री बनीं।

राम नाम नित उर पे मारो ब्रह्म दिखे संशय न जानो,देवरहा बाबा भगवान राम के परम भक्त थे। देवरहा बाबा के मुख में सदा राम नाम का वास था। वह भक्तों को राम मंत्र की दीक्षा दिया करते थे। वह सदा सरयू के किनारे रहा करते थे। उनका कहना थाः एक लकड़ी ह्रदय को मानो दूसर राम नाम हिचानो।राम नाम नित उर पे मारो ब्रह्म दिखे संशय न जानो। देवरहा बाबा जनसेवा तथा गोसेवा को सर्वोपरि-धर्म मानते थे। प्रत्येक दर्शनार्थी को लोगों की सेवा, गोमाता की रक्षा करने तथा भगवान की भक्ति में रत रहने की प्रेरणा देते थे। देवरहा बाबा श्री राम और श्री कृष्ण को एक मानते थे और भक्तों को कष्ट से मुक्ति के लिए कृष्ण मंत्र भी देते थे।

बाबा देवरहा 30 मिनट तक पानी में बिना सांस लिए रह सकते थे। उनको जानवरों की भाषा समझ में आती थी। खतरनाक जंगली जानवरों को वह पल भर में काबू कर लेते थे। उनके भक्त उन्हें दया का महासमुंदर बताते हैं। जो भी आया, बाबा की भरपूर दया लेकर गया। वर्षाजल की भांति बाबा का आशीर्वाद सब पर बरसा और खूब बरसा।मान्यता थी कि बाबा का आशीर्वाद हर मर्ज की दवाई है। कहा जाता है कि बाबा देखते ही समझ जाते थे कि सामने वाले का सवाल क्या है। दिव्यदृष्ठि के साथ तेज नजर, कड़क आवाज, दिल खोल कर हंसना, खूब बतियाना बाबा की आदत थी। याददाश्त इतनी कि दशकों बाद भी मिले व्यक्ति को पहचान लेते और उसके दादा-परदादा तक का नाम व इतिहास तक बता देते।पंद्रह जून 1990 में योगिनी एकादशी का दिन और घनघोर बादल छाए थे। मौसम अचानक तेज आंधी- तूफान ले आई। यमुना नदी जैसे समुंदर को मात करने पर उतावली थी। लहरों का उछाल बाबा की मचान तक पहुंचने लगा और इन्हीं सबके बीच शाम चार बजे बाबा का शरीर स्पंदनरहित हो गया।

बाबा ब्रह्मलीन हो गए। उन्हें मचान के पास ही यमुना की पवित्र धारा में जल समाधि दी गई। जन स्वास्‍थ्य के लिए प्रेरित उनकी योगिक क्रियाएं, आध्यात्मिक उन्नति को समर्पित उनकी तपस्या और ध्यान अनंतकाल तक सबके लिए प्रेरणा बना रहेगा, ऐसे सिद्ध संतों का सभी को आर्शीवाद मिलता रहे।

जन्माष्टमी का दिन... लखनऊ...गोमती नगर विपुल खंड...में 3 साल का मासूम कार्तिक खेलते-खेलते ऊपर से लगभग 20 फीट नीचे लोहे की...
24/08/2025

जन्माष्टमी का दिन... लखनऊ...गोमती नगर विपुल खंड...में 3 साल का मासूम कार्तिक खेलते-खेलते ऊपर से लगभग 20 फीट नीचे लोहे की ग्र‍िल पर ग‍िर गया।

नुकीली लोहे की ग्र‍िल उसके स‍िर के आरपार हो गयी...

वेल्‍डर आया.... ग्र‍िल को काटा गया...

पर‍िजन मासूम को लेकर प्राइवेट अस्‍पताल गये। 15 लाख रुपए का बजट बता द‍िया गया।

आधी रात न‍िराश पर‍िजन बच्चे को लेकर लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी पहुँचे...

नन्हे सिर को चीरती हुई लोहे की छड़ किसी निर्दयी तकदीर की तरह आर-पार हो चुकी थी।

डॉक्टरों ने जब यह देखा, तो कुछ क्षण के लिए वहाँ भी सन्नाटा छा गया।

इसी खामोशी के बीच आगे बढ़ते हैं....

डॉ.अंकुर बजाज..

सर्जन के हाथ में स्केलपल नहीं, बल्कि साहस का संकल्प था। और उसी साहस के सहारे वह ऑपरेशन थियेटर में प्रवेश करते हैं। बच्चे की जिंदगी उनके सामने है, जैसे कोई दीपक आंधी में कांप रहा है और उन्हें उसे बुझने से बचाना है।

लेक‍िन डॉक्‍टर अंकुर के ल‍िए यह आसान नहीं था। आसान भी कैसे होता। थोड़ी देर पहले ही तो वे अपनी माँ के साथ सबसे कठिन वक्त में थे। माँ को दिल का दौरा पड़ा था। कार्डियोलॉजी में इलाज चल रहा था। 3 स्टेंट पड़े और हालत नाजुक बनी थी। एक तरफ माँ की साँसें अटकी थीं तो दूसरी तरफ कार्तिक का जीवन लोहे की छड़ में उलझा था।

लेकिन डॉक्टर बजाज ने उसे चुना, ज‍िस पेशे को धरती का सबसे सुंदर माना जाता है। आधी रात ट्रामा सेंटर पहुँचे...छः घंटे से ज्‍यादा चली यह जटिल सर्जरी...जिसका हर पल जोखिम से भरा हुआ था...हर क्षण धैर्य की परीक्षा...

और आखिरकार वह लोहे की छड़ को बच्चे के शरीर से अलग कर दिया गया।

डॉ. अंकुर बजाज और उनकी टीम ने यह साबित कर दिया कि डॉक्टर सिर्फ शरीर नहीं जोड़ते, वे टूटते हुए रिश्तों को, डगमगाते हुए भविष्य को, और डूबते हुए भरोसे को भी बचा लेते हैं। डॉक्‍टर डॉ. बीके ओझा, डॉ. अंकुर बजाज, डॉ. सौरभ रैना, डॉ. जेसन और डॉ. बसु के अलावा एनेस्थीसिया विभाग के डॉ. कुशवाहा, डॉ. मयंक सचान और डॉ. अनीता ने असभंव को संभव कर द‍िखाया, वह भी 25 हजार के खर्चे पर।

आज जब हम डॉक्टरों को महज फीस और समय से जोड़कर देखते हैं, तब हमें याद रखना चाहिए कि कहीं कोई डॉक्टर ऐसे ही किसी अंधेरे में रोशनी की लौ बनकर खड़ा है।

Mritunjay Kumar जी की वाल से। 🤘

Assi Ghat, Varanasi...
11/06/2025

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Dive into the soulful side of Varanasi at Assi Ghat with VBK. Experience Ganga Aarti, yoga by the river, and ancient legends.

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09/06/2025

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