26/05/2019
जीवन की जरूरतें हैं - हवा, पानी और भोजन। जीवन की जरूरतों के बाद आती हैं सामाजिक जरूरतें - रोजगार, सम्मान, आजादी, बराबरी, निष्पक्ष प्रशासन आदि। उसके बाद आती हैं संसाधनों की जरूरतें - सड़क, बिजली, इन्टरनेट, रसोई गैस आदि। इन जरूरतों की पूर्ति "विकास" को परिभाषित करती है। यदि ये आसानी से उपलब्ध हैं तो समाज (देश) विकसित है। अन्यथा समाज को अभी विकास करना है। गाँव में अभी बहुत से लोग हैं जिनको उपरोक्त वर्णित कई चीजें उपलब्ध नहीं हैं जैसे - कायमपुर निबरवारा संपर्क मार्ग टूटा हुआ है जिसकी सबको ही जरूरत है। मजे की बात ये है कि जिनको ये चीजे उपलब्ध नहीं हैं उन्हें इनकी अनुपलब्धता से कोई फर्क भी नहीं पड़ता। उनको इस बात की फिकर नहीं है जुलाई के अंत तक बाबा रोड पर घुटनों तक गड्ढे हो जायेंगे। गड़हा और गोंदहा का पानी खेतो में भर जायेगा जिससे फसलें डूब जायेंगी। मतलब भोजन और सड़क की समस्या पैदा हो जाएगी। उनको फिकर है तो प्रधान जी न रूठ जायें। कोटेदार जी न रूठ जायें। विधायक जी न रूठ जायें। सांसद जी न रूठ जायें। इस सोच के साथ जिया जा सकता है पर विकास नहीं किया जा सकता। सरकारें देश के विकास के लिए ( हवा, पानी, भोजन, रोजगार, सम्मान, आजादी, बराबरी, निष्पक्ष प्रशासन, सड़क, बिजली, इन्टरनेट, रसोई गैस के लिए) बहुत सारी योजनायें लाती हैं पर ये योजनायें प्रधान, कोटेदार, विधायक, सांसद की जेबों में रह जाती हैं। देश का विकास तभी होगा जब "जरूरतमंद" प्रधान, कोटेदार, विधायक, सांसद की फिकर छोड़कर उनसे योजनाओं का हिसाब मांगेंगे। जब जरूरतमंद अपना हक़ मांगेंगे प्रधान, कोटेदार, विधायक, सांसद समझ जायेंगे कि योजनायें देश के विकास के लिए हैं उनके निजी विकास के लिए नहीं। अगर ये लड़ाई जीतनी है तो जरूरतमंदों को खुद आगे आना होगा - खुद लड़ना होगा।