15/04/2026
दिशा हीन कांग्रेस
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किसी भी देश के लोकतंत्र में पक्ष के साथ विपक्ष की भी महति भूमिका होती है,जब बात राष्ट्र की अस्मितता की आती है तब विपक्षी दल पक्ष के साथ खडे होकर देश के दुश्मनों के विरूद्ध एकजुट हो जाते हैं।
सामान्यतया तो ऐसा ही होता है लेकिन कांग्रेस जिसने कई दशकों तक देश में सत्ता संभाली है, जबसे वही कांग्रेस जब विपक्ष में रहने लगी तो वो अपने नेताओं पर अंकुश लगाने लग गई,अंकुश भी इस बात के लिए कि कोई हिन्दूवादी से घनिष्ठता नहीं दिखा सकता,जब बात राष्ट्रीयता की हो तो वहाँ किसी नेता को उपस्थित नहीं होना चाहिए,कोई भी राष्ट्रवादी संघटन के कार्यक्रमों में नहीं जाना चाहिए।
जो कट्टरपंथी हों,राष्ट्रद्रोही हों,हिन्दुत्व विरोधी हो,उनके पास यदि कोई उनका नेता जाऐ तो पार्टी उसके साथ खडी दिखती है। यही नीति भारत के सामान्य नागरिक से कांग्रेस को दूर करती जा रही है।
स्वतंत्रता के समय कांग्रेस के साथ अधिकतर राष्ट्रवादी नेता थे लेकिन, सरदार वल्लभ भाई पटेल, लाल बहादुर शास्त्री जी,नरसिंह्मा रावजी और प्रणव मुखर्जी जी जैसे नेताओं के उपरान्त कांग्रेस में राष्ट्रवादी सोच लुप्तप्राय हो गई है,जबसे सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी पार्टी के केन्द्र में आये तबसे पार्टी दिशा विहीन होती ही जा रही है। बहुत से राष्ट्रवादी नेता या तो पार्टी छोड़कर चले गये,कुछ ने अपनी आवाज धीमी कर दी और कुछ दिशाहीन होकर कभी साथ दिखते हैं और कभी अलग।
कई राज्यों में जो पार्टी कांग्रेस के विरोध में बनी वो उनकी ही घटक बन गई। शरद पंवार की राकपा,ममता बनर्जी की टीएमसी और कई क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन कर अपने अस्तित्व को ही चुनौती दे दी,आज अधिकतर राज्यों में कांग्रेस का ग्राफ गिर चुका है और अब विपक्ष के नाम पर कोई सशक्त आवाज नहीं रह गई है।
दूसरी ओर भाजपा जैसे जैसे अपना ग्राफ बढा रही है,अपने मूल स्वभाव से समझौता करते हुए कांग्रेस या अन्य दलों से निकले नेताओं को जल्दीबाजी में अपने साथ मिला रही है जो आने वाले समय में चुनौती के रूप में सामने आ सकता है,जिसकी विचारधारा ही आपसे मेल नहीं खाती उसे साथ लेने से आपका कैसा लाभ,या तो वो तात्कालिक लाभ लेकर अपने आचरण के अनुरूप गडबड करेगे या वो फिर से अपने विचार में जा मिलेंगे।आपके पास पहले से ही राष्ट्रवादी और विचारवान कार्यकर्ताओं की विराट सेना है,ऐसे में संभव है कि आपका चरित्रवान नेता/कार्यकर्ता भी बाहरी के चरित्र से प्रभावित हो सकता है और बहक सकता है। इसलिए जल्दीबाजी नहीं दिखाते हुए कुछ महीने परीक्षण का समय दिया जाऐ जिससे बाहरी को रीति-नीति समझकर अपना चरित्र ठीक करने का अवसर मिले।
विपक्ष का इस प्रकार राष्ट्र के विकास और सामरिक विषयों में सकारात्मक ना रहना,देश के दुश्मनों को सहयोग देना और हर बात में अनर्गल बात कर संसद का समय व्यर्थ करते ही रहना पूर्ण रूप से देश के विकास में बाधक है,जो दुर्भाग्य पूर्ण है। कांग्रेस को अभी भी अपना नेतृत्व किसी गाँधी परिवार के बाहर के योग्य नेता के हाथ में दे देना चाहिए जिससे वहाँ परिवारवाद से निकलकर राष्टीयता के साथ देश के विकास में सत्ताधारी दल के साथ संवाद रखते हुए अपने दल के विचार को सकारात्मक होकर देश की जनता के मन की बात को समझ में रखते हुए आगे बढा जा सके और यदि अभी भी कांग्रेस नहीं चेती तो देश में क्षेत्रीय दल ही विपक्ष की भूमिका में रहेंगे जो उचित नहीं होगा,उनकी अपनी स्वार्थ की क्षेत्रीय राजनीति होती है,समग्र देश के लिए वो नहीं सोचते। ऐसे में कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ और अनुभवी लोगों को प्रयास तो अवश्य ही करना चाहिए...
"मुकेश आर. बी"
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स्वतंत्र लेखक