15/08/2023
वैचारिक-मानसिक गुलामी से मुक्तता
स्वाधीन होने के बाद स्वतंत्र होना यह जो स्वाभाविक प्रक्रिया है, वह भारत में न हो सकी। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि, हम लोग अपने 'स्व' को भूल गए। याने अपना इतिहास, अपने महापुरुष, उनका जीवन और ज्ञान के प्रत्येक क्षेत्र में उनका योगदान और इस कारण उन के प्रति गर्व का भाव, समान आकांक्षा-स्वप्न, तत्त्वज्ञान, विचारप्रणाली, जीवनदृष्टि, विश्वदृष्टि, निसर्गदृष्टि, अच्छे-बुरे की और शत्रु-मित्र की समान संकल्पना इत्यादि सब भूल गए। संक्षेप में कहा जाए तो, हम हमारी संस्कृति को भूल गए। यह सब कुटिल अंग्रेजों के मात्र १५०-२०० वर्षों के शासन के दौरान हुआ, जो अरब-तुर्क-मंगोल-मुगल इत्यादि के ५००-६०० वर्षों के शासन के दौरान भी न हो सका था। इसका सबसे प्रमुख कारण है, अंग्रेजों द्वारा फैलाए गए वैचारिक संभ्रम और उनके द्वारा लागू की गई शिक्षा पद्धति, जिस में शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी को बनाया गया। इस कारण अंग्रेजी भाषा के साथ हमारे लोगों में 'अंग्रेजियत' भी आती गई और हम मन-मस्तिष्क से अंग्रेजों जैसा सोचनेवाले बनते गए, जिसे 'काला अंग्रेज' या 'भूरा-अंग्रेज' कहा जाता है। एक प्रकार से हम वैचारिक-मानसिक गुलाम बन गए। हम colonized mindset वाले बन गए। अतः सबसे पहले हमें अपनी वैचारिक-मानसिक गुलामी को हटाना होगा। अपने मन-मस्तिष्क का decolonization करना होगा।
[(कुछ ऐसी बातें, जिन की ओर ध्यान दिया जाना चाहिए और उन पर गर्व किया जाना चाहिए -
१) उपरोक्त समस्त परकीय शासनवाले कालखण्ड में आक्रामकों का शासन भारत के समस्त भूभाग पर कभी भी नहीं रहा है। अर्थात् 'संपूर्ण भारत' कभी भी पराधीन नहीं रहा है।
२) आक्रामकों को सारे देश में (ग्राम, नगर, वनांचल, पहाड़ी क्षेत्र इत्यादि सभी में) सदैव ही कड़े संघर्ष का सामना करना पड़ा है, उन का शासन प्रस्थापित करने के लिए भी और उनका शासन आने के बाद भी। अर्थात् हमारा संघर्ष
सतत और सर्वव्यापी रहा है। (यह ध्यान में रखना होगा कि स्वातंत्र्यवीर सावरकर द्वारा लिखित ग्रंथ '१८५७ का स्वातंत्र्य समर' में भी इसे प्रथम स्वातंत्र्य समर नहीं कहां गया है, जिस का अर्थ यह है कि १८५७ से पहले भी स्वातंत्र्य प्राप्ति के लिए अनेक प्रयास हुए थे। )
३) इस सतत चलनेवाले देशव्यापी संघर्ष में सारे समाज की भागीदारी रही है। इसमें सभी जाति, पंथ, भाषा, प्रांत और वृत्ति (राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, शैक्षणिक, साहित्यिक, वैज्ञानिक, पत्रकार, कर्मचारी, व्यवसायी, कृषक, उद्योजक, श्रमिक इत्यादि) के सभी आयुवर्ग और आर्थिक स्थितिवाले स्त्री-पुरुषों की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भागीदारी रही है। अर्थात् हमारा संघर्ष सर्वस्पर्शी रहा है।
४) स्वाधीनता प्राप्ति के लिए हमने सब प्रकार के प्रयास देश में (और विदेशों में भी) किये हैं - सशस्त्र, सैन्य गठन, अहिंसक, असहयोग, विद्रोह इत्यादि । ५) आक्रामकों द्वारा बलपूर्वक मतांतरण (forced conversion) करते हुए हमारी सांस्कृतिक पहचान को समाप्त करने के सतत प्रयास करने के बाद भी, हम अपनी सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखते हुए स्वाधीन हुए हैं,
जब कि विश्व के अधिकांश देश ऐसा नहीं कर सके हैं।] वैचारिक-मानसिक गुलामी से मुक्तता (Decolonization) का काम करने से पहले हमें यह जानना आवश्यक है कि अनेक बातों के संदर्भ में हममें किसी न किसी प्रकार की गुलामी विद्यमान है। तभी हम उसे हटाने में सफल होंगे।
वैचारिक-मानसिक गुलामी के कुछ नित्य जीवन के उदाहरण देखे जाएँ। (ये बिलकुल छोटे लग सकते हैं; नगण्य लग सकते हैं। परन्तु ऐसी बातों से ही मानसिकता बनती है, और एक बार मानसिकता गलत हो जाए तो बड़ी-बड़ी बातों में भी गुलामीवाली मानसिकता हो जाती है और उसके अनुसार विचार और आचरण होने लगता है। इसलिए यदि हम छोटी-छोटी और नगण्य दिखनेवाली बातों की चिंता कर लेते हैं, तो धीरे-धीरे बड़ी-बड़ी और महत्त्वपूर्ण बातें भी ठीक होती जाएँगी। कहा ही जाता है कि, 'Take care of pennies, pounds will take care of themselves'.)
- अंग्रेजों द्वारा फैलाये गए वैचारिक संभ्रमों कारण आज भी अधिकांश लोग जनजातीय समाज को 'आदिवासी' (याने मूल निवासी) कहकर अनजाने में स्वयं को वे भारत के मूल निवासी नहीं हैं ऐसा मान लेते हैं। 'आर्यों का
आक्रमण' इस सिद्धांत को मानने का भी यही अर्थ है कि हम स्वयं को भारत का मूल निवासी नहीं मानते हैं।
'धर्म' और 'पंथ' (religion) को समानार्थी मानने के कारण ही हम 'Secular' को हिन्दी में 'धर्मनिरपेक्ष' कहकर 'धर्म' की व्यापक संकल्पना को संकुचित कर लेते हैं और 'राजनीति में धर्म नहीं होना चाहिए' ऐसी बात कहने लगते हैं। (हम यह भूल जाते हैं कि महात्मा गांधीजी ने कहा था कि 'धर्मविहीन राजनीति वेश्या के समान है' और हमारे संविधान के प्राक्कथन में जब ' Secular' यह शब्द जोड़ा गया तब हिन्दी अनुवाद में उसे 'पंथनिरपेक्ष कहा गया है, न कि 'धर्मनिरपेक्ष' ।)
कोई छात्र त्रिकोण बनाकर उसे नाम देता है 'ABC" । यदि उसे कहा जाए कि हिंदी में नाम दो, तो वह देगा 'अ ब क' (जो ABC का हिंदी अनुवाद है)। अंग्रेजी में ABC इसलिए देता है कि, वे रोमन लिपि (जिसमें अंग्रेजी लिखी जाती है) के पहले तीन अक्षर हैं। अतः यदि हिंदी में नाम देना है तो देवनागरी लिपि (जिसमें हिंदी लिखी जाती है) के पहले तीन व्यंजन (स्वरों को छोड़ते हुए) देने चाहिए, जो होंगे 'कखग' ।
किसी छात्र को 'उनतालीस' या 'बैंगनी' या 'टखना' समझ में नहीं आता, उसे ‘thirty nine' या 'violet' या 'ankle' ही समझ में आता है। - किसी के सामने 'गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत' (Gravitational Force) कहा जाता है, तो तुरंत उसके मन में नाम आता है 'न्यूटन' का। 'भास्कराचार्य'
का नाम उसके मन में नहीं आता, जबकि भास्कराचार्य ने न्यूटन के सैकड़ों वर्ष
पहले गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत का आविष्कार किया था।
- अंग्रेजों और अन्य पश्चिमी देशों के लोगों को कुछ भारतीय नामों का सही उच्चारण करना नहीं आता इसलिए वे उन का उच्चारण गलत ढंग से करते हैं और उसी प्रकार से उन का अंग्रेजी में spelling भी करते हैं। हमने उन गलत spelling वाले शब्दों को न मानते हुए उनके उच्चारण के अनुसार ही उनका spelling करना चाहिए। लेकिन ऐसा न करते हुए, हम में से अधिकांश लोग उस गलत spelling को ही लिखने लगते हैं और फिर उसी के अनुसार वे उस शब्द
का उच्चारण भी गलत ढंग से करने लगते हैं। उदाहरण के लिए अशोक (Ashok)। अंग्रेज इस शब्द का सही उच्चारण नहीं कर सकते इसलिए वे कहते हैं 'असोका' और उसे अंग्रेजी में लिखते हैं 'Asoka'। फिर हम में से अनेक लोग उनकी देखा-देखी ऐसा ही करने लगते हैं। 'होटल अशोक' या 'अशोक
'सोसायटी' को वे अंग्रेजी में 'Hotel Asoka' या 'Asoka society' तो लिखते ही है, उन्हें हिन्दी में 'होटल असोका' या 'असोका सोसायटी' भी कहने-लिखने लगते हैं। इस तरह के अनेक (नामों के और शब्दों के) उदाहरण देखे जा सकते हैं।
★ हममें से अधिकांश लोग अपना जन्मदिन या अपने जीवन के अन्य महत्त्व के दिन (जैसे विवाह जनवरी-फरवरी इत्यादि के रूप में ही जानते हैं और मनाते हैं; चैत्र वैशाख इस रूप में नहीं। हममें से अधिकांश लोग नववर्ष भी १ जनवरी को ही मनाते हैं, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को या अपनी परंपरा के अनुसार अन्य किसी दिन नहीं।
- कुछ देशों के समूहों को कोई नाम दिया जाता है, जैसे- सौदी अरेबिया, संयुक्त अरब अमीरात, ओमान, कुवैत इत्यादि खाड़ी के देशों को यूरोपवालों ने नाम दिया है ‘Mid-East Countries', क्योंकि वे यूरोप की पूर्व दिशा में हैं, लेकिन सुदूर पूर्व में नहीं। उनकी देखा-देखी भारत के अधिकांश लोग भी इन देशों का उल्लेख इसी तरह करते हैं, जबकि भारत की दृष्टि में ये देश Mid- West Countries हैं। (यह तो ऐसे ही हुआ कि, दिल्ली वाले कहते हैं कि नागपुर दक्षिण में है इसलिए चेन्नई वाले भी कहें कि नागपुर दक्षिण में है।) यदि Mid-West Countries नहीं कहना है तो 'खाड़ी के देश' या 'अरब देश' भी कहा जा सकता है। ‘Mid- East Countries' क्यों कहना ?
- किसी की मृत्यु होने पर शोकसंदेश भेजते समय (विशेष रूप से SMS या WhatsApp पर) आजकल RIP कहने का चलन बढ़ गया है। RIP याने Rest In Peace. किसी भी ईसाई व्यक्ति को मृत्यु के बाद कब्र में दफनाया जाता है। उनकी मान्यता के अनुसार उन में पुनर्जन्म नहीं होता, अतः Day Of Judgement तक उन्हें कब्र में ही रहना होता है। उस समय तक वे वहाँ शांतिपूर्वक रहें ऐसी कामना करने के लिए उन में Rest In Peace (RIP) कहने का चलन है। परंतु हिन्दू मान्यता के अनुसार मृत्यु के बाद पुनर्जन्म या मोक्ष होता है, अतः हिन्दुओं में 'ईश्वर उन्हें सद्गति प्रदान करे' या 'ईश्वर उन्हें मुक्ति दे' इस अर्थ के शोकसंदेश भेजे जाते हैं। परन्तु मृत व्यक्ति हिन्दू हो या ईसाई या अन्य कोई, सब के लिए शोकसंदेश में RIP कहने का चलन बढ़ रहा है।
अंग्रेजों के शासन के कारण हममें वैचारिक/मानसिक गुलामी आई, जिसके कारण जाने-अनजाने हम उन की भौंडी नकल करने लगे। आज की परिस्थिति ऐसी है कि, अमरीका के आकर्षण के कारण जाने-अनजाने हम उनकी भी भौंडी
नकल करने लगे हैं। हमें इस बात से भी बचना होगा। 1- अमरीका के चलचित्र जगत का मुख्य केंद्र Hollywood इस नाम से जाना जाता है। भारतीय चलचित्र जगत का मुख्य केंद्र मुंबई है, जिसे पहले Bombay कहा जाता था। अमरीका जैसा दिखना चाहिए इसलिए 'Bombay Film Industry' को Hollywood की तरह 'Bollywood' कहा जाने लगा। अब तो भारत में अन्य चलचित्र जगतों को भी ऐसे ही नाम दिए जाने लगे हैं। जैसे Pollywood (पंजाबी), Tollywood (तेलुगु), Mollywood (मलयालम), Bhojiwood (भोजपुरी) इत्यादि ।
[यह ध्यान देने योग्य है कि, विश्व के प्रमुख देश ऐसा नहीं करते। उदाहरण के लिए इंग्लैण्ड, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया और जापान के चलचित्र जगत के मुख्य केंद्र क्रमशः London, Paris, Sydney और Tokyo में हैं। लेकिन वे उन्हें Hollywood की तरह Lollywood, Pollywood, Sollywood, या Tollywood नहीं कहते। कुछ छोटे देश अवश्य ऐसा करते हैं। जैसे Nigeria (Nollywood), Uganda (Ugawood), Tanzania (Sollywood - क्योंकि तांजानिया की भाषा है स्वाहिली), Zimbabwe (Zolleywood) इत्यादि । ]
११ सितंबर २००१ को अल कायदा के आतंकवादियों ने न्यूयार्क के जगप्रसिद्ध Twin Towers को ध्वस्त कर दिया था। इस घटना को '९/११' इस तरह से जाना जाता है। (अमरीका में दिन बताने की पद्धति है महीना / दिनांक / वर्ष, इसलिए वहाँ '९/११' का अर्थ है सितंबर महीने की ग्यारह तारीख।) भारत में मुंबई की लोकल ट्रेनों में लश्करे तैयबा के आतंकवादियों ने ११ जुलाई २००६ को एक के बाद एक भयानक बम विस्फोट किए जिन में बडी संख्या में लोग मारे गए थे। इस घटना को भारत में (अमरीका की तरह) '७/११' इस तरह से जाना जाता है, जबकि भारत की दिन बताने की पद्धति के अनुसार (दिनांक / महीना / वर्ष) इसे '११/७' इस तरह से जानना चाहिए था (ग्यारह तारीख, जुलाई का महीना)। [२६ नवंबर २००८ को मुंबई में हुए आतंकवादी हमलों को '२६/११' इस तरह भारत की दृष्टि से सही तरीके से जाना जाता है। परन्तु यह भूल सुधार है या '९/११' और '७/११' से तुकबन्दी मिलाने का प्रयास ? ]
इस तरह अनेक छोटे-छोटे दिखनेवाले उदाहरण देखें जा सकते हैं। इनके बारे में यदि सावधानी रखी जाती है, तो मन-मस्तिष्क का Decolonization
होने में सहायता होती है और उसके बाद बड़ी बातों के संबंध में भी हम सही प्रकार से सोचने लगते हैं। परन्तु, इसके लिए Decolonization के बाद मन- मस्तिष्क का Reculturization होना भी आवश्यक है। इस दृष्टि से हमारे 'स्व' को अच्छी तरह जानना और मानना, हमें अपनी संस्कृति से पुनः अच्छी तरह जोड़ने में (Reculturization) हमारी सहायता करेगा।
🙏साभार