22/11/2025
बस इतनी-सी बात है साहब…
कुर्सियाँ बदल जाती हैं,
नेमप्लेट बदल जाती है,
कमरे वही रहते हैं…
पर लोग बदल जाते हैं।
एक दिन आपके नाम की जगह
किसी और का नाम लगा दिया जाता है।
ना शोर होता है, ना समारोह—
बस चुपचाप, एक स्क्रू खुलता है,
और पूरी कहानी बदल जाती है।
आखिर में साथ क्या जाता है?
न पद…
न पहचान…
न नाम…
सिर्फ आपके कर्म,
आपका व्यवहार,
आपकी अच्छाई या बुराई।
इसी से याद रखे जाते हैं लोग—
नेम प्लेट से नहीं,
नेचर से।
(यह पोस्ट , किसी को नीचा या ऊँचा दिखाने के लिए अपितु हम सभी के जीवन की सच्चाई के लिए साझा की है …)