हिंदुस्तान सोसलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन

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हिंदुस्तान सोसलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन अपनी धरती अपना राज ,छत्रपति शिवाजी का ?

18/07/2021

*मैं बहुत सोचता हूं पर उत्तर नहीं मिलता! आप भी इन प्रश्नों पर विचार करें!*

*१. जिस सम्राट के नाम के साथ संसार भर के इतिहासकार “महान” शब्द लगाते हैं;*

*२. जिस सम्राट का राज चिन्ह "अशोक चक्र" भारतीय अपने ध्वज में लगते हैंं;*

*३. जिस सम्राट का राज चिन्ह "चारमुखी शेर" को भारतीय राष्ट्रीय प्रतीक मानकर सरकार चलाते हैं, और "सत्यमेव जयते" को अपनाया है;*

*४. जिस देश में सेना का सबसे बड़ा युद्ध सम्मान सम्राट अशोक के नाम पर "अशोक चक्र" दिया जाता है;*

*५. जिस सम्राट से पहले या बाद में कभी कोई ऐसा राजा या सम्राट नहीं हुआ, जिसने अखंड भारत (आज का नेपाल, बांग्लादेश, पूरा भारत, पाकिस्तान, और अफगानिस्तान) जितने बड़े भूभाग पर एक-छत्र राज किया हो;*

*६. सम्राट अशोक के ही समय में २३ विश्वविद्यालयों की स्थापना की गई, जिसमें तक्षशिला, नालन्दा, विक्रमशिला, कंधार आदि विश्वविद्यालय प्रमुख थे! इन्हीं विश्वविद्यालयों में विदेश से कई छात्र शिक्षा पाने भारत आया करते थे;*

*७. जिस सम्राट के शासन काल को विश्व के बुद्धिजीवी और इतिहासकार भारतीय इतिहास का सबसे स्वर्णिम काल मानते हैं;*

*८. जिस सम्राट के शासन काल में भारत विश्व गुरु था, सोने की चिड़िया था, जनता खुशहाल और भेदभाव-रहित थी;*

*९. जिस सम्राट के शासन काल में सबसे प्रख्यात महामार्ग "ग्रेड ट्रंक रोड" जैसे कई हाईवे बने, २,००० किलोमीटर लंबी पूरी सडक पर दोनों ओर पेड़ लगाये गए, सरायें बनायीं गईं, मानव तो मानव, पशुओं के लिए भी प्रथम बार चिकित्सा घर (हॉस्पिटल) खोले गए, पशुओं को मारना बंद करा दिया गया;*

*१०. ऐसे महान सम्राट अशोक, जिनकी जयंती उनके अपने देश भारत में क्यों नहीं मनायी जाती, न ही कोई छुट्टी घोषित की गई है? अफ़सोस जिन नागरिकों को ये जयंती मनानी चाहिए, वो नागरिक अपना इतिहास ही भुला बैठे हैं, और जो जानते हैं वो ना जाने क्यों मनाना नहीं चाहते;*

*१४ अप्रैल*
*जन्म वर्ष - ३०२ ई पू*
*राजतिलक - २६८ ई पू*
*देहावसान - २३२ ई पू*
*पिताजी का नाम - बिन्दुसार*
*माताजी का नाम - सुभद्राणी*

*११. "जो जीता वही चंद्रगुप्त" ना होकर "जो जीता वही सिकन्दर" कैसे हो गया…?*

*जबकि ये बात सभी जानते हैं कि सिकन्दर की सेना ने चन्द्रगुप्त मौर्य के प्रभाव को देखते हुए ही लड़ने से मना कर दिया था! बहुत ही बुरी तरह से मनोबल टूट गया था! जिस कारण, सिकंदर ने मित्रता के तौर पर अपने सेनापति सेल्यूकस की पुत्री का विवाह चन्द्रगुप्त से रचाया था;*

*१२. महाराणा प्रताप ”महान” ना होकर ... अकबर ”महान” कैसे हो गया? जब महाराणा प्रताप ने अकेले अपने दम पर उस अकबर की लाखों की सेना को घुटनों पर ला दिया था;*

*जिस प्रताप के नाम से ही अकबर का कपड़ों में ही पैखाना निकल जाया करता था;*

*१३. सवाई जय सिंह को “महान वास्तुप्रिय” राजा ना कहकर, शाहजहाँ को यह उपाधि किस आधार पर मिली?*

*१४. जो स्थान महान मराठा क्षत्रीय वीर शिवाजी को मिलना चाहिये, वो क्रूर और आतंकी औरंगज़ेब को क्यों और कैसे मिल गया?*

*१५. स्वामी विवेकानंद और आचार्य चाणक्य की जगह विदेशियों को भारत पर क्यों थोंप दी गई?*

*१६. यहाँ तक कि भारत का राष्ट्रीय गान भी संस्कृत के "वन्दे मातरम" की जगह "जन-गण-मन" हो गया! कब, कैसे और क्यों हो गया?*

*१७. और तो और, हमारे आराध्य भगवान् श्री राम, श्री कृष्ण तो इतिहास से कहाँ और कब गायब हो गये पता ही नहीं चला! आखिर कैसे?*

*१८. एक बानगी …. हमारे आराध्य भगवान श्री राम की जन्मभूमि पावन अयोध्या भी कब और कैसे विवादित बना दी गई, हमें पता तक नहीं चला;*

*१९. "गुरुकुल प्रथा" समाप्त कर, "जेहादी मदरसे" कब और क्यों कर आरंभ हो गए?*

*२०. ब्राह्मणों, पंडितों का तिरस्कार कर मुल्ले-मौलवी कब प्रमुख हो गए, और हिन्दु मंदिरों का चढ़ावा उनको खैरात में बांट दिया गया! क्यों और किस के कहने पर?*

*कृपया अपने सभी समुहों में भेजने का और उन से उत्तर जानने का कष्ट करें!*

*धन्यवाद!*
🙏
*एक अच्छा और सच्चा भारतीय उपरोक्त सभी बताई गई इतिहास की बातों को माने से मना नहीं कर सकता!*

*आओ मिल कर इतिहास में गलत तरीके से किए गए इन फेरबदलों को सही रूप में लाने का हर संभव प्रयास करें, और भारत सरकार से इस दिशा में सकारात्मक परिणामों की अपेक्षा करें!*

*जय हिन्द!*
🌷🙏🏻🇮🇳🛕🚩🌷

27/11/2020

हिंदू मारे गए लेकिन सबूत नहीं मांगा
सिख मारे गए लेकिन सबूत नहीं मांगा
मगर
आतंकवादी मारे गए इसका सबूत कांग्रेस को चाहिए..
सोच समझकर वोट देना लोकसभा चुनाव में साहब,
कहीं ऐसा ना हो कि अफजल गुरु की मूर्ति,
सरदार पटेल से भी ऊंची बन जाए !
जय श्री राम

26 नवम्बर 2008 Mumbai सत्ताधारियों ने हिन्दू आंतकवाद  की पटकथा लिखी और इस्लामिक पाकिस्तान ने उसे अमली जामा पहनाया.क़िताब ...
26/11/2020

26 नवम्बर 2008 Mumbai

सत्ताधारियों ने हिन्दू आंतकवाद की पटकथा लिखी और इस्लामिक पाकिस्तान ने उसे अमली जामा पहनाया.

क़िताब पहले से लिख के तैयार थी... कलावा हाथ मे बंधा था , किसी भी हाल में जिंदा ना पकड़े जाने का ऑर्डर था..मुंबई 26/11 को भगवा, हिन्दू आतंकवाद बताने की पूरी स्क्रिप्ट तैयार थी....
पर भारतीय सेना के सेवानिवृत्त जवान, मुंबई पुलिस के असिस्टेंड सब इंस्पेक्टर स्वर्गीय तुकाराम गोपाल ओंबले जी के साहस ने सारा खेल बिगाड़ दिया ..!!
छाती छलनी हो गयी गोलियों से पर उन्होंने आख़री साँस तक आतंकवादी अजमल आमिर कसाब को छोड़ा नहीं....पिछले पांच सौ सालों में शायद ही किसी अकेले शख्स ने हिंदुओं के लिये इतना बड़ा काम किया होगा...!!
अमर बलिदानी हुतात्मा तुकाराम ओम्बले आपके बलिदान को शत शत नमन है आप न होते तो हर हिन्दू आतंकवादी कहलाता....

ये है असली सेक्युलर की परिभाषा
25/11/2020

ये है असली सेक्युलर की परिभाषा

क्या आपने कभी पढ़ा है कि हल्दीघाटी के बाद अगले १० साल में मेवाड़ में क्या हुआ?इतिहास से जो पन्ने हटा दिए गए हैं उन्हें वाप...
25/11/2020

क्या आपने कभी पढ़ा है कि हल्दीघाटी के बाद अगले १० साल में मेवाड़ में क्या हुआ?

इतिहास से जो पन्ने हटा दिए गए हैं उन्हें वापस संकलित करना ही होगा क्यूंकि वही हिन्दू रेजिस्टेंस और शौर्य के प्रतीक हैं इतिहास में तो ये भी नहीं पढ़ाया गया है की हल्दीघाटी युद्ध में जब महाराणा प्रताप ने कुंवर मानसिंह के हाथी पर जब प्रहार किया तो शाही फ़ौज पांच छह कोस दूर तक भाग गई थी और अकबर के आने की अफवाह से पुनः युद्ध में सम्मिलित हुई है ये वाकया अबुल फज़ल की पुस्तक अकबरनामा में दर्ज है।

क्या हल्दी घाटी अलग से एक युद्ध था या एक बड़े युद्ध की छोटी सी घटनाओं में से बस एक शुरूआती घटना महाराणा प्रताप को इतिहासकारों ने हल्दीघाटी तक ही सिमित करके मेवाड़ के इतिहास के साथ बहुत बड़ा अन्याय किया है वास्तविकता में हल्दीघाटी का युद्ध महाराणा प्रताप और मुगलों के बीच हुए कई युद्धों की शुरुआत भर था मुग़ल न तो प्रताप को पकड़ सके और न ही मेवाड़ पर अधिपत्य जमा सके हल्दीघाटी के बाद क्या हुआ वो हम बताते हैं।

हल्दी घाटी के युद्ध के बाद महाराणा के पास सिर्फ 7000 सैनिक ही बचे थे और कुछ ही समय में मुगलों का कुम्भलगढ़, गोगुंदा , उदयपुर और आसपास के ठिकानों पर अधिकार हो गया था उस स्थिति में महाराणा ने #गुरिल्ला_युद्ध की योजना बनायीं और मुगलों को कभी भी मेवाड़ में सेटल नहीं होने दिया महराणा के शौर्य से विचलित अकबर ने उनको दबाने के लिए 1576 में हुए हल्दीघाटी के बाद भी हर साल 1577 से 1582 के बीच एक एक लाख के सैन्यबल भेजे जो कि महाराणा को झुकाने में नाकामयाब रहे।

हल्दीघाटी युद्ध के पश्चात् महाराणा प्रताप के खजांची भामाशाह और उनके भाई ताराचंद मालवा से दंड के पच्चीस लाख रुपये और दो हज़ार अशर्फिया लेकर हाज़िर हुए इस घटना के बाद महाराणा प्रताप ने भामाशाह का बहुत सम्मान किया और दिवेर पर हमले की योजना बनाई भामाशाह ने जितना धन महाराणा को राज्य की सेवा के लिए दिया उस से 25 हज़ार सैनिकों को 12 साल तक रसद दी जा सकती थी बस फिर क्या था महाराणा ने फिर से अपनी सेना संगठित करनी शुरू की और कुछ ही समय में 40000 लडाकों की एक शक्तिशाली सेना तैयार हो गयी।

उसके बाद शुरू हुआ हल्दीघाटी युद्ध का दूसरा भाग जिसको इतिहास से एक षड्यंत्र के तहत या तो हटा दिया गया है या एकदम दरकिनार कर दिया गया है इसे बैटल ऑफ़ दिवेर कहा गया है।

बात सन १५८२ की है विजयदशमी का दिन था और महराणा ने अपनी नयी संगठित सेना के साथ मेवाड़ को वापस स्वतंत्र कराने का प्रण लिया उसके बाद सेना को दो हिस्सों में विभाजित करके युद्ध का बिगुल फूंक दिया एक टुकड़ी की कमान स्वंय महाराणा के हाथ थी दूसरी टुकड़ी का नेतृत्व उनके पुत्र अमर सिंह कर रहे थे कर्नल टॉड ने भी अपनी किताब में हल्दीघाटी को Thermopylae of Mewar और दिवेर के युद्ध को राजस्थान का मैराथन बताया है. ये वही घटनाक्रम हैं जिनके इर्द गिर्द आप फिल्म 300 देख चुके हैं कर्नल टॉड ने भी महाराणा और उनकी सेना के शौर्य तेज और देश के प्रति उनके अभिमान को स्पार्टन्स के तुल्य ही बताया है जो युद्ध भूमि में अपने से 4 गुना बड़ी सेना से यूँ ही टकरा जाते थे।

दिवेर का युद्ध बड़ा भीषण था महाराणा प्रताप की सेना ने महाराजकुमार अमर सिंह के नेतृत्व में दिवेर थाने पर हमला किया हज़ारो की संख्या में मुग़ल राजपूती तलवारो बरछो भालो और कटारो से बींध दिए गए युद्ध में महाराजकुमार अमरसिंह ने सुलतान खान मुग़ल को बरछा मारा जो सुल्तान खान और उसके घोड़े को काटता हुआ निकल गया उसी युद्ध में एक अन्य राजपूत की तलवार एक हाथी पर लगी और उसका पैर काट कर निकल गई।

महाराणा प्रताप ने बहलेखान मुगल के सर पर वार किया और तलवार से उसे घोड़े समेत काट दिया शौर्य की ये बानगी इतिहास में कहीं देखने को नहीं मिलती है उसके बाद यह कहावत बनी की मेवाड़ में सवार को एक ही वार में घोड़े समेत काट दिया जाता है ये घटनाये मुगलों को भयभीत करने के लिए बहुत थी बचे खुचे ३६००० मुग़ल सैनिकों ने महाराणा के सामने आत्म समर्पण किया दिवेर के युद्ध ने मुगलों का मनोबल इस तरह तोड़ दिया की जिसके परिणाम स्वरुप मुगलों को मेवाड़ में बनायीं अपनी सारी 36 थानों ठिकानों को छोड़ के भागना पड़ा यहाँ तक की जब मुगल कुम्भलगढ़ का किला तक रातो रात खाली कर भाग गए।

दिवेर के युद्ध के बाद प्रताप ने गोगुन्दा , कुम्भलगढ़ , बस्सी, चावंड , जावर , मदारिया , मोही , माण्डलगढ़ जैसे महत्त्वपूर्ण ठिकानो पर कब्ज़ा कर लिया इसके बाद भी महाराणा और उनकी सेना ने अपना अभियान जारी रखते हुए सिर्फ चित्तौड़ कोछोड़ के मेवाड़ के सारे ठिकाने/दुर्ग वापस स्वतंत्र करा लिए।

अधिकांश मेवाड़ को पुनः कब्जाने के बाद महाराणा प्रताप ने आदेश निकाला की अगर कोई एक बिस्वा जमीन भी खेती करके मुसलमानो को हासिल (टैक्स) देगा उसका सर काट दिया जायेगा इसके बाद मेवाड़ और आस पास के बचे खुचे शाही ठिकानो पर रसद पूरी सुरक्षा के साथ अजमेर से मगाई जाती थी।

दिवेर का युद्ध न केवल महाराणा प्रताप बल्कि मुगलों के इतिहास में भी बहुत निर्णायक रहा मुट्ठी भर राजपूतो ने पुरे भारतीय उपमहाद्वीप पर राज करने वाले मुगलो के ह्रदय में भय भर दिया दिवेर के युद्ध ने मेवाड़ में अकबर की विजय के सिलसिले पर न सिर्फ विराम लगा दिया बल्कि मुगलों में ऐसे भय का संचार कर दिया की अकबर के समय में मेवाड़ पर बड़े आक्रमण लगभग बंद हो गए।

इस घटना से क्रोधित अकबर ने हर साल लाखों सैनिकों के सैन्य बल अलग अलग सेनापतियों के नेतृत्व में मेवाड़ भेजने जारी रखे लेकिन उसे कोई सफलता नहीं मिली अकबर खुद 6 महीने मेवाड़ पर चढ़ाई करने के मकसद से मेवाड़ के आस पास डेरा डाले रहा लेकिन ये महराणा द्वारा बहलोल खान को उसके घोड़े समेत आधा चीर देने के ही डर था कि वो सीधे तौर पे कभी मेवाड़ पे चढ़ाई करने नहीं आया।

ये इतिहास के वो पन्ने हैं जिनको दरबारी इतिहासकारों ने जानबूझ कर पाठ्यक्रम से गायब कर दिया है जिन्हें अब वापस करने का प्रयास किया जा रहा है।

#पोस्ट_को_शेयर_जरूर_करें

24/11/2020

उन्हें आप उपराष्ट्रपति बना दो ... वे हामिद अंसारी बनकर गद्दारी करेंगे,

उन्हें आप CM बना दो,,, वे फारूख अब्दुल्ला बनकर गद्दारी करेंगे,

उन्हें IAS बना दो ,,, वे जकात फाउंडेशन बनाकर UPSC जिहाद करेंगे,

उन्हें आप CA बना दो ,,, वे याकूब मेमन बनकर लोगों को मारेंगे,

उन्हें आप MBBS पढ़ा दो ,,,, तो वे अफजल गुरु बन जाएंगे।

उन्हें आप नेता बनाओ ,,, तो वे ओवेसी बनकर केवल मुस्लिम हित की बात करेगे।

उन्हें आप फ़िल्म कलाकार बनाओ ,,,, तो वो नसीरुद्दीन शाह, आमिर खान, शाहरुख खान बनकर देश में डर का माहौल बतायेगे।

उनके पास कितनी ही दौलत आ जाए,,, वे चाहे कितना ही पढ़ लिख जाएं,,, चाहे न्यूक्लियर साइंटिस्ट बन जाएं या IT प्रोफेशनल
लेकिन सब कुछ होने पर भी वे "शरिया" की ही बात करेंगे,

यानि लोगों पर 1400 साल पुराना गला सड़ा शरिया कानून थोपने की बात ही करेंगे।

आप चाहे जो कर लें ,,, लेकिन वे आपको काफ़िर ही कहेंगे ,,, और आपको समाप्त करने की साजिशें ही करेंगे।

कश्मीर में तो वे सरेआम कहते थे ...
कि आप चाहे सोने की सड़कें बिछा दें हम जिहाद नहीं छोड़ेंगे।

सबकुछ लुटवा पिटवाकर कश्मीर से निकाला गया एक भी हिन्दू आतंकवादी नहीं बनता।

लेकिन हिन्दुओं का सबकुछ लूटने वालों का मन अब भी नहीं भरा, आज भी वहाँ के कीड़े-मकोड़े आतंकवादी बनकर हमारी सेना को मार रहे हैं।

असल बात ये है कि उन्हें कोई कन्फ्यूजन नहीं, उनके फंडे क्लियर हैं ... कि उन्हें पूरी दुनियां को इस्लामी बनाना है।

कन्फ्यूजन तो आपको है ... कि आप उनमें इंसान और इंसानियत ढूंढते फिरते हैं।

और हाँ,आप खुद के लिये कोई भी हों ..
उनके लिए बस एक काफ़िर ही हो!!

23/11/2020

*नेहरु था भारत में पहली बूथ केप्चरिंग का मास्टर माइंड*

*जवाहर लाल नेहरू देश में हुए प्रथम आम चुनाव में उत्तर प्रदेश की रामपुर सीट से पराजित घोषित हो चुके कांग्रेसी प्रत्याशी मौलाना अबुल कलाम आजाद को किसी भी कीमत पर जबरजस्ती जिताने के आदेश दिये थे |*

*उनके आदेश पर उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री पं गोविन्द वल्लभ पन्त ने रामपुर के जिलाधिकारी पर घोषित हो चुके परिणाम बदलने का दबाव डाला और इस दबाव के कारण प्रशासन ने जीते हुए प्रत्याशी विशन चन्द्र सेठ की मतपेटी के वोट मौलाना अबुल के पेटी के डलवाकर दुबारा मतगणना करवाकर मौलाना अबुल को जीता दिया |*

*ये रहस्योदघाटन उत्तर प्रदेश के तात्कालीन सुचना निदेशक शम्भुनाथ टंडन ने अपने एक लेख मे किया है |*

*उन्होंने अपने लेख "जब विशन सेठ ने मौलाना आजाद को धुल चटाई थी भारतीय इतिहास की एक अनजान घटना " में लिखा है कि भारत मे नेहरु ही बूथ कैप्चरिंग के पहले मास्टर माइंड थे |*

*उस ज़माने में भी बूथ पर कब्जा करके परिणाम बदल दिये जाते थे और देश के प्रथम आम चुनाव मे सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही कांग्रेस के 12 हारे हुए प्रत्याशियों को जिताया गया |*

*देश के बटवारे के बाद लोगो मे कांग्रेस और खासकर नेहरु के प्रति बहुत गुस्सा था लेकिन चूँकि नेहरु के हाथ मे अंतरिम सरकार की कमान थी।*
*इसलिए नेहरु ने पूरी सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल करके जीत हासिल थी |*

*देश के बटवारे के लिए हिंदू महासभा ने नेहरु और गाँधी की तुष्टीकरण की नीति को जिम्मेदार मानते हुए देश मे उस समय जबरजस्त आन्दोलन चलाया था और लोगो मे नेहरु के प्रति बहुत गुस्सा था,*
*इसलिए हिंदू महासभा ने कांग्रेस के दिग्गज नेताओ के विरुद्ध हिंदू महासभा के दिग्गज लोगो को खड़ा करने का निश्चय किया था |*

*इसीलिए नेहरु के विरुद्ध फूलपुर से संत प्रभुदत्त ब्रम्हचारी और मौलाना अबुल के विरुद्ध रामपुर से भईया विशन चन्द्र सेठ को लडाया गया |*

*नेहरु को भी अंतिम राउंड मे जबरजस्ती 2000 वोट से जिताया गया |*
*वही सेठ विशन चन्द्र के पक्ष मे भारी मतदान हुआ और मतगणना के पश्चात प्रशासन ने बकायदा लाउडस्पीकरों से सेठ विशन चंद को 10000 वोट से विजयी घोषित कर दिया |*

*और फिर रामपुर मे हिंदू महासभा के लोगो ने विशाल विजयी जुलुस भी निकाला |*

*फिर जैसे ही ये समाचार वायरलेस से लखनऊ फिर दिल्ली पहुची तो मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की अप्रत्याशित हार के समाचार से नेहरु तिलमिला और तमतमा उठे।*

*उन्होंने तुरंत उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री पं गोविन्द वल्लभ पन्त को चेतावनी भरा संदेश दिया की मै मौलाना की हार को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नही कर सकता, अगर मौलाना को जबरजस्ती नही जिताया गया तो आप अपना इस्तीफा शाम तक दे दीजिए |*

*फिर पन्त जी ने आनन फानन मे सुचना निदेशक (जो इस लेख के लेखक है) शम्भू नाथ टंडन को बुलाया और उन्हें रामपुर के जिलाधिकारी से सम्पर्क करके किसी भी कीमत पर मौलाना अबुल को जिताने का आदेश दिया. .*
*फिर जब शम्भु नाथ जी के कहा की सर इससे दंगे भी भडक सकते हैं ...*
*तो इस पर पन्त जी ने कहा की देश जाये भांड मे नेहरु जी का हुकम है |*

*फिर रामपुर के जिलाधिकारी को वायरलेस पर मौलाना अबुल को जिताने के आदेश दे दिये गए |*

*फिर रामपुर के सीटी कोतवाल ने सेठ विशनचन्द्र के पास गया और कहा कि आपको जिलाधिकारी साहब बुला रहे है, जबकि वो लोगो की बधाईयाँ स्वीकार कर रहे थे |*

*और जैसे ही जिलाधिकारी ने उनसे कहा कि मतगणना दुबारा होगी तो सेठ विशन चन्द्र ने इसका कड़ा विरोध किया और कहा कि मेरे सभी कार्यकर्ता जुलुस मे गए है ऐसे मे आप बिना मतगणना एजेंट के दुबारा कैसे मतगणना कर सकते है ?*

*लेकिन उनकी एक नहीं सुनी गयी और जिलाधिकारी के साफ साफ कहा कि सेठ जी हम अपनी नौकरी बचाने के लिए आपकी बलि ले रहे है क्योंकि ये नेहरु का आदेश है |*

*शम्भु नाथ टंडन जी ने आगे लिखा है कि चूँकि उन दिनों प्रत्याशियो के नामो की अलग अलग पेटियां हुआ करती थी और मतपत्र पर बिना कोई निशान लगाये अलग अलग पेटियों मे डाले जाते थे इसलिए ये बहुत आसान था कि एक प्रत्याशी के वोट दूसरे की पेटी मे मिला दिये जाये |*

*देश मे हुए प्रथम आमचुनाव की इसी खामी का फायदा उठाकर ऐसय्श नेहरु ने इस देश की सत्ता पर काबिज हुआ था और उस नेहरु ने इस देश मे जो भ्रष्टाचार के बीज बोये थे वो आज उसके खानदान के "काबिल" वारिसों के अच्छी तरह देखभाल करने की वजह के एक वटवृक्ष बन चूका है|*

*लेखक :-मनीष कानोडिया
साभार :- गाँधी और नेहरू : हिंदुस्तान का दुर्भाग्य*
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महान क्रान्तिकारी अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ के जन्म दिन पर शत शत नमन्।अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ (; जन्म- 22 अक्टूबर, 1900 ई., शाहजहाँप...
22/10/2020

महान क्रान्तिकारी अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ के जन्म दिन पर शत शत नमन्।
अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ (; जन्म- 22 अक्टूबर, 1900 ई., शाहजहाँपुर, उत्तर प्रदेश; मृत्यु- 19 दिसम्बर, 1927 ई., फैजाबाद) को भारत के प्रसिद्ध अमर शहीद क्रांतिकारियों में गिना जाता है। देश की आज़ादी के लिए हंसते-हंसते प्राण न्यौछावर करने वाले अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रबल पक्षधर थे।
अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ के लिए मंदिर और मसजिद एक समान थे। एक बार जब शाहजहाँपुर में हिन्दू और मुस्लिमों में झगड़ा हुआ और शहर में मारपीट शुरू हो गई, उस समय अशफ़ाक़ बिस्मिल जी के साथ आर्य समाज मन्दिर में बैठे हुए थे। कुछ मुस्लिम मन्दिर के पास आ गए और आक्रमण करने के लिए तैयार हो गए। अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ ने अपना पिस्तौल निकाल लिया और आर्य समाज मन्दिर से बाहर आकर मुस्लिमों से कहने लगे कि "मैं कटटर मुसलमान हूँ, परन्तु इस मन्दिर की एक-एक ईंट मुझे प्राणों से प्यारी है। मेरे नजदीक मन्दिर और मसजिद की प्रतिष्ठा बराबर है। अगर किसी ने इस मन्दिर की ओर निगाह उठाई तो गोली का निशाना बनेगा। अगर तुमको लड़ना है तो बाहर सड़क पर चले जाओ और खूब दिल खोल कर लड़ लो।" उनकी इस सिंह गर्जना को सुनकर सबके होश गुम हो गए और किसी का साहस नहीं हुआ, जो आर्य समाज मन्दिर पर आक्रमण करे। यह अशफ़ाक़ का सार्वजनिक प्रेम था। इस से भी अधिक उनको रामप्रसाद बिस्मिल जी से प्रेम था।

काश्मीरी हिन्दू अगर काश्मीर वापस जाएँगे तो वहाँ कैसे रहेंगे? 98% जनसँख्या जो आपके अस्तित्व से घृणा करती हो, उसके बीच में...
13/10/2020

काश्मीरी हिन्दू अगर काश्मीर वापस जाएँगे तो वहाँ कैसे रहेंगे? 98% जनसँख्या जो आपके अस्तित्व से घृणा करती हो, उसके बीच में आप कैसे रहेंगे.
एक उदाहरण याद आता है...जैसे यहूदी फिलिस्तीन में अरबों के बीच जीवित रहे, लड़े और अपने लिए एक इस्राएल बनाया.
फिर ले दे कर बात इसपर आती है कि हम यहूदियों जैसे नहीं हैं...

पर यहूदी हमेशा ऐसे नहीं थे जैसे आज हैं. यहूदी 1500 सालों तक फिलिस्तीनियों से मार खाकर भागे रहे. अपना एक मुल्क नहीं था. यहूदी पूरी दुनिया में फैला रहा, उसे सिर्फ अपने पैसे कमाने से मतलब रहा. दुनिया की सबसे पढ़ी-लिखी और संपन्न कौम होने के बावजूद यहूदी पूरी दुनिया की घृणा और वितृष्णा का पात्र रहा. और यहूदी भी तब तक नहीं जागे जब तक उनका अस्तित्व खतरे में नहीं आ गया. हिटलर अकेला उन्हें नहीं मार रहा था, पूरा यूरोप उनके मार खाने पर खुश था.
इंग्लैंड की विदेश नीति में द्वितीय विश्व युद्ध तक यहूदियों के लिए कोई सहानुभूति नहीं थी. आपने अगर लॉरेंस ऑफ़ अरबिया फिल्म देखी हो तो याद होगा...पहले विश्वयुद्ध में अंग्रेजों और अरबों में बहुत याराना था. यह दूसरे विश्वयुद्ध तक चला, और जब दुनिया भर के यहूदी फिलिस्तीन में छुप कर सर्वाइव करने का प्रयास कर रहे थे तब भी सरकारी ब्रिटिश नीति अरबों के पक्ष में थी.

उस समय एक अँगरेज़ फौजी अफसर फिलिस्तीन में इंटेलिजेंस ऑफिसर बन कर आया. नाम था कैप्टेन ऑर्ड विनगेट. विनगेट एक अजीब सी, पर असाधारण शख्सियत था. वह एक इन्फेंट्री जीनियस था. व्यक्तिगत रूप से उसे यहूदियों से बहुत सहानुभूति थी. और सरकारी ब्रिटिश नीति के विरुद्ध जाकर उसने यहूदियों को एकत्र करना और उन्हें लड़ाई के लिए तैयार करना शुरू किया. बेन गुरिएन, ज़्वी ब्रेनर और मोशे दयान जैसे भविष्य के इसरायली मिलिट्री लीडर उसके शिष्य बने. विनगेट ने इस्राएलियों को उनकी यह आक्रामक नीति दी...उसके पहले इसरायली कैम्पों में बैठे रक्षात्मक मोर्चे लिए रहते थे. अरब गैंग आते और उनपर हमले करके चले जाते, इसरायली सिर्फ जरूरत भर रक्षात्मक कार्रवाई करते थे.

एक दिन विनगेट ने ज़्वी ब्रेनर से बात करते हुए पूछा - तुम्हें पता है, इन पहाड़ियों के पार जो अरब हैं, वे तुम्हारे खून के प्यासे हैं...एक दिन ये आएंगे और तुम्हारा अस्तित्व मिटा देंगे?
ब्रेनर ने कहा - वे यह आसानी से नहीं कर पाएंगे...हम बहादुरी से उनका मुकाबला करेंगे...
विनगेट ब्रेनर पर बरस पड़ा - तुम यहूदी भी ना, ma*****st (आत्मपीड़क) हो...तुम कहते हो - आओ, मुझे मारो...जब तक वह तुम्हारे भाई का क़त्ल नहीं कर दे, तुम्हारी बहन का रेप नहीं कर दे, तुम्हारे माँ-बाप को नाले में नहीं फेंक दे, तुम हाथ नहीं उठाओगे...
तुम लड़ कर जीत सकते हो, पर मैं तुम्हें सिखाऊंगा कि लड़ना कैसे है...
फिर विनगेट ने यहूदियों की टुकड़ियों का कई सैनिक अभियानों में नेतृत्व किया. वह अरब ठिकानों का पता लगाता, उनपर घात लगा कर हमला करता, उन्हें बेरहमी से मार डालता और कई बार अरबों की लाशें लॉरी में लादकर फिलिस्तीनी पुलिस स्टेशन के सामने फेंक आता...
विनगेट ने यहूदियों की मिलिट्री स्ट्रेटेजी ही नहीं, उनकी मानसिक अवस्था बदल दी. उन्हें रक्षात्मक से आक्रामक बनाया...इजराइल को मोशे दयान जैसे जनरल तैयार करके दिए...विनगेट अकेला एक ऐसा गैर-यहूदी है जिसकी मूर्ति इजराइल में लगाई गई है...

आप भेड़ियों के बीच में भेड़ बनकर नहीं जी सकते. जान पर बनती है तो भेंड़ बना यहूदियों का झुण्ड इजराइल बन कर शेर की तरह रहना सीख लेता है...तो हम तो भरत वंशी हैं जिनका बचपन ही सिंह शावकों के साथ बीता था...।

अमर शहीद दुर्गा भाभी के जन्म दिन पर कोटि कोटि नमनदुर्गा भाभी  [जन्म सात अक्टूबर 1902 स्वर्गवास 14 अक्टूबर 1999] भारत के ...
07/10/2020

अमर शहीद दुर्गा भाभी के जन्म दिन पर कोटि कोटि नमन
दुर्गा भाभी [जन्म सात अक्टूबर 1902 स्वर्गवास 14 अक्टूबर 1999] भारत के स्वतंत्रता संग्राम में क्रान्तिकारियों की प्रमुख सहयोगी थीं। १८ दिसम्बर १९२८ को भगत सिंह ने इन्ही दुर्गा भाभी के साथ वेश बदल कर कलकत्ता-मेल से यात्रा की थी। दुर्गाभाभी क्रांतिकारी भगवती चरण बोहरा की धर्मपत्नी थीं।

दस वर्ष की अल्प आयु में ही इनका विवाह लाहौर के भगवती चरण बोहरा के साथ हो गया। ससुर शिवचरण जी ने दुर्गा भाभी को 40 हजार व पिता बांके बिहारी ने पांच हजार रुपये संकट के दिनों में काम आने के लिए दिए थे लेकिन इस दंपती ने इन पैसों का उपयोग क्रांतिकारियों के साथ मिलकर देश को आजाद कराने में उपयोग किया। 28 मई 1930 को रावी नदी के तट पर साथियों के साथ बम बनाने के बाद परीक्षण करते समय वोहरा जी शहीद हो गए। उनके शहीद होने के बावजूद दुर्गा भाभी साथी क्रांतिकारियों के साथ सक्रिय रहीं।

9 अक्टूबर 1930 को दुर्गा भाभी ने गवर्नर हैली पर गोली चला दी थी जिसमें गवर्नर हैली तो बच गया लेकिन सैनिक अधिकारी टेलर घायल हो गया। मुंबई के पुलिस कमिश्नर को भी दुर्गा भाभी ने गोली मारी थी जिसके परिणाम स्वरूप अंग्रेज पुलिस इनके पीछे पड़ गई। मुंबई के एक फ्लैट से दुर्गा भाभी व साथी यशपाल को गिरफ्तार कर लिया गया। दुर्गा भाभी का काम साथी क्रांतिकारियों के लिए राजस्थान से पिस्तौल लाना व ले जाना था। चंद्रशेखर आजाद ने अंग्रेजों से लड़ते वक्त जिस पिस्तौल से खुद को गोली मारी थी उसे दुर्गा भाभी ने ही लाकर उनको दी थी। उस समय भी दुर्गा भाभी उनके साथ ही थीं। उन्होंने पिस्तौल चलाने की ट्रेनिंग लाहौर व कानपुर में ली थी।

भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त जब केंद्रीय असेंबली में बम फेंकने जाने लगे तो दुर्गा भाभी व सुशीला मोहन ने अपनी बांहें काट कर अपने रक्त से दोनों लोगों को तिलक लगाकर विदा किया था। असेंबली में बम फेंकने के बाद इन लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया तथा फांसी दे दी गई।

मुगलों की बड़ी सेना देख जब रानी दुर्गावती के मंत्री ने उनसे युद्ध न करने को कहा तो रानी दुर्गावती ने कहा - "कलंकित जीवन ...
05/10/2020

मुगलों की बड़ी सेना देख जब रानी दुर्गावती के मंत्री ने उनसे युद्ध न करने को कहा तो रानी दुर्गावती ने कहा - "कलंकित जीवन जीने की अपेक्षा शान से मर जाना अच्छा है।"

आज मुग़ल शासकों को पराजित करने वाली महान वीरांगना रानी दुर्गावती जी की जयंती पर उन्हें शत् शत् नमन।

"फन कुचलने" का हुनर भी सीखिए...! "सांप" के ख़ौफ़ से "जंगल" नहीं छोड़ा करते..!
03/10/2020

"फन कुचलने" का हुनर भी सीखिए...!
"सांप" के ख़ौफ़ से "जंगल" नहीं छोड़ा करते..!

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