14/08/2026
एक बार अपने जमीर से सवाल कीजिए…
आज उत्तराखंड क्रांति दल अगर यह कह रहा है कि पहाड़ में बदलाव चाहिए, तो इसे केवल राजनीति मत समझिए—इसे अपने गांव और अपने भविष्य की आवाज़ समझिए।
जिन पहाड़ों में हमारे पितरों ने अपनी पूरी जिंदगी लगा दी…
किसी ने जंगल काटकर खेत बनाए, किसी ने पत्थर तोड़कर घर बसाया, किसी ने अपने बच्चों के लिए जमीन और संस्कृति की विरासत छोड़ी। कुल देवी-देवताओं को स्थापित किया, गांव बसाए और पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षा-कवच तैयार किया।
लेकिन आज वही खेत बंजर हैं, गांव खाली हैं, बाजार सूने हैं, स्कूलों में बच्चे कम हैं और रोजगार के लिए युवा दिल्ली से मुंबई और मुंबई से किसी दूसरे शहर की ओर भागने को मजबूर हैं।
सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कौन-सी सरकार आई?
सवाल यह है कि हमारे पहाड़ को ऐसा क्यों बनाया गया कि यहां रहना ही मुश्किल हो गया?
पलायन के बाद क्या हमारे बच्चों को समान अवसर मिल रहे हैं?
महानगरों की महंगी शिक्षा, प्रतियोगिता, कॉलेजों की कटऑफ, रोजगार की मारामारी—हर जगह अपनी चुनौती है।
तो फिर क्यों न ऐसा उत्तराखंड बनाया जाए,
जहां अपने गांव में ही अच्छी शिक्षा मिले, स्वास्थ्य मिले, रोजगार मिले और सम्मान के साथ जीवन मिले?
सबसे अच्छा गांव है—जब गांव में अवसर हों।
राष्ट्रीय दलों को दशकों मौका मिला। अगर आज भी गांव खाली हो रहे हैं, खेत बंजर हो रहे हैं और युवा पलायन कर रहा है, तो अब सवाल पूछने का समय है।
इस बार सिर्फ सरकार नहीं, अपना विकल्प चुनिए।
उत्तराखंड के लिए उत्तराखंड की आवाज़ चुनिए।
उत्तराखंड क्रांति दल चुनिए।
अपने पितरों के संघर्ष को व्यर्थ मत जाने दीजिए।
पहाड़ छोड़ने के बजाय पहाड़ बदलने का संकल्प लीजिए।