04/04/2026
ડાઈવોર્સના દરેક કેસમાં ડીએનએ ટેસ્ટ ફરજીયાત થવો જોઈએ.
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम निर्णय में फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें एक व्यक्ति को बच्चे के भरण-पोषण (maintenance) के लिए राशि देने का निर्देश दिया गया था। यह मामला पितृत्व विवाद से जुड़ा हुआ था, जहां व्यक्ति ने यह दावा किया कि वह बच्चे का जैविक पिता नहीं है और इस तथ्य को साबित करने के लिए डीएनए टेस्ट की मांग की गई थी।
इस मामले में बच्चे ने धारा 125 Cr.P.C. के तहत भरण-पोषण की मांग की थी, जिसे फैमिली कोर्ट ने स्वीकार करते हुए मासिक राशि देने का आदेश दिया था। हालांकि, व्यक्ति ने हाईकोर्ट में इस आदेश को चुनौती दी और कहा कि उसकी पत्नी लंबे समय से अलग रह रही थी और कथित रूप से किसी अन्य व्यक्ति के साथ संबंध में थी, इसलिए पितृत्व संदेह के घेरे में है।
मामले की सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पाया कि तथ्यों और परिस्थितियों में गंभीर विरोधाभास मौजूद हैं और पितृत्व को लेकर वास्तविकता जानना न्याय के हित में आवश्यक है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे “विशिष्ट मामलों” में केवल कानूनी अनुमान (presumption) पर्याप्त नहीं होता, बल्कि वैज्ञानिक साक्ष्य, विशेषकर डीएनए टेस्ट, अधिक निर्णायक भूमिका निभा सकता है।
यह महत्वपूर्ण निर्णय जस्टिस मदन पाल सिंह द्वारा सुनाया गया। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में न केवल पिता बल्कि बच्चे को भी यह जानने का अधिकार है कि उसका जैविक पिता कौन है, क्योंकि यह प्रश्न जीवनभर दोनों के लिए मानसिक और सामाजिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है।
कोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए निर्देश दिया कि पिता और बच्चे का डीएनए टेस्ट कराया जाए और उसके बाद मामले की नए सिरे से सुनवाई की जाए। साथ ही यह भी कहा गया कि पूरी प्रक्रिया तीन महीने के भीतर पूरी करने का प्रयास किया जाए।
यह मामला जवाहर लाल जायसवाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य (Criminal Revision No. 1428 of 2025) से संबंधित है, जो भविष्य में पितृत्व विवादों और डीएनए टेस्ट की स्वीकार्यता को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी दृष्टांत बन सकता है।
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