माँ धारी देवी

माँ धारी देवी Perched atop a 20 metre high rock, the temple of Dhari Devi is situated on the banks of river Alaknada. One has to travel a distance of 19 kms.

from Srinagar (Pauri Garhwal) on Srinagar-Badrinath highway upto Kaliya Saur, then down trek another half a kilometer towards Alaknanda river. According to a local legened, the temple was once washed off by floods, while floating the idol struck against a rock, the villagers heard the cries of the idol. On reaching the site they heard a divine voice instructing them to install the idol as it was,

on the spot it was found. Since then the fierce looking idol remains where it was, known as Dhari Devi, under the open sky, and thousands of devotees on the way to Badrinath pay their obeisance to it. The temple of Dhari Devi in Srinagar hosts only the upper part of idol of Godess Dhari, the remaining lower part is believed to be in Kalimath in Rudraprayag district. It is believed that the idol of Dhari Devi shall not be put under roof. For the same reason, the idols in Dhari Devi Temple are put under open sky. Taking photographs of Dhari Devi idols is strictly prohibited. The village near the temple is name after godess Dhari and known as Dhari Village. A hanging bridge over Alaknanda river connects the Dhari Devi temple to Dhari Village.

25/10/2018
15/09/2016
27/02/2012

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Jai Mata Di

26/02/2012

||महा मृत्‍युंजय मंत्र ||
ॐ हौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः
ॐ त्र्यम्‍बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्
उर्वारुकमिव बन्‍धनान् मृत्‍योर्मुक्षीय मामृतात्
ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः जूं हौं ॐ !!

||महा मृत्‍युंजय मंत्र का अर्थ ||
समस्‍त संसार के पालनहार, तीन नेत्र वाले शिव की हम अराधना करते हैं। विश्‍व में सुरभि फैलाने वाले भगवान शिव मृत्‍यु न कि मोक्ष से हमें मुक्ति दिलाएं।

महामृत्युंजय मंत्र के वर्णो (अक्षरों) का अर्थ
महामृत्युंघजय मंत्र के वर्ण पद वाक्यक चरण आधी ऋचा और सम्पुतर्ण ऋचा-इन छ: अंगों के अलग-अलग अभिप्राय हैं।

ओम त्र्यंबकम् मंत्र के 33 अक्षर हैं जो महर्षि वशिष्ठर के अनुसार 33 देवताआं के घोतक हैं। उन तैंतीस देवताओं में 8 वसु 11 रुद्र और 12 आदित्यठ 1 प्रजापति तथा 1 षटकार हैं। इन तैंतीस देवताओं की सम्पूर्ण शक्तियाँ महामृत्युंजय मंत्र से निहीत होती है जिससे महा महामृत्युंजय का पाठ करने वाला प्राणी दीर्घायु तो प्राप्त करता ही हैं । साथ ही वह नीरोग, ऐश्व‍र्य युक्ता धनवान भी होता है । महामृत्युंरजय का पाठ करने वाला प्राणी हर दृष्टि से सुखी एवम समृध्दिशाली होता है । भगवान शिव की अमृतमययी कृपा उस निरन्तंर बरसती रहती है।

त्रि - ध्रववसु प्राण का घोतक है जो सिर में स्थित है।
यम - अध्ववरसु प्राण का घोतक है, जो मुख में स्थित है।
ब - सोम वसु शक्ति का घोतक है, जो दक्षिण कर्ण में स्थित है।
कम - जल वसु देवता का घोतक है, जो वाम कर्ण में स्थित है।
य - वायु वसु का घोतक है, जो दक्षिण बाहु में स्थित है।
जा- अग्नि वसु का घोतक है, जो बाम बाहु में स्थित है।
म - प्रत्युवष वसु शक्ति का घोतक है, जो दक्षिण बाहु के मध्य में स्थित है।
हे - प्रयास वसु मणिबन्धत में स्थित है।
सु -वीरभद्र रुद्र प्राण का बोधक है। दक्षिण हस्त के अंगुलि के मुल में स्थित है।
ग -शुम्भ् रुद्र का घोतक है दक्षिणहस्त् अंगुलि के अग्र भाग में स्थित है।
न्धिम् -गिरीश रुद्र शक्ति का मुल घोतक है। बायें हाथ के मूल में स्थित है।
पु- अजैक पात रुद्र शक्ति का घोतक है। बाम हस्तह के मध्य भाग में स्थित है।
ष्टि - अहर्बुध्य्त् रुद्र का घोतक है, बाम हस्त के मणिबन्धा में स्थित है।
व - पिनाकी रुद्र प्राण का घोतक है। बायें हाथ की अंगुलि के मुल में स्थित है।
र्ध - भवानीश्वपर रुद्र का घोतक है, बाम हस्त अंगुलि के अग्र भाग में स्थित है।
नम् - कपाली रुद्र का घोतक है । उरु मूल में स्थित है।
उ- दिक्पति रुद्र का घोतक है । यक्ष जानु में स्थित है।
र्वा - स्था णु रुद्र का घोतक है जो यक्ष गुल्फ् में स्थित है।
रु - भर्ग रुद्र का घोतक है, जो चक्ष पादांगुलि मूल में स्थित है।
क - धाता आदित्यद का घोतक है जो यक्ष पादांगुलियों के अग्र भाग में स्थित है।
मि - अर्यमा आदित्यद का घोतक है जो वाम उरु मूल में स्थित है।
व - मित्र आदित्यद का घोतक है जो वाम जानु में स्थित है।
ब - वरुणादित्या का बोधक है जो वाम गुल्फा में स्थित है।
न्धा - अंशु आदित्यद का घोतक है । वाम पादंगुलि के मुल में स्थित है।
नात् - भगादित्यअ का बोधक है । वाम पैर की अंगुलियों के अग्रभाग में स्थित है।
मृ - विवस्व्न (सुर्य) का घोतक है जो दक्ष पार्श्वि में स्थित है।
र्त्यो् - दन्दाददित्य् का बोधक है । वाम पार्श्वि भाग में स्थित है।
मु - पूषादित्यं का बोधक है । पृष्ठै भगा में स्थित है ।
क्षी - पर्जन्य् आदित्यय का घोतक है । नाभि स्थिल में स्थित है।
य - त्वणष्टान आदित्यध का बोधक है । गुहय भाग में स्थित है।
मां - विष्णुय आदित्यय का घोतक है यह शक्ति स्व्रुप दोनों भुजाओं में स्थित है।
मृ - प्रजापति का घोतक है जो कंठ भाग में स्थित है।
तात् - अमित वषट्कार का घोतक है जो हदय प्रदेश में स्थित है।
उपर वर्णन किये स्थानों पर उपरोक्तध देवता, वसु आदित्य आदि अपनी सम्पुर्ण शक्तियों सहित विराजत हैं । जो प्राणी श्रध्दा सहित महामृत्युजय मंत्र का पाठ करता है उसके शरीर के अंग - अंग ( जहां के जो देवता या वसु अथवा आदित्यप हैं ) उनकी रक्षा होती है ।

मंत्रगत पदों की शक्तियॉं
जिस प्रकार मंत्रा में अलग अलग वर्णो (अक्षरों ) की शक्तियाँ हैं । उसी प्रकार अलग - अल पदों की भी शक्तियॉं है।
त्र्यम्‍‍बकम् - त्रैलोक्यक शक्ति का बोध कराता है जो सिर में स्थित है।
यजा- सुगन्धात शक्ति का घोतक है जो ललाट में स्थित है ।
महे- माया शक्ति का द्योतक है जो कानों में स्थित है।
सुगन्धिम् - सुगन्धि शक्ति का द्योतक है जो नासिका (नाक) में स्थित है।
पुष्टि - पुरन्दिरी शकित का द्योतक है जो मुख में स्थित है।
वर्धनम - वंशकरी शक्ति का द्योतक है जो कंठ में स्थित है ।
उर्वा - ऊर्ध्देक शक्ति का द्योतक है जो ह्रदय में स्थित है ।
रुक - रुक्तदवती शक्ति का द्योतक है जो नाभि में स्थित है।
मिव रुक्मावती शक्ति का बोध कराता है जो कटि भाग में स्थित है ।
बन्धानात् - बर्बरी शक्ति का द्योतक है जो गुह्य भाग में स्थित है ।
मृत्यो: - मन्त्र्वती शक्ति का द्योतक है जो उरुव्दंय में स्थित है।
मुक्षीय - मुक्तिकरी शक्तिक का द्योतक है जो जानुव्दओय में स्थित है ।
मा - माशकिक्तत सहित महाकालेश का बोधक है जो दोंनों जंघाओ में स्थित है ।
अमृतात - अमृतवती शक्तिका द्योतक है जो पैरो के तलुओं में स्थित है।

महामृत्युजय प्रयोग के लाभ
कलौकलिमल ध्वंयस सर्वपाप हरं शिवम् ।
येर्चयन्ति नरा नित्यं तेपिवन्द्या यथा शिवम्।।
स्वयं यजनित चद्देव मुत्तेमा स्द्गरात्मवजै:।
मध्यचमा ये भवेद मृत्यैतरधमा साधन क्रिया।।
देव पूजा विहीनो य: स नरा नरकं व्रजेत ।
यदा कथंचिद् देवार्चा विधेया श्रध्दायान्वित ।।
जन्मचतारात्र्यौ रगोन्मृदत्युतच्चैरव विनाशयेत् ।

कलियुग में केवल शिवजी की पूजा फल देने वाली है । समस्तं पापं एवम् दु:ख भय शोक आदि का हरण करने के लिए महामृत्युजय की विधि ही श्रेष्ठ है। निम्निलिखित प्रयोजनों में महामृत्युजंय का पाठ करना महान लाभकारी एवम् कल्याणकारी होता है।

क्या आप जानते हैं ?एक 20 मीटर ऊंची चट्टान के ऊपर स्थित , धारी देवी का मंदिर अलकनंदा नदी के किनारे पर स्थित है. श्रीनगर -...
01/02/2012

क्या आप जानते हैं ?
एक 20 मीटर ऊंची चट्टान के ऊपर स्थित , धारी देवी का मंदिर अलकनंदा नदी के किनारे पर स्थित है. श्रीनगर - बद्रीनाथ राजमार्ग पर श्रीनगर (पौड़ी गढ़वाल) से 19 किलोमीटर की दूरी की यात्रा पर कालिया सव्ध नामक स्थान तक फिर अलकनंदा नदी की दिशा में एक किलोमीटर नीचे यह मंदिर स्थित है .एक स्थानीय कहानी अनुसार, मंदिर एक बार बाढ़ में बह गया था, तैरते हुई मूर्ति एक चट्टान पे रुक गई , ग्रामीणों ने मूर्ति को पुकारता हुआ सुना. स्थान पर पहुँचने पर उनहोंने एक दिव्य आवाज सुनी जिसने उन्हें निर्देश दिए की जिस स्थान पे मूर्ती है वहीँ पे उसे स्थापित किया जाए. तब से माता के भयंकर रूप की यह मूर्ति यहाँ स्थापित है , जिन्हें धारी देवी के रूप में जाना जाता है , खुले आकश के निचे यहाँ हजारों श्रद्धालु माता के दर्शन हेतु आते हैं. बद्रीनाथ जाते हुए भक्त यहाँ माता के दर्शन करना नहीं भूलते. श्रीनगर में स्थित इस धारी देवी मंदिर में माता का केवल सर स्थापित है , बाकी शरीर रुद्रप्रयाग जिले के कालीमठ में माना जाता है
यह माना जाता है कि धारी देवी की मूर्ति को छत के नीचे नहीं रखा जाएगा. उसी कारण से, धारी देवी मंदिर में मूर्तियों खुले आसमान के नीचे स्थापित हैं.
मंदिर के पास का गांव देवी धारी के नाम पे है और धारी गांव के रूप में जाना जाता है. अलकनंदा नदी पर एक झूला पुल धारी गांव को धारी मंदिर से जोड़ता है.
ॐ जय माँ धारी.
कहानी पढ़ने के बाद एक इच्छा मांगे .. माँ धारी देवी आपकी इच्छा को पूरी करें .
शेयर कर के अन्य भक्तों को भी माँ धारी की कृपा से अवगत कराएँ

25/01/2012

---------- गायत्री मंत्र -----------
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं
भर्गोदेवस्यधीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ।

_____ अर्थ _____
ॐ = परम अक्षर परमात्मा
भूः = प्रथम व्याह्वृति जिनसे सब (संसार उत्पन्न) है
भुवः = द्वितीय व्याह्वृति
स्वः = तृतीय व्याह्वृति
तत् = उन
सवितुः = सविता (सूर्य) देवता का
वरेण्यं = वरण करें
भर्गः = तेज
देवस्य = देवता का
धीमहि = ध्यान करें।
धियः = धी (धारणा,बुद्धि) को
यः = जो, वे
नः = हमारी (बुद्धि को)
प्रचोदयात् = प्रेरित करें

14/01/2012

ॐ....
देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि देवि परं सुखम् ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥

(Oh Goddess, bless me with good fortune, good health, good looks, success and fame. Oh Vaishnavi, you are the very basis for the world. You have mesmerised the World. When you are pleased with some one you ensure his salvation from the cycle of life and death)

13/01/2012

This is the website of Maa Dhari Devi Bhakt Samaj. This site contains information about dhari devi Temple, its history,locations and more...

13/01/2012

ॐ...
शरणागत दीनार्तपरित्राण परायणे। सर्वस्यातिहरे देवि नारायण नमोस्तुते।।
(You who are perpetually endeavoring to protect the weak and the poor and remove their misery. Oh Narayani, I pray to you)
जय माँ धारी देवी

Address

Srinagar
264174

Telephone

9911081126

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