31/03/2026
5 पैसे के झूठे इल्जाम के लिए रणवीर यादव ने 40 साल तक लड़ी कानूनी लड़ाई Iगुजर गई आधी जिंदगी
दिल्ली ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन (DTC) के एक साधारण बस कंडक्टर रणवीर सिंह यादव की कहानी सिर्फ 5 पैसे की नहीं, बल्कि सिस्टम के खिलाफ एक ईमानदार इंसान की 40 साल लंबी लड़ाई की कहानी है। साल 1973 में उन पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने एक महिला यात्री को 15 पैसे की जगह 10 पैसे का टिकट दिया और 5 पैसे अपने पास रख लिए। इस मामूली से आरोप के बाद विभागीय कार्रवाई हुई और 1976 में उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया। एक झूठे आरोप ने उनकी पूरी जिंदगी की दिशा बदल दी, लेकिन रणवीर यादव ने हार मानने के बजाय न्याय के लिए लड़ने का फैसला किया।
उन्होंने लेबर कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहां साल 1990 में कोर्ट ने साफ तौर पर उनकी बर्खास्तगी को गलत ठहराया और उन्हें बेगुनाह माना। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई, क्योंकि DTC ने इस फैसले को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दे दी। इसके बाद यह मामला वर्षों तक अदालतों में घसीटा जाता रहा। आखिरकार 2016 में दिल्ली हाई कोर्ट ने DTC की अपील को खारिज करते हुए रणवीर सिंह यादव के पक्ष में फैसला सुनाया और रणवीर सिंह को 30,000 रुपये का भुगतान किया । इसके साथ ही, अदालत ने उन्हें 1.28 लाख रुपये ग्रेच्युटी और 1.37 लाख रुपये CPF (कंट्रीब्यूटरी प्रोविडेंट फंड) के रूप में देने का निर्देश दिया।
सोचने वाली बात यह है कि जिस 5 पैसे के लिए यह पूरा मामला शुरू हुआ, वह सिक्का 1994 में ही चलन से बाहर हो गया था, लेकिन सिस्टम की जिद खत्म नहीं हुई। एक तरफ एक ईमानदार व्यक्ति अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए 40 साल तक कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाता रहा, वहीं दूसरी तरफ उसी 5 पैसे के लिए विभाग ने करीब 47 हजार रुपये खर्च कर दिए।
यह सिर्फ एक केस नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर बड़ा सवाल है जहां छोटे कर्मचारियों पर सख्ती दिखाई जाती है, जबकि बड़े घोटाले करने वाले अक्सर कानून की पकड़ से दूर रहते हैं।
रणवीर सिंह यादव के लिए यह लड़ाई 5 पैसे की नहीं, बल्कि अपने सम्मान, ईमानदारी और आत्मसम्मान की थी। उन्होंने यह साबित कर दिया कि सच्चाई को दबाया जा सकता है, लेकिन खत्म नहीं किया जा सकता। हालांकि न्याय मिलने में 40 साल लग गए, लेकिन उनकी यह लड़ाई आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मिसाल बन गई है।
आज जब हम इस कहानी को देखते हैं, तो एक सवाल जरूर उठता है — क्या हमारे सिस्टम में ईमानदार इंसान के लिए न्याय इतना मुश्किल होना चाहिए? जहां एक निर्दोष व्यक्ति की आधी जिंदगी एक छोटे से झूठे आरोप को साबित करने में गुजर जाती है, वहीं बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार करने वाले लोग आसानी से बच निकलते हैं। रणवीर यादव की यह कहानी हमें झकझोरती है और याद दिलाती है कि ईमानदारी की कीमत कभी-कभी बहुत भारी पड़ती है, लेकिन अंत में जीत उसी की होती है।