CPI_M Solapur

CPI_M Solapur काॅम्रेड नरसय्या आडम (मास्तर)
आपला माणुस हक्काचा माणुस
म्हणून या वेळेस फक्त मास्तरच आमदार The Lower House of Parliament has a strength of 543.

The CPI(M) was formed at the Seventh Congress of the Communist Party of India held in Calcutta from October 31 to November 7, 1964. The CPI(M) was born in the struggle against revisionism and sectarianism in the communist movement at the international and national level, in order to defend the scientific and revolutionary tenets of Marxism-Leninism and its appropriate application in the concrete I

ndian conditions. The CPI(M) combines the fine heritage of the anti-imperialist struggle and the revolutionary legacy of the undivided Communist Party which was founded in 1920. Over the years, the Party has emerged as the foremost Left force in the country. The CPI(M) has grown steadily since its formation in 1964. The membership of the Party, which was 118,683 at the time of its formation, has grown to 10,42,287 in 2009. The Party has sought to independently apply Marxism-Leninism to Indian conditions and to work out the strategy and tactics for a people's democratic revolution, which can transform the lives of the Indian people. The CPI(M) is engaged in bringing about this basic transformation by carrying out a programme to end imperialist, big bourgeois and landlord exploitation. The CPI(M) as the leading Left party is committed to build a Left and democratic front which can present a real alternative to the existing bourgeois-landlord policies. In the last few elections, contesting on an average 15 percent of the total seats, the CPI(M) has been getting around 5-6 percent of the votes. (India follows the “first past the post” system and not proportional representation) In the 2009 elections to the Lok Sabha (lower house of the Indian Parliament) the CPI(M) won 16 seats. In the Rajya Sabha (Upper House) the CPI(M) has 15 members. The CPI(M) is heading one state government. The Left Front government headed by the CPI(M) was uninterruptedly in power in West Bengal since 1977 upto May 2011. In Kerala, it has been in and out of office. Currently, the Left Democratic Front headed by the CPI(M) is in oppositon. In Tripura, the CPI(M) was first elected to office in 1977. Though it lost the subsequent election due to largescale rigging, in all elections since 1988 it has been voted to office. Though uneven, the CPI(M) has representation in nine state legislative assemblies.



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23/06/2021

विडी कामगाराचा रोजगार वाचवा
विडी कामगारांना संरक्षण द्या
कोरोना च्या नावाखाली विडी कामगारांना छळ करुं नका

लाल बावटा विडी कामगार युनियनCITU च्या वतीने सोलापूर जिल्हाधिकारी कार्यालयावर मोर्चा

21/06/2021

*कौन कहता है माकपा धर्म के खिलाफ है*
#प्रकाश_करात..
(लेखक CPM के महासचिव रह चुके है)

मीडिया के एक हिस्से ने माकपा को इस तरह पेश करने की कोशिश की है, जैसे माकपा का सदस्य होना किसी भी व्यक्ति की धार्मिक आस्थाओं के खिलाफ जाता है! कुछ सदाशयी धार्मिक नेताओं ने हमसे पूछा भी कि क्या यह फैसला आस्तिकों को पार्टी से बाहर रखने के लिए लिया गया है? ऐसे में, धर्म के प्रति माकपा का बुनियादी रुख स्पष्ट करने की जरूरत है। माकपा एक ऐसी पार्टी है, जो मार्क्‍सवादी दृष्टिकोण पर आधारित है। मार्क्‍सवाद एक भौतिकवादी दर्शन है और धर्म के संबंध में उसके विचारों की जड़ें 18वीं सदी के दार्शनिकों से जुड़ी हैं। इसी के आधार पर मार्क्‍सवादी चाहते हैं कि शासन धर्म को व्यक्ति के निजी मामले की तरह ले। शासन और धर्म को अलग रखा जाना चाहिए।

मार्क्‍सवादी नास्तिक होते हैं यानी वे किसी धर्म में विश्वास नहीं करते। बहरहाल, मार्क्‍सवादी धर्म के उत्सव को और समाज में उसकी भूमिका को समझते हैं। जैसा कि मार्क्‍स ने कहा था, धर्म उत्पीडि़त प्राणी की आह है, हृदयहीन दुनिया का हृदय है, आत्माहीन स्थिति की आत्मा है। इसलिए मार्क्‍सवाद धर्म पर हमला नहीं करता, लेकिन उन सामाजिक परिस्थितियों पर जरूर हमला करता है, जो उसे उत्पीडि़त प्राणी की आह बनाती हैं। लेनिन ने कहा था कि धर्म के प्रति रुख वर्ग संघर्ष की ठोस परिस्थितियों से तय होता है। मजदूर वर्ग की पार्टी की प्राथमिकता उत्पीडऩकारी पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ वर्गीय संघर्ष में मजदूरों को एकजुट करना है, भले ही वे धर्म में विश्वास करते हों या नहीं।

इसलिए, माकपा जहां भौतिकवादी दृष्टिकोण को आधार बनाती है, वहीं धर्म में विश्वास करने वाले लोगों के पार्टी में शामिल होने पर रोक नहीं लगाती। सदस्य बनने की एक ही शर्त है कि संबंधित व्यक्ति पार्टी के कार्यक्रम व संविधान को स्वीकार करता हो और पार्टी की किसी इकाई के अंतर्गत पार्टीगत अनुशासन के तहत काम करने के लिए तैयार हो। मौजूदा परिस्थितियों में माकपा धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि धार्मिक पहचान पर आधारित सांप्रदायिकता के खिलाफ लड़ रही है।

बेशक माकपा में धर्म में विश्वास रखने वाले लोग भी हैं। ऐसे लोग मजदूर, किसान और मेहनतकश जनता के दूसरे तबकों के बीच से आए हैं। इनमें से कुछ प्रार्थना के लिए मंदिर, मसजिद या चर्च में भी जाते हैं। वे अपनी धार्मिक आस्था को गरीबों तथा मेहनतकशों के बीच काम से जोड़ते हैं। माकपा को ऐसे आस्तिकों के साथ हाथ मिलाने में कोई हिचक नहीं, जो गरीबों के हितों की वकालत करते हैं। खुद केरल में ऐसे सहयोग की लंबी परंपरा है। ईएमएस नंबूद्रीपाद ने मार्क्‍सवादियों और ईसाइयों के बीच सहयोग के क्षेत्रों के बारे में लिखा था और चर्च के कुछ नेताओं के साथ संवाद भी चलाया था।

जहां तक माकपा के ताजा अभियान की बात है, तो उसमें पार्टी अपने नेतृत्वकारी साथियों से अपेक्षा करती है कि वे द्वंद्वात्मक भौतिकवाद पर आधारित मार्क्‍सवादी विश्व-दृष्टि को आत्मसात करेंगे। केंद्रीय कमेटी ने इस संदर्भ में जो दस्तावेज स्वीकार किया है, उसमें धार्मिक गतिविधियों से जुड़े दो दिशा-निर्देशों का जिक्र किया गया है। एक तो यही है कि पार्टी सदस्यों को ऐसे सभी सामाजिक, जातिगत तथा धार्मिक आचारों को त्यागना चाहिए, जो कम्युनिस्ट कायदे और मूल्यों से मेल नहीं खाते। यहां पार्टी सदस्यों से धार्मिक निष्ठा त्यागने की बात नहीं की जा रही, लेकिन उन आचारों को छोडऩा होगा, जो कम्युनिस्ट मूल्यों से टकराते हों, जैसे छुआछूत बरतना, महिलाओं को समान अधिकारों से वंचित करना या विधवा पुनर्विवाह का विरोध करना।

दूसरा दिशा-निर्देश पदाधिकारियों तथा निर्वाचित प्रतिनिधियों के आचरण से संबंधित है। उनसे कहा गया है कि वे अपने परिवार के सदस्यों की खर्चीली शादियां न करें और दहेज लेने से दूर रहें। उनसे यह भी कहा गया है कि धार्मिक समारोहों का आयोजन या धार्मिक कर्मकांड न करें। पार्टी के नेतृत्वकारी कार्यकर्ताओं को दूसरों द्वारा आयोजित ऐसे सामाजिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेना पड़ सकता है। यह विधायकों तथा पंचायत सदस्यों जैसे निर्वाचित लोगों के मामले में खास तौर पर सच है। कम्युनिस्ट नेता यह नहीं कर सकते कि सार्वजनिक रूप से कुछ कहें और निजी जीवन में कुछ और आचरण करें।

कुल मिलाकर यह कि कम्युनिस्ट पार्टी धर्म में आस्था रखने वाले लोगों को अपना सदस्य बनने से नहीं रोकती है।

बहरहाल, जहां वे अपने धर्म का पालन करते रह सकते हैं, वहीं उनसे यह उम्मीद भी की जाती है कि धर्मनिरपेक्षता पर कायम रहेंगे और शासन के मामलों में धर्म की घुसपैठ का विरोध करेंगे। पुनरुद्धार के दिशा-निर्देशों का यही मकसद है कि कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों को कम्युनिस्ट मूल्यों के अनुरूप आचरण करने में मदद की जाए। कुछ ल

25/05/2021

या देशातील शेतकरी तिन नवीन कृषी कायदे रद्द करा म्हणून दिल्ली च्या सिमे वर ॴदोलन करत आहेत दि.२६मे‌ रोजी सहा महिने या ॴदोलनास होत आहेत या काळात शेकडो शेतकरी शाहिद झाले संवेदन शुन्य सरकार च्या विरोधात २६ मे काळा दिवस म्हणून साजरा करण्यात येत आहे

https://www.sd24th.com/2019/12/60-lakh-non-muslims-will-be-out-of-NRC.html?m=1 #
29/12/2019

https://www.sd24th.com/2019/12/60-lakh-non-muslims-will-be-out-of-NRC.html?m=1 #

यहाँ 60 लाख गैर-मुस्लिम एनआरसी से बाहर होंगे? देसी होने के नहीं दस्तावेज 60 लाख नामांकित, घुमंतू, अर्ध घुमंतू जनजातिया...

आज  सोलापूर येथे  भारताचा कम्युनिस्ट पक्ष (मार्क्सवादी) च्या वतीने   कायदा रद्द करा या मागणी करता भव्य निर्दशने हजारोच्य...
19/12/2019

आज सोलापूर येथे भारताचा कम्युनिस्ट पक्ष (मार्क्सवादी) च्या वतीने कायदा रद्द करा या मागणी करता भव्य निर्दशने
हजारोच्या संख्येने नागरीक उत्साहाने सहभागी

09/10/2019

आडम मास्तर बस नाम ही काफी है

30/09/2019

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लाल बावटा रिक्शा चालक संघटना 176
Solapur

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