06/06/2022
राम जन्म प्रसाद सिंह जी की प्रथम पुण्यतिथि पर समर्पित।
*जीवन परिचय:-*
इनका जन्म 18 जून 1951 एवं मृत्यु 7 जून 2021 को हुआ।
इनकी जीवनसंगिनी कलावती एवं इनके दो पुत्रियां और 3 पुत्र हैं। यह एक शिक्षाविद समाजसेवी एवं विचारक थे। इनका जन्म हिंदू परिवार के क्षत्रिय कुल में हुआ था।
रामजन्म प्रसाद सिंह जी का जन्म उत्तर बिहार के सिवान जिले के गोरियाकोठी में हुआ। वे भारतीय संस्कृति से ओतप्रोत एक प्रख्यात शिक्षाविद,समाजसेवी,उत्कृष्ट वक्ता और एक आस्थावान हिंदू विचारक थे। शिक्षक बनने से पूर्व उन्होंने अपने जीवन के महत्वपूर्ण 35 वर्ष शिक्षक के रूप में व्यतीत किए थे ।उनमें एक आदर्श शिक्षक के सारे गुण मौजूद थे। रामजन्म प्रसाद सिंह अपने गांव एवं परिवार को एक शिक्षालय मानते थे। वह अपने बुद्धिमतापूर्ण व्याख्याओ को आनंददाई अभिव्यक्ति और हंसाने और गुदगुदाने वाली कहानियां- कविताओं से अपने छात्रों को मंत्रमुग्ध कर दिया करते थे । वे छात्रों को प्रेरित करते थे कि वे उच्च भौतिक मूल्यों को अपने आचरण में उतारें। वह जिस विषय को पढ़ाते थे पढ़ाने के पहले स्वयं उसका अच्छा से अध्ययन करते थे एवं वे अपनी शैली की नवीनतम से सरल और रोचक बना देते थे ।जब वह शिक्षक बने थे तब कुछ शिष्यों ने अपनी उच्च शिक्षा की पढ़ाई के लिए ट्यूशन पढ़ने लगे। इनके कई शिष्य डॉक्टर,इंजीनियर एवं शिक्षक भी बने। शिक्षा के क्षेत्र में रामजन्म प्रसाद सिंह ने जो अमूल्य योगदान दिया वह निश्चय ही अविस्मरणीय रहेगा । वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। यद्यपि वे एक जाने-माने विद्वान शिक्षक,समाजसेवी,वक्ता और शिक्षा शास्त्री थे । तथापि अपने जीवन के उत्तरार्ध में समाजसेवी एवं वक्ता का कार्य करते हुए भी वे शिक्षा के क्षेत्र में सतत योगदान करते रहे। उनकी मान्यता थी कि यदि सही तरीके से शिक्षा दिया जाए तो समाज के अनेक बुराइयों को मिटाया जा सकता है। वे कहा करते थे मात्र जानकारियां देना शिक्षा नहीं है यद्यपि जनकारी का अपना महत्व है शिक्षा का लक्ष्य व ज्ञान के प्रति समर्पण की भावना और निरंतर सीखते रहने की प्रवृत्ति ।यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो व्यक्ति को ज्ञान और कौशल दोनों प्रदान करती है तथा इनका जीवन में उपयोग करने का मार्ग प्रशस्त करती है ।करुणा प्रेम और श्रेष्ठ परंपराओं का विकास भी शिक्षा के उद्देश्य हैं ।वे कहते थे कि जब तक शिक्षक शिक्षा के प्रति समर्पित और प्रतिबद्ध नहीं होता और कोई एक मिशन नहीं मानता तब तक अच्छी शिक्षा की कल्पना नहीं की जा सकती है। उन्होंने अनेक वर्षों तक अध्ययन किया। एक आदर्श शिक्षक के सभी गुण उनमें विद्यमान थे। उनका कहना था कि शिक्षक उन्हीं लोगों को बनाया जाना चाहिए जो सबसे अधिक बुद्धिमान हो। शिक्षक को मात्र अच्छी तरह अध्ययन करके ही संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए अपितु उसे अपने छात्रों को स्नेह और आदर भी अर्जित करना चाहिए। सम्मान शिक्षक होने भर से नहीं मिलता उसे अर्जित करना पड़ता है। रामजन्म प्रसाद सिंह ने अपने जीवन में बहुत कठिनाइयों का सामना किए ।वे अपने गांव परिवार की उन्नति के लिए काफी परिश्रम और योगदान किए।
श्रद्धासुमन समर्पित (द्वारा लिखित) :- कृष्ण प्रताप चंद्रवंशी
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