01/10/2023
जवानों मोड़ सकते हो तो मोड़ो रुख जमाने का, अगर तुम कर नहीं सकते तो फिर नौजवान क्यों हो? अभी हाल ही में संपन्न लोकसभा चुनावों में यह पंक्तियाँ एक 70 वर्ष की आयु के प्रत्याशी के भाषण में सुनी| हंसी भी आई और क्षोभ भी हुआ| सभा में वक्ता ही सबसे ज्यादा आयु के थे और श्रोता सभी नौजवान ही थे| सभा के पश्चात एक युवा ने प्रश्न किया कि यदि आप विजई हुए तो रोजगार के लिए क्या कदम उठाएंगे| नेता जी के पास कोई जवाब ही न था| *नेता जी का वही घिसा पिटा जवाब था* कि एक बार जिता दीजिये फिर सब कुछ ठीक कर दूंगा| तत्पश्चात नेता जी तुरंत अपने चिर परिचित बिजली सड़क के पुराने नारों पर आ गए|
ऐतिहासिक रूप से सभी क्रांतियाँ युवाओं की ही की हुई हैं| चाहे वह जय प्रकाश नारायण का आन्दोलन हो या अन्ना का आन्दोलन हो| युवा शक्ति क्रान्ति का प्रतीक होती है| कहा भी जाता है जिस ओर जवानी चलती है उस ओर जमाना चलता है| भारत की राजनीति में भी सार्वधिक नाम कमाने वाले वही राजनीतिज्ञ रहे हैं जो युवावस्था से ही राजनीति में कूदे| चाहे वह अटल जी हों या इंदिरा जी या फिर मायावती हों ऐतिहासिक रूप से भारत वर्ष में श्री राम युवावस्था में अयोध्या के राजा हुए| 29 वर्ष की आयु में यह वही धरा है जहाँ अंग्रेजों की गुलामी में भी चन्द्र शेखर आज़ाद एवं भगत सिंह जैसे युवा क्रांतिकारी हुए|
*यह भारत का बहुत बड़ा दुर्भाग्य है कि भारत वर्ष में लगभग सभी राजनैतिक पार्टिया युवाओं का शोषण ही करती हैं*| सभी राजनैतिक दलों के युवा प्रकोष्ठ हैं, दलों की रैलियों में भीड़ लाने का, धरना अनशन प्रदर्शन, पुलिस की लाठियां खाने का उत्तर दायित्व पूरी तरह से युवाओं का ही माना जाता है| चुनाव के समय कैम्पेनिंग करना हो या मतदाताओं को बूथ तक लाना हो, दारू पैसा बांटना हों इन सभी में युवाओं के कंधे पर ही बन्दूक रखी जाती है| पर जब संगठन में उत्तर दायित्व देने की बारी आती है या सरकार में भागीदारी की बारी आती है, तो युवाओं को अनुभव हीन बता कर उनके अधिकार से वंचित रखा जाता है| टोकन स्वरुप 5 – 10 % नियुक्तियां युवाओं की होती भी हैं तो वोह प्रायः नेता जी के परिवार के होते हैं या फिर उनके सम्बन्ध नेता जी से अच्छे होते हैं| भारत की दो तिहाई जनसँख्या 35 वर्ष से कम आयु की है| पर उनका प्रतिनिधित्व करने वाले राजनैतिज्ञ 95 % 35 वर्ष से ज्यादा आयु के हैं| सभी दलों के संगठनों में भी 35-40 वर्ष तक की आयु के नेताओं का लगभग पूरी तरह से अभाव है| जो हैं भी वोह प्रायः बड़े नेताओं के डमी उम्मीदवारों के ही रूप में हैं|
*हास्यास्पद यह भी है* कि प्रायः 50 – 60 वर्ष वालों को भी राजनीति में युवा कह कर संबोधित किया जाता है| जिस उम्र में तेंदुलकर रिटायर होते हैं उस उम्र के नेता को *युवा नेता बोला जाता है*| यह सब एक शाजिश है युवाओं को उनके अधिकारों से वंचित रखने की| दुर्भाग्य यह भी है कि सरकारें जब नीतियां बनाती हैं, तो किसानों के लिए अलग नीतियां बनती हैं, व्यापारियों के लिए अलग| यहाँ तक की जाति और धर्मों तक के लिए भी नीतियां आती हैं, पर युवाओं के लिए प्रतीकात्मक इक्का दुक्का नीतियां छोड़ दी जाएँ तो युवाओं के लिए कोई नीति ही नहीं आती| बिजली, पानी, मकान, सुरक्षा आदि आदि सारे देश की समस्याएं हैं| इनको युवाओं से जोड़ना गलत| युवाओं की समस्याएं हैं रोजगार, शिक्षा, मानसिक तनाव आदि| शायद ही कोई सरकार हो जो इन समस्याओं पर ध्यान केन्द्रित करती हो
सिर्फ युवाओं का यूज किया जाता है युवाओं को अपने बारे में स्वयं सोचना होगा