Manoj jha

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॥सुंदर कांड॥जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा॥मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी॥भावार्थहे मूर्...
01/10/2026

॥सुंदर कांड॥
जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा॥
मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी॥

भावार्थ
हे मूर्ख! तूने मेरा भेद नहीं जाना जहाँ तक (जितने) चोर हैं, वे सब मेरे आहार हैं। महाकपि हनुमान जी ने उसे एक घूँसा मारा, जिससे वह खून की उलटी करती हुई पृथ्वी पर लुढ़क पड़ी॥


॥सुंदर कांड॥मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी॥नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी॥भावार्थ-हनुमान ...
01/10/2026

॥सुंदर कांड॥

मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी॥नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी॥

भावार्थ-हनुमान जी मच्छड़ के समान (छोटा सा) रूप धारण कर नर रूप से लीला करने वाले भगवान्‌ श्री रामचंद्रजी का स्मरण करके लंका को चले (लंका के द्वार पर) लंकिनी नाम की एक राक्षसी रहती थी। वह बोली- मेरा निरादर करके (बिना मुझसे पूछे) कहाँ चला जा रहा है?


॥सुंदर कांड॥पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।�अति लघु रूप धरों निसि नगर करौं पइसार॥भावार्थ- नगर के बहुसंख्यक रखवाल...
01/10/2026

॥सुंदर कांड॥

पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।�अति लघु रूप धरों निसि नगर करौं पइसार॥

भावार्थ- नगर के बहुसंख्यक रखवालों को देखकर हनुमान जी ने मन में विचार किया कि अत्यंत छोटा रूप धरूँ और रात के समय नगर में प्रवेश करूँ॥


॥सुंदर कांड॥करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं। कहुँ महिष मानुष धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं ॥ एहि लागि तु...
24/09/2026

॥सुंदर कांड॥

करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं।
कहुँ महिष मानुष धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं ॥
एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही।
रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही ॥3॥

भावार्थ- भयंकर शरीर वाले करोड़ों योद्धा यत्न करके (बड़ी सावधानी से) नगर की चारों दिशाओं में (सब ओर से) रखवाली करते हैं। कहीं दुष्ट राक्षस भैंसों, मनुष्यों, गायों, गदहों और बकरों को खा रहे हैं। तुलसीदास ने इनकी कथा इसीलिए कुछ थोड़ी सी कही है कि ये निश्चय ही श्री रामचंद्रजी के बाण रूपी तीर्थ में शरीरों को त्यागकर परमगति पावेंगे ॥


॥सुंदर कांड॥बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं।नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं॥कहुँ माल देह बिसाल सैल समा...
24/09/2026

॥सुंदर कांड॥

बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं।
नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं॥
कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं।
नाना अखारेन्ह भिरहिं बहुबिधि एक एकन्ह तर्जहीं॥

भावार्थ- वन, बाग, उपवन (बगीचे), फुलवाड़ी, तालाब, कुएँ और बावलियाँ सुशोभित हैं। मनुष्य, नाग, देवताओंऔर गंधर्वोंकी कन्याएँ अपने सौंदर्य से मुनियों के भी मन को मोहे लेती हैं। कहीं पर्वत के समान विशाल शरीर वाले बड़े ही बलवान्‌ मल्ल (पहलवान) गरज रहे हैं। वे अनेकों अखाड़ों में बहुत प्रकार से भिड़ते और एक-दूसरे को ललकारते हैं॥


॥सुंदर कांड॥कनक कोटि बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना। चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना ॥ गज बाजि खच्चर निकर...
24/09/2026

॥सुंदर कांड॥

कनक कोटि बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।
चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना ॥
गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथन्हि को गनै।
बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै ॥1 ॥

भावार्थ- विचित्र मणियों से जड़ा हुआ सोने का परकोटा है, उसके अंदर बहुत से सुंदर-सुंदर घर हैं। चौराहे, बाज़ार, सुंदर मार्ग और गलियाँ हैं, सुंदर नगर बहुत प्रकार से सजा हुआ है। हाथी, घोड़े, खच्चरों के समूह तथा पैदल और रथों के समूहों को कौन गिन सकता है! अनेक रूपों के राक्षसों के दल हैं, उनकी अत्यंत बलवती सेना वर्णन करते नहीं बनती ॥


॥सुंदर कांड॥अति उतंग जलनिधि चहुँ पासा। कनक कोट कर परम प्रकासा॥भावार्थ-वह अत्यंत ऊँचा है, उसके चारों ओर समुद्रहै। सोने के...
22/09/2026

॥सुंदर कांड॥

अति उतंग जलनिधि चहुँ पासा।
कनक कोट कर परम प्रकासा॥

भावार्थ-वह अत्यंत ऊँचा है, उसके चारों ओर समुद्रहै। सोने के परकोटे (चहारदीवारी) का परम प्रकाश हो रहा है॥


॥सुंदर कांड॥उमा न कछु कपि कै अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई ॥ गिरि पर चढ़ि लंका तेहिं देखी। कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेष...
22/09/2026

॥सुंदर कांड॥

उमा न कछु कपि कै अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई ॥ गिरि पर चढ़ि लंका तेहिं देखी। कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी ॥

भावार्थ- (शिवजी कहते हैं-) हे उमा! इसमें वानर हनुमान की कुछ बड़ाई नहीं है। यह प्रभु का प्रताप है, जो काल को भी खा जाता है। पर्वत पर चढ़कर उन्होंने लंका देखी। बहुत ही बड़ा किला है, कुछ कहा नहीं जाता ॥


॥सुंदर कांड॥नाना तरु फल फूल सुहाए। खग मृग बृंद देखि मन भाए॥�सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढ़ेउ भय त्यागें॥भावार्थ- ...
22/09/2026

॥सुंदर कांड॥

नाना तरु फल फूल सुहाए। खग मृग बृंद देखि मन भाए॥�सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढ़ेउ भय त्यागें॥

भावार्थ- अनेकों प्रकार के वृक्ष फल-फूल से शोभित हैं। पक्षी और पशुओं के समूह को देखकर तो वे मन में (बहुत ही) प्रसन्न हुए। सामने एक विशाल पर्वत देखकर हनुमान जी भय त्यागकर उस पर दौड़कर जा चढ़े ॥


॥सुंदर कांड॥ताहि मारि मारुतसुत बीरा। बारिधि पार गयउ मतिधीरा॥�तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा॥भावार्थ- पवनपु...
13/09/2026

॥सुंदर कांड॥

ताहि मारि मारुतसुत बीरा। बारिधि पार गयउ मतिधीरा॥�तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा॥

भावार्थ- पवनपुत्र धीरबुद्धि वीर श्री हनुमान जी उसको मारकर समुद्र के पार गए। वहाँ जाकर उन्होंने वन की शोभा देखी। मधु (पुष्प रस) के लोभ से भौंरे गुंजार कर रहे थे॥


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