Manoj jha

Manoj jha हम तो लिख देते हैं
जो भी दिल में आता है ?

वे द्विज थेकहते हैं वे विराट पुरुष के मुख से निस्सृत हुएदेवता उन्हें भूदेव कहते थेप्रियदर्शी अशोक ने कहा वे ब्राह्मण थेव...
03/12/2025

वे द्विज थे
कहते हैं वे विराट पुरुष के मुख से निस्सृत हुए
देवता उन्हें भूदेव कहते थे
प्रियदर्शी अशोक ने कहा
वे ब्राह्मण थे

वे हर पवित्र और अपवित्र के बीच लकीर खींचना चाहते थे
उन्होंने अराजकता को वर्ण के अनुशासन में कसा
अग्नि में अपनी समिधाएं सौंपी और नाद किया अहम् ब्रह्मास्मि! अहम् ब्रह्मास्मि!!
वे ब्राह्मण थे

यदि तर्क का सहारा लिया जाए तो
वह भी इंसानों की तरह पैदा होते थे
उनके पास बड़ी-बड़ी गाथाएँ थीं
शाप देने की,संतान देने की,वरदान देने की
भिक्षा माँगने की,और मोक्ष की

वे व्यवस्था के शीर्ष पर घुटनों तक और अपने दंभ में कंधों तक
वे डूबे होते थे,हाथ संकल्प का जल और मुट्ठियों में कुश लिए
वे सम्राटों का भाग्य निर्धारण करते रहे

न! युद्ध के लिए नहीं
वे राज्य करने के लिए युद्ध नहीं लड़ते थे
वे सम्राटों को बनाते और मिटाते थे
वे चाणक्य और विद्यारण्य थे
वे ब्राह्मण थे

वे मध्य-एशिया के पठारों से आए या यहीं की माटी से उपजे
यह बहस का विषय था, उनके अस्तित्व का नहीं
वे विलुप्त सरस्वती के किनारों पे उगे
वे हिमालय की धवल गुफाओं से उतरे
वे हिमयुग की परतों को चीरकर आए
या फिर भी वे इसी समाज के हिस्सों से आए
वे आए
क्योंकि वे आ सकते थे
वे ब्राह्मण थे

वे महत्त्वपूर्ण तो थे लेकिन उनके पास दरिद्रता की स्मृतियाँ थीं
वे सुदामा की तरह जीते थे और तंदुल चबाकर संतोष कर लेते थे
ज्ञान के लिए वे बेचैन थे
वे ब्राह्मण थे

यदि सच को सच की तरह कहा जा सकता है
तो सच को सच की तरह सुना जाना चाहिए
कि वे शास्त्र और शस्त्र के बीच ऐसे आवाजाही करते थे
कि भेद मिट जाता था कि वे अग्नि को समिधा सौंपते पुरोहित थे
या फरसा लिए योद्धा
वे ब्राह्मण थे

वे न होते तो चाणक्य का अर्थशास्त्र न होता शुंग न होते , गुप्त न होते , पेशवे ना होते शून्य न होता, आर्यभट्ट न होता
त्रिपिटक न होते, उपनिषद न होते संस्कृत का व्याकरण न होता
निराला की वह तोड़ती पत्थर न होती
मुक्तिबोध का ब्रह्मराक्षस ना होता
वे न होते तो तुलसी की चौपाई को गाने वाला कंठ न होता
वे न होते तो शंकर का अद्वैत न होता ,नागार्जुन का शून्यवाद ना होता
ब्राह्मण न होते तो 1857 का विद्रोह न होता
आजादी का संग्राम न होता
वे थे तो आज़ाद थे, वे थे तो तिलक थे
वे थे तो नेहरू थे , वे थे तो सावरकर थे
वे थे तो MN रॉय थे , वे थे तो बाजपेयी थे
वे ब्राह्मण थे

वे घाटों में थे , मंदिरों में थे , गुरुकुलों में थे
वे शालाओं में थे, वे नगरों में थे
वे गाँवों में थे
वे ब्राह्मण थे।

मगर उनके बच्चे अब शहर के फ्लैटो में हैं
वे सोचते हैं कि काश वे सरहद पार कर जाए
पश्चिम की किसी अनाम गली में सुकून से बस जाएँ
वे सोचते हैं और सोचकर डरते हैं

आरक्षण की सूचियों को देखकर वे चुप होते है
वे चुप होते हैं और चुप होकर डरते हैं
वे जितना कलयुग के आने से डरते है
उतना ही समाज उच्छृखंल हो जाने से डरते हैं
अपने प्रभुसत्ता के जाने से डरते हैं

वे दलितों के उत्थान से नहीं डरते हैं
वे अपनी संतानों के पिछड़ने से डरते हैं
वे मंडल से डरते हैं , वे अपने ही थामे कमंडल से भी डरते हैं
वे अकड़ते हैं, लेकिन अंदर से डरते है,
कोट के अंदर दबा जनेऊ बाहर ना दिख जाए
वे अपने ब्राह्मण पहचान से डरते हैं

वे शोषक नहीं थे,
लेकिन इतिहास की अदालतों में व्यवस्था की बहसों में
वे बलि का बकरा बनाए जाने से डरते हैं
सबके पापों का बोझ अपने बच्चों के माथे पर मढ़े जाने से डरते हैं।
वे ब्राह्मण हैं।

वे ब्राह्मण थे
वे कथा कहते थे , वे कुंडली मिलाते थे
मगर
उनके मंत्रोच्चार की आवाज़ें अब कम गूँजती हैं,
अब काशी उनका घर नहीं है
दान-पुण्य पर उनका हक़ नहीं है
गंगा का आचमन छूट गया है
वे इस महा परिवर्तन को महसूस करते हैं
और महसूस करने के बाद कहते हैं ….घोर कलियुग आ गया है
वे ब्राह्मण हैं

हर चुनाव से पहले देश की ज़्यादातर राजनीति यह कहती है
कि ब्राह्मणों के कारण ही ऊँच-नीच है, भेदभाव है
वह निरन्तर ऐसी चर्चाओं को सुनते हैं ,
मगर इनमें फँसने के बजाए वे आगे बढ़ना चाहते हैं
इन सब के चक्कर में वे पीछे ना छूट जाए इस बात से डरते हैं
उनके बच्चे कोचिंग की कतारों में लगे रहते हैं ,
उनकी स्त्रियाँउनके कंधों के बरक्स चला करती है।
वे ब्राह्मण हैं

वे ब्राह्मण हैं इसलिए
डूबते हुए जहाज़ के नाविकों की तरह परंपराओं को भींचे रहते हैं ,
कुछ लोगों ने यह बहस चलाई थी कि उन्हें कोसा जाए तो
किस सदी के लिए कोसा जाए बहस यह थी कि उन्हें नकारा जाए
तो किस आधार पर नकारा जाए यह बहस अनवरत चलेगी
यह देवताओं को नकारने का विषय है
मगर जब यहाँ कुछ नहीं था तब वे थे जब तलक यहाँ सबकुछ है
तबतक वह रहेंगे,जब सबकुछ मिट जाएगा फिर भी वह रहेंगे
क्योंकि
वे ब्राह्मण हैं
वे ब्राह्मण हैं
वे ब्राह्मण हैं

06/11/2025

मिथिला की पुण्य भूमि धरा अनेक महापुरुषों को जन्म दिया ऐसे में ही एक महापुरुष वर्तमान के शिवहर जिला के छतौनी गांव में महान संत का अवतरण हुआ जिनका नाम प्रेमभिक्षु जी महाराज पड़ा उनका मूल मंत्र पूरे भारत में खासकर बिहार उत्तर प्रदेश में विजय मंत्र श्री राम जय राम जय जय राम,
के रूप में संकीर्तन करते है
परम पूज्य प्रातः स्मरणीय प्रेमानंद जी महाराज एवं मलूक पीठाधीश्वर प्रातः स्मरणीय पूजनीय राजेंद्रदास जी महाराज का यह वार्तालाप हमारे बिहार के शिवहर के छतौनी गांव की एवं मुजफ्फरपुर की विषय पर चर्चा हम लोगों को आह्लाद एवं सौभाग्यशाली प्रदान करता है,ऐसे महान संतों के पुण्य धरा पर हम लोग का जन्म हुआ ,मां जानकी की पुण्य धरा पर भगवान ने हमें जन्म देकर सौभाग्यशाली प्रदान किए,
ऐसे महान संतों के पुण्य चरणों में सादर प्रणाम अर्पित करता हूं 🙏,सादर जय सियाराम,श्री राम जय राम जय जयराम,

07/10/2025

सादर जय सिया राम 🙏

वास्तु शास्त्र: 7 चित्र जो घर में लाएँगे धन, सौभाग्य और सकारात्मक ऊर्जा - प्रदान करता है 1. “प्रवाहित-जलधारायाः लक्ष्मीप...
15/08/2025

वास्तु शास्त्र: 7 चित्र जो घर में लाएँगे धन, सौभाग्य और सकारात्मक ऊर्जा - प्रदान करता है
1. “प्रवाहित-जलधारायाः लक्ष्मीप्रवेशः”

उत्तर दिशा में रजत-जटित (Silver) फ्रेम में प्रवाहित झरने का चित्र स्थापित करें। यह जल-तत्व का संतुलन करता है तथा गृह में यदि वास्तु-दोष हो, तो भी लक्ष्मी का आगमन आरंभ कर देता है।
2. “ॐकारस्य मंगलप्रभावः”

उत्तर-पूर्व दिशा में ॐ का चित्र स्वर्ण-जटित फ्रेम में स्थापित करें। यह आपको आपके लक्ष्यों से जोड़ता है तथा जीवन में उन्नति एवं सुख-समृद्धि प्रदान करता है। यदि जीवन में अव्यवस्था अथवा बाधा अनुभव हो रही हो, तो इसे अवश्य अपनाएँ।
3. “फलपुष्पित-वृक्षस्य ऐश्वर्यफलम्”

आर्थिक उन्नति हेतु घने वृक्ष का चित्र, जिसमें अनेक फल लगे हों, लगाएँ। यह जन-संपर्क को प्रगाढ़ करता है और संबंधों को फलदायी बनाता है। इसे गृह में कहीं भी लगाएँ, किन्तु स्थान का चयन उचित हो।
4. “लक्ष्मीनारायणस्य धनस्थैर्यप्रदत्वम्”

दक्षिण-पूर्व दिशा में लक्ष्मी-नारायण का चित्र लगाएँ। यह माता लक्ष्मी को स्थिर करता है, क्योंकि यह दिशा उनका स्थान मानी जाती है। इससे गृह में स्थिरता और धन का प्रवाह बढ़ता है।
5. “हनुमत् साधना-शक्तिप्रदः”

दक्षिण-दक्षिण-पूर्व दिशा में श्रीहनुमानजी का शांत साधना-रूप चित्र स्थापित करें। यह जीवन की प्रत्येक परिस्थिति का धैर्य एवं साहस के साथ सामना करने की शक्ति प्रदान करता है।
6. “सुमेरु-हिमालयस्य स्थैर्यवर्धनम्”

दक्षिण-पश्चिम दिशा में सुमेरु या हिमालय पर्वत का चित्र स्वर्ण-जटित फ्रेम में लगाएँ। यह जीवन में स्थिरता, पारिवारिक एकता, व्यापार-वृद्धि तथा सुख-समृद्धि लाता है।
7. “धन्वंतरि-देवस्य आयुरारोग्यसिद्धिः”

पश्चिम दिशा में भगवान धन्वंतरि का चित्र, जिनके हाथ में अमृत-कलश हो, लगाएँ। यह जीवन में अमृत के समान सफलता प्रदान करता है, प्रत्येक कार्य को सिद्ध करता है तथा स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी है।
सादर जय सिया राम 🙏
नमो राघवाय 🙏
मनोज झा 🙏

तंत्रोक्त वनस्पति टोटके 🧵छोटे-छोटे उपाय हर घर में लोग जानते हैं, किंतु उनकी विधिवत् जानकारी के अभाव में वे उनके लाभ से व...
19/05/2025

तंत्रोक्त वनस्पति टोटके 🧵

छोटे-छोटे उपाय हर घर में लोग जानते हैं, किंतु उनकी विधिवत् जानकारी के अभाव में वे उनके लाभ से वंचित रह जाते हैं। हमारे आसपास पाए जाने वाले विभिन्न पेड़-पौधों के पत्तों, फलों आदि का टोटकों के रूप में उपयोग भी हमारी सुख-समृद्धि की वृद्धि में सहायक हो सकता है।

बिल्व पत्र :

अश्विनी नक्षत्र वाले दिन एक रंग वाली गाय के दूध में बेल के पत्ते डालकर वह दूघ निःसंतान स्त्री को पिलाने से उसे संतान की प्राप्ति होती है।

अपामार्ग की जड़ :

अश्विनी नक्षत्र में अपामार्ग की जड़ लाकर इसे तावीज में रखकर किसी सभा में जाएं, सभा के लोग वशीभूत होंगे।
नागर बेल का पत्ता :

यदि घर में किसी वस्तु की चोरी हो गई हो, तो भरणी नक्षत्र में नागर बेल का पत्ता लाकर उस पर कत्था लगाकर व सुपारी डालकर चोरी वाले स्थान पर रखें, चोरी की गई वस्तु का पला चला जाएगा।

संखाहुली की जड़ :

भरणी नक्षत्र में संखाहुली की जड़ लाकर तावीज में पहनें तो विपरीत लिंग वाले प्राणी आपसे प्रभावित होंगे।

आक की जड़ :

कोर्ट कचहरी के मामलों में विजय हेतु आर्द्रा नक्षत्र में आक की जड़ लाकर तावीज की तरह गले में बांधें।

दूधी की जड़ :

सुख की प्राप्ति के लिए पुनर्वसु नक्षत्र में दूधी की जड़ लाकर शरीर में लगाएं।
शंख पुष्पी :

पुष्य नक्षत्र में शंखपुष्पी लाकर चांदी की डिविया में रखकर तिजोरी में रखें, धन की वृद्धि होगी।

बरगद का पत्ता :

अश्लेषा नक्षत्र में बरगद का पत्ता लाकर अन्न भंडार में रखें, भंडार भरा रहेगा।

धतूरे की जड़ :

अश्लेषा नक्षत्र में धतूरे की जड़ लाकर घर में रखें, घर में सर्प नहीं आएगा और आएगा भी तो कोई नुकसान नहीं पहुंचाएगा।

बेहड़े का पत्ता :

पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र में बेहड़े का पत्ता लाकर घर में रखें, घर ऊपरी हवाओं के प्रभाव से मुक्त रहेगा।

नीबू की जड़ :

उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में नीबू की जड़ लाकर उसे गाय के दूध में मिलाकर निःसंतान स्त्री को पिलाएं, उसे पुत्र की प्राप्ति होगी।
चंपा की जड़ :

हस्त नक्षत्र में चंपा की जड़ लाकर बच्चे के गले में बांधे, बच्चे की प्रेत बाधा तथा नजर दोष से रक्षा होगी।

चमेली की जड़ :

अनुराधा नक्षत्र में चमेली की जड़ गले में बांधें, शत्रु भी मित्र हो जाएंगे।

काले एरंड की जड़ :

श्रवण नक्षत्र में एरंड की जड़ लाकर निःसंतान स्त्री के गले में बांधें, उसे संतान की प्राप्ति होगी।

तुलसी की जड़ :

पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र में तुलसी की जड़ लाकर मस्तिष्क पर रखें, अग्निभय से मुक्ति मिलेगी।
इन टोटकों का सही विधि से, श्रद्धा और विश्वासपूर्वक प्रयोग किया जाए तो यह नकारात्मक ऊर्जा को दूर कर, सकारात्मकता और समृद्धि को आमंत्रित कर सकते हैं।
सादर जय सिया राम 🙏 Manoj jha मनोज झा Manoj Jha

एक बहुत ही बड़े उद्योगपति का पुत्र कॉलेज में अंतिम वर्ष की परीक्षा की तैयारी में लगा रहता है,तो उसके पिता उसकी परीक्षा क...
10/01/2025

एक बहुत ही बड़े उद्योगपति का पुत्र कॉलेज में अंतिम वर्ष की परीक्षा की तैयारी में लगा रहता है,तो उसके पिता उसकी परीक्षा के विषय में पूछते है तो वो जवाब में कहता है कि हो सकता है कॉलेज में अव्वल आऊँ,
अगर मै अव्वल आया तो मुझे वो महंगी वाली कार ला कर दोगे जो मुझे बहुत पसन्द है..
तो पिता खुश होकर कहते हैं क्यों नहीं अवश्य ला दूंगा.
ये तो उनके लिए आसान था. उनके पास पैसो की कोई कमी नहीं थी।
जब पुत्र ने सुना तो वो दो गुने उत्साह से पढाई में लग गया। रोज कॉलेज आते जाते वो शो रुम में रखी कार को निहारता और मन ही मन कल्पना करता की वह अपनी मनपसंद कार चला रहा है।

दिन बीतते गए और परीक्षा खत्म हुई। परिणाम आया वो कॉलेज में अव्वल आया उसने कॉलेज से ही पिता को फोन लगाकर बताया की वे उसका इनाम कार तैयार रखे मै घर आ रहा हूं।

घर आते आते वो ख्यालो में गाडी को घर के आँगन में खड़ा देख रहा था। जैसे ही घर पंहुचा उसे वहाँ कोई कार नही दिखी.

वो बुझे मन से पिता के कमरे में दाखिल हुआ.
उसे देखते ही पिता ने गले लगाकर बधाई दी और उसके हाथ में कागज में लिपटी एक वस्तु थमाई और कहा लो यह तुम्हारा गिफ्ट।

पुत्र ने बहुत ही अनमने दिल से गिफ्ट हाथ में लिया और अपने कमरे में चला गया। मन ही मन पिता को कोसते हुए उसने कागज खोल कर देखा उसमे सोने के कवर में रामायण दिखी ये देखकर अपने पिता पर बहुत गुस्सा आया..

लेकिन उसने अपने गुस्से को संयमित कर एक चिठ्ठी अपने पिता के नाम लिखी की पिता जी आपने मेरी कार गिफ्ट न देकर ये रामायण दी शायद इसके पीछे आपका कोई अच्छा राज छिपा होगा.. लेकिन मै यह घर छोड़ कर जा रहा हु और तब तक वापस नही आऊंगा जब तक मै बहुत पैसा ना कमा लू और चिठ्ठी रामायण के साथ पिता के कमरे में रख कर घर छोड कर चला गया।
समय बीतता गया..

पुत्र होशियार था होनहार था जल्दी ही बहुत धनवान बन गया. शादी की और शान से अपना जीवन जीने लगा कभी कभी उसे अपने पिता की याद आ जाती तो उसकी चाहत पर पिता से गिफ्ट ना पाने की खीज हावी हो जाती, वो सोचता माँ के जाने के बाद मेरे सिवा उनका कौन था इतना पैसा रहने के बाद भी मेरी छोटी सी इच्छा भी पूरी नहीं की.

यह सोचकर वो पिता से मिलने से कतराता था।

एक दिन उसे अपने पिता की बहुत याद आने लगी.
उसने सोचा क्या छोटी सी बात को लेकर अपने पिता से नाराज हुआ अच्छा नहीं हुआ.
ये सोचकर उसने पिता को फोन लगाया बहुत दिनों बाद पिता से बात कर रहा हूँ .
ये सोच धड़कते दिल से रिसीवर थामे खड़ा रहा.
तभी सामने से पिता के नौकर ने फ़ोन उठाया और उसे बताया की मालिक तो दस दिन पहले स्वर्ग सिधार गए और अंत तक तुम्हे याद करते रहे और रोते हुए चल बसे.
जाते जाते कह गए की मेरे बेटे का फोन आया तो उसे कहना की आकर अपना व्यवसाय सम्भाल ले.
तुम्हारा कोई पता नही होनेे से तुम्हे सूचना नहीं दे पाये।

यह जानकर पुत्र को गहरा दुःख हुआ और दुखी मन से अपने पिता के घर रवाना हुआ.

घर पहुच कर पिता के कमरे जाकर उनकी तस्वीर के सामने रोते हुए रुंधे गले से उसने पिता का दिया हुआ गिफ्ट रामायण को उठाकर माथे पर लगाया और उसे खोलकर देखा.

पहले पन्ने पर पिता द्वारा लिखे वाक्य पढ़ा जिसमे लिखा था "मेरे प्यारे पुत्र, तुम दिन दुनी रात चौगुनी तरक्की करो और साथ ही साथ मै तुम्हे कुछ अच्छे संस्कार दे पाऊं.. ये सोचकर ये रामायण दे रहा हूँ ",

पढ़ते वक्त उस रामायण से एक लिफाफा सरक कर नीचे गिरा जिसमे उसी गाड़ी की चाबी और नगद भुगतान वाला बिल रखा हुआ था।
ये देखकर उस पुत्र को बहुत दुख हुआ और धड़ाम से जमींन पर गिर रोने लगा।

हम हमारा मनचाहा उपहार हमारी पैकिंग में ना पाकर उसे अनजाने में खो देते है।

ईश्वर भी हमे अपार गिफ्ट देते है, लेकिन हम अज्ञानी हमारे मन पसन्द पैकिंग में ना देखकर, गिफ्ट पा कर भी उसे खो देते है।

हमे अपने माता पिता के प्रेम से दिये ऐसेे अन गिनत उपहारों का प्रेम से सम्मान करना चाहिए और उनका धन्यवाद करना चाहिए।
सादर जय सिया राम 🙏

पुराने जमाने में एक राजा हुए थे, भर्तृहरि। वे कवि भी थे।उनकी पत्नी अत्यंत रूपवती थीं। भर्तृहरि ने स्त्री केसौंदर्य और उस...
05/01/2025

पुराने जमाने में एक राजा हुए थे, भर्तृहरि। वे कवि भी थे।

उनकी पत्नी अत्यंत रूपवती थीं। भर्तृहरि ने स्त्री के

सौंदर्य और उसके बिना जीवन के सूनेपन पर 100 श्लोक

लिखे, जो श्रृंगार शतक के नाम से प्रसिद्ध हैं।

उन्हीं के राज्य में एक ब्राह्मण भी रहता था, जिसने

अपनी नि:स्वार्थ पूजा से देवता को प्रसन्न कर लिया।

देवता ने उसे वरदान के रूप में अमर फल देते हुए

कहा कि इससे आप लंबे समय तक युवा रहोगे।

ब्राह्मण ने सोचा कि भिक्षा मांग कर जीवन बिताता हूं,

मुझे लंबे समय तक जी कर क्या करना है।

हमारा राजा बहुत अच्छा है, उसे यह फल दे देता हूं। वह लंबे

समय तक जीएगा तो प्रजा भी लंबे समय तक सुखी रहेगी।

वह राजा के पास गया और उनसे सारी बात बताते हुए वह

फल उन्हें दे आया।

राजा फल पाकर प्रसन्न हो गया। फिर मन ही मन

सोचा कि यह फल मैं अपनी पत्नी को दे देता हूं। वह

ज्यादा दिन युवा रहेगी तो ज्यादा दिनों तक उसके

साहचर्य का लाभ मिलेगा। अगर मैंने फल खाया तो वह

मुझ से पहले ही मर जाएगी और उसके वियोग में मैं

भी नहीं जी सकूंगा। उसने वह फल अपनी पत्नी को दे

दिया।

लेकिन, रानी तो नगर के कोतवाल से प्यार करती थी। वह

अत्यंत सुदर्शन, हृष्ट-पुष्ट और बातूनी था। अमर फल

उसको देते हुए रानी ने कहा कि इसे खा लेना, इससे तुम

लंबी आयु प्राप्त करोगे और मुझे सदा प्रसन्न करते रहोगे।

फल ले कर कोतवाल जब महल से बाहर निकला तो सोचने

लगा कि रानी के साथ तो मुझे धन-दौलत के लिए झूठ-मूठ

ही प्रेम का नाटक करना पड़ता है। और यह फल खाकर मैं

भी क्या करूंगा। इसे मैं अपनी परम मित्र राज

नर्तकी को दे देता हूं। वह कभी मेरी कोई बात

नहीं टालती। मैं उससे प्रेम भी करता हूं। और यदि वह

सदा युवा रहेगी, तो दूसरों को भी सुख दे पाएगी। उसने वह

फल अपनी उस नर्तकी मित्र को दे दिया।

राज नर्तकी ने कोई उत्तर नहीं दिया और चुपचाप वह अमर

फल अपने पास रख लिया। कोतवाल के जाने के बाद उसने

सोचा कि कौन मूर्ख यह पाप भरा जीवन

लंबा जीना चाहेगा। हमारे देश का राजा बहुत अच्छा है,

उसे ही लंबा जीवन जीना चाहिए। यह सोच कर उसने

किसी प्रकार से राजा से मिलने का समय लिया और एकांत

में उस फल की महिमा सुना कर उसे राजा को दे दिया। और

कहा कि महाराज, आप इसे खा लेना।

राजा फल को देखते ही पहचान गया और भौंचक रह गया।

पूछताछ करने से जब पूरी बात मालूम हुई, तो उसे वैराग्य

हो गया और वह राज-पाट छोड़ कर जंगल में चला गया।

वहीं उसने वैराग्य पर 100 श्लोक लिखे जो कि वैराग्य

शतक के नाम से प्रसिद्ध हैं। यही इस संसार

की वास्तविकता है। एक व्यक्ति किसी अन्य से प्रेम

करता है और चाहता है कि वह व्यक्ति भी उसे

उतना ही प्रेम करे। परंतु विडंबना यह कि वह

दूसरा व्यक्ति किसी अन्य से प्रेम करता है।

इसका कारण यह है कि संसार व इसके सभी प्राणी अपूर्ण

हैं। सब में कुछ न कुछ कमी है। सिर्फ एक ईश्वर पूर्ण है। एक

वही है जो हर जीव से उतना ही प्रेम करता है,

जितना जीव उससे करता है। बस हमीं उसे सच्चा प्रेम नहीं करते। जय श्री राम !! हरे कृष्ण !! सादर जय सिया राम!!🙏😇🚩

01/01/2025

परम पूज्य देवराहा बाबा जी

ब्रह्म ऋषि योगिराज श्री देवराहा बाबा भारत के इतिहास के सबसे महान योगियों में से एक हैं। बाबा वैष्णववाद के संस्थापक श्री रामानुजाचार्य के वंश में ग्यारहवें हैं।
कहते हैं कि जल से उनका जन्म हुआ था। कहा जाता है कि वे महाभारत काल में भी विद्यमान थे। उन्होंने हजारों वर्षों तक हिमालय में गुप्त रूप से रह कर तपस्या की थी। वे कौन थे, कहां से आए यह कोई नहीं जानता। लोगों ने उनका नाम देवराहा बाबा रख दिया। कारण, वे उत्तर प्रदेश के देवरिया में सरयू नदी के किनारे एक मचान पर काफी दिनों तक रहे थे।

देवरहा बाबा का जन्म अज्ञात हैं. यहाँ तक कि उनकी सही उम्र का आकलन भी नहीं है. वह यूपी के देवरिया जिले के रहने वाले थे. मंगलवार, 19 जून सन् 1990 को योगिनी एकादशी के दिन अपना प्राण त्यागने वाले इस बाबा जन्म के बारे में संशय है. कहा जाता है कि वह करीब 900 साल तक जिन्दा थे. (बाबा के संपूर्ण जीवन के बारे में अलग-अलग मत है, कुछ लोग उनका जीवन 250 साल तो कुछ लोग 500 साल मानते हैं.) श्रद्धालुओं के कथनानुसार बाबा अपने पास आने वाले प्रत्येक व्यक्ति से बड़े प्रेम से मिलते थे और सबको कुछ न कुछ प्रसाद अवश्य देते थे. प्रसाद देने के लिए बाबा अपना हाथ ऐसे ही मचान के खाली भाग में रखते थे और उनके हाथ में फल, मेवे या कुछ अन्य खाद्य पदार्थ आ जाते थे जबकि मचान पर ऐसी कोई भी वस्तु नहीं रहती थी. श्रद्धालुओं को कौतुहल होता था कि आखिर यह प्रसाद बाबा के हाथ में कहाँ से और कैसे आता है. जनश्रुति के मुताबिक, वह खेचरी मुद्रा की वजह से आवागमन से कहीं भी कभी भी चले जाते थे. उनके आस-पास उगने वाले बबूल के पेड़ों में कांटे नहीं होते थे. चारों तरफ सुंगध ही सुंगध होता था. लोगों में विश्वास है कि बाबा जल पर चलते भी थे और अपने किसी भी गंतव्य स्थान पर जाने के लिए उन्होंने कभी भी सवारी नहीं की और ना ही उन्हें कभी किसी सवारी से कहीं जाते हुए देखा गया। पूरे जीवन निर्वस्त्र रहने वाले बाबा हमेशा अपने मचान में रहते थे। नीचे वे सिर्फ स्नान करने आते थे। वे भगवान राम का अनन्य भक्त थे। भक्तों को वे हमेशा राम मंत्र की दीक्षा दिया करते थे। कहते थे...

एक लकड़ी ह्रदय को मानो दूसर राम नाम पहिचानो
राम नाम नित उर पे मारो ब्रह्म दिखे संशय न जानो।

देवरहा बाबा जनसेवा तथा गोसेवा को सर्वोपरि धर्म मानते थे तथा प्रत्येक दर्शनार्थी को लोगों की सेवा, गोमाता की रक्षा करने तथा भगवान की भक्ति में रत रहने की प्रेरणा देते थे। देवरहा बाबा श्री राम और श्री कृष्ण को एक मानते थे और भक्तों को कष्ट से मुक्ति के लिए कृष्ण मंत्र भी देते थे।

ऊं कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने
प्रणत: क्लेश नाशाय, गोविन्दाय नमो-नम:।

पूज्य बाबा ने योग विद्या के जिज्ञासुओं को हठयोग की दसों मुद्राओं का प्रशिक्षण दिया। वे ध्यान योग, नाद योग, लय योग, प्राणायाम, त्राटक, ध्यान, धारणा, समाधि आदि की साधन पद्धतियों का जब विवेचन करते तो बड़े बड़े धर्माचार्य उनके योग सम्बंधी ज्ञान के समक्ष नतमस्तक हो जाते थे। बाबा ने भगवान श्रीकृष्ण की लीला भूमि वृन्दावन में यमुना तट पर स्थित मचान पर चार वर्ष तक साधना की। उन्होंने पूरे जीवन कुछ नहीं खाया। सिर्फ दूध और शहद पीकर जीते थे। श्रीफल का रस उन्हें बहुत पसंद था। श्रद्धालुओं के अुसार बाबा अपने पास आने वाले प्रत्येक व्यक्ति से बड़े प्रेम से मिलते थे और सबको कुछ न कुछ प्रसाद अवश्य देते थे। प्रसाद देने के लिए बाबा अपना हाथ ऐसे ही मचान के खाली भाग में रखते थे और उनके हाथ में फल, मेवे या कुछ अन्य खाद्य पदार्थ आ जाते थे जबकि मचान पर ऐसी कोई भी वस्तु नहीं रहती थी। श्रद्धालुओं को कौतुहल होता था कि आखिर यह प्रसाद बाबा के हाथ में कहाँ से और कैसे आता है। खेचरी मुद्रा की सिद्धि के कारण वे कहीं भी चले जाते। कई लोगों ने उन्हें पानी पर चलते हुए भी देखा था। उनकी मचान के पास उगने वाले बबूल के पेड़ों में कांटे नहीं होते थे। चारों तरफ सुंगध ही सुंगध होती थी। उन्होंने कभी कोई सवारी नहीं ली।

लोगों का मानना है कि बाबा को सब पता रहता था कि कब, कौन, कहाँ उनके बारे में चर्चा हुई। वह अवतारी व्यक्ति थे। उनका जीवन बहुत सरल और सौम्य था। वह फोटो, कैमरे और टीवी जैसी चीजों को देख अचंभित रह जाते थे। वह उनसे अपनी फोटो लेने के लिए कहते थे,
लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि उनका फोटो नहीं बनता था। वह नहीं चाहते तो रिवाल्वर से गोली नहीं चलती थी। उनका निर्जीव वस्तुओं पर नियंत्रण था।
हर साल कुंभ के समय प्रयाग आते थे. यमुना के किनारे वृन्दावन में वह 30 मिनट तक पानी में बिना सांस लिए रह सकते थे. उनको जानवरों की भाषा समझ में आती थी. खतरनाक जंगली जानवारों को वह पल भर में काबू कर लेते थे। अपनी उम्र, कठिन तप और सिद्धियों के बारे में देवरहा बाबा ने कभी भी कोई चमत्कारिक दावा नहीं किया, लेकिन उनके इर्द-गिर्द हर तरह के लोगों की भीड़ ऐसी भी रही जो हमेशा उनमें चमत्कार खोजते देखी गई. अत्यंत सहज, सरल और सुलभ बाबा के सानिध्य में जैसे वृक्ष, वनस्पति भी अपने को आश्वस्त अनुभव करते रहे. भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने उन्हें अपने बचपन में देखा था. देश-दुनिया के महान लोग उनसे मिलने आते थे और विख्यात साधू-संतों का भी उनके आश्रम में समागम होता रहता था. उनसे जुड़ीं कई घटनाएं इस सिद्ध संत को मानवता, ज्ञान, तप और योग के लिए विख्यात बनाती हैं.
बाबा की शरण में आने वाले कई विशिष्ट लोग थे. उनके भक्तों में जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी जैसे चर्चि नेताओं के नाम हैं. उनके पास लोग हठयोग सीखने भी जाते थे. सुपात्र देखकर वह हठयोग की दसों मुद्राएं सिखाते थे. योग विद्या पर उनका गहन ज्ञान था. ध्यान, योग, प्राणायाम, त्राटक समाध आदि पर वह गूढ़ विवेचन करते थे. कई बड़े सिद्ध सम्मेलनों में उन्हें बुलाया जाता, तो वह संबंधित विषयों पर अपनी प्रतिभा से सबको चकित कर देते. लोग यही सोचते कि इस बाबा ने इतना सब कब और कैसे जान लिया. ध्यान, प्रणायाम, समाधि की पद्धतियों के वह सिद्ध थे ही. धर्माचार्य, पंडित, तत्वज्ञानी, वेदांती उनसे कई तरह के संवाद करते थे. उन्होंने जीवन में लंबी लंबी साधनाएं कीं. जन कल्याण के लिए वृक्षों-वनस्पतियों के संरक्षण, पर्यावरण एवं वन्य जीवन के प्रति उनका अनुराग जग जाहिर था.

देश में आपातकाल के बाद हुए चुनावों में जब इंदिरा गांधी हार गईं तो वह भी देवरहा बाबा से आशीर्वाद लेने गईं. उन्होंने अपने हाथ के पंजे से उन्हें आशीर्वाद दिया. वहां से वापस आने के बाद इंदिरा ने कांग्रेस का चुनाव चिह्न हाथ का पंजा निर्धारित कर दिया. इसके बाद 1980 में इंदिरा के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने प्रचंड बहुमत प्राप्त किया और वह देश की प्रधानमंत्री बनीं. वहीं, यह भी मान्यता है कि इन्दिरा गांधी आपातकाल के समय कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य स्वामी चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती से आर्शीवाद लेने गयीं थी. वहां उन्होंने अपना दाहिना हाथ उठाकर आर्शीवाद दिया और हाथ का पंजा पार्टी का चुनाव निशान बनाने को कहा।
बाबा महान योगी और सिद्ध संत थे. उनके चमत्कार हज़ारों लोगों को झंकृत करते रहे. आशीर्वाद देने का उनका ढंग निराला था. मचान पर बैठे-बैठे ही अपना पैर जिसके सिर पर रख दिया, वो धन्य हो गया. पेड़-पौधे भी उनसे बात करते थे. उनके आश्रम में बबूल तो थे, मगर कांटेविहीन. यही नहीं यह खुशबू भी बिखेरते थे.

उनके दर्शनों को प्रतिदिन विशाल जनसमूह उमड़ता था. बाबा भक्तों के मन की बात भी बिना बताए जान लेते थे. उन्होंने पूरा जीवन अन्न नहीं खाया. दूध व शहद पीकर जीवन गुजार दिया. श्रीफल का रस उन्हें बहुत पसंद था.

देवरहा बाबा को खेचरी मुद्रा पर सिद्धि थी जिस कारण वे अपनी भूख और आयु पर नियंत्रण प्राप्त कर लेते थे.

ख्याति इतनी कि जार्ज पंचम जब भारत आया तो अपने पूरे लाव लश्कर के साथ उनके दर्शन करने देवरिया जिले के दियारा इलाके में मइल गांव तक उनके आश्रम तक पहुंच गया. दरअसल, इंग्लैंड से रवाना होते समय उसने अपने भाई से पूछा था कि क्या वास्तव इंडिया के साधु संत महान होते हैं. प्रिंस फिलिप ने जवाब दिया- हां, कम से कम देवरहा बाबा से जरूर मिलना. यह सन 1911 की बात है. जार्ज पंचम की यह यात्रा तब विश्वयुद्ध के मंडरा रहे माहौल के चलते भारत के लोगों को बरतानिया हुकूमत के पक्ष में करने की थी. उससे हुई बातचीत बाबा ने अपने कुछ शिष्यों को बतायी भी थी, लेकिन कोई भी उस बारे में बातचीत करने को तैयार नही हुआ आजतक।
डाक्टर राजेंद्र प्रसाद तब रहे होंगे कोई दो-तीन साल के, जब अपने माता-पिता के साथ वे बाबा के यहां गये थे. बाबा देखते ही बोल पड़े- -यह बच्चा तो राजा बनेगा. बाद में राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने बाबा को एक पत्र लिखकर कृतज्ञता प्रकट की और सन 54 के प्रयाग कुंभ में बाकायदा बाबा का सार्वजनिक पूजन भी किया.

उनके भक्त उन्हें दया का महासमुंदर बताते हैं. और अपनी यह सम्पत्तिबाबा ने मुक्तहस्तज लुटाई. जो भी आया, बाबा की भरपूर दया लेकर गया. वितरण में कोई विभेद नहीं. वर्षाजल की भांति बाबा का आशीर्वाद सब पर बरसा और खूब बरसा. मान्यता थी कि बाबा का आशीर्वाद हर मर्ज की दवाई है. कहा जाता है कि बाबा देखते ही समझ जाते थे कि सामने वाले का सवाल क्या है.. दिव्यदृष्ठि के साथ तेज नजर, कड़क आवाज, दिल खोल कर हंसना, खूब बतियाना बाबा की आदत थी. याददाश्त इतनी कि दशकों बाद भी मिले व्यक्ति को पहचान लेते और उसके दादा- परदादा तक का नाम व इतिहास तक बता देते, किसी तेज कम्प्युटर की तरह.

हां, बलिष्ठ कदकाठी भी थी. लेकिन देह त्याहगने के समय तक वे कमर से आधा झुक कर चलने लगे थे. उनका पूरा जीवन मचान में हमें ही बीता. लकडी के चार खंभों पर टिकी मचान ही उनका महल था, जहां नीचे से ही लोग उनके दर्शन करते थे.

मईल में वो साल में आठ महीना बिताते थे. कुछ दिन बनारस के रामनगर में गंगा के बीच, माघ में प्रयाग, फागुन में मथुरा के मठ के अलावा वे कुछ समय हिमालय में एकांतवास भी करते थे. खुद कभी कुछ नहीं खाया, लेकिन भक्तनगण जो कुछ भी लेकर पहुंचे, उसे भक्तों पर ही बरसा दिया. उनका बताशा-मखाना हासिल करने के लिए सैकडों लोगों की भीड हर जगह जुटती थी. और फिर अचानक ११ जून १९९० को उन्होंने दर्शन देना बंद कर दिया. लगा जैसे कुछ अनहोनी होने वाली है. मौसम तक का मिजाज बदल गया. यमुना की लहरें तक बेचैन होने लगीं. मचान पर बाबा त्रिबंध सिद्धासन पर बैठे ही रहे. डॉक्टरों की टीम ने थर्मामीटर पर देखा कि पारा अंतिम सीमा को तोड निकलने पर आमादा है. १९ तारीख को मंगलवार के दिन योगिनी एकादशी थी. आकाश में काले बादल छा गये, तेज आंधियां तूफान ले आयीं. यमुना जैसे समुंदर को मात करने पर उतावली थी. लहरों का उछाल बाबा की मचान तक पहुंचने लगा. और इन्हीं सबके बीच शाम चार बजे बाबा का शरीर स्पंदनरहित हो गया. भक्तों की अपार भीड भी प्रकृति के साथ हाहाकार करने लगी.

जय हो देवरहवा बाबा🙏

गरुड़ पुराण के अनुसार, शरीर के नौ अंगों से प्राणों का निकलना होता है, पापी मनुष्य कैसे त्याग करता है प्राण 🧵गरुड़ पुराण ...
28/12/2024

गरुड़ पुराण के अनुसार, शरीर के नौ अंगों से प्राणों का निकलना होता है, पापी मनुष्य कैसे त्याग करता है प्राण 🧵

गरुड़ पुराण में बताया गया है कि शरीर के नौ द्वार होते हैं जिससे शरीर से प्राण बाहर निकलता है
यह व्यक्ति के स्वभाव और कर्मों पर निर्भर करता है कि उसकी आत्मा किस अंग से निकलती है। जानिए, किस स्वभाव के व्यक्ति के किस अंग से प्राण निकलते हैं!
गरुड़ पुराण: हिंदू धर्म में अनेक महत्त्वपूर्ण पुराण हैं, जो विभिन्न विषयों की व्याख्या करते हैं। गरुड़ पुराण मृत्यु और आत्मा से जुड़े गूढ़ रहस्यों को उजागर करता है। इसमें भगवान विष्णु और उनके भक्त गरुड़ के बीच संवाद का वर्णन है। इसी संवाद में यह बताया गया है कि जब किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है, तो उसके प्राण शरीर के किस अंग से निकलते हैं और वह अंग उस व्यक्ति के स्वभाव के अनुसार कैसे निर्धारित होता है।

पापी व्यक्ति एवं दुराचारी इस तरह त्यागते हैं प्राण,
आपने अक्सर देखा होगा कि किसी व्यक्ति की मृत्यु के समय उसका मुख या आंखें खुली रह जाती हैं। इसका कारण यह है कि उसके प्राण मुख या आंखों के माध्यम से निकले होते हैं। लेकिन हिंदू धर्म के अनुसार, प्राण निकलने का मार्ग केवल मुख ही नहीं है। शरीर के कई अन्य अंग या द्वार भी प्राणों के निकलने के मार्ग हो सकते हैं। यह मार्ग व्यक्ति के स्वभाव और उसके कर्मों के आधार पर निर्धारित होता है।
गरुड़ पुराण में बताया गया है कि शरीर के नौ द्वार होते हैं जिससे शरीर से प्राण बाहर निकलता है। ये द्वार हैं - दोनों आंखें, दोनों कान, मुख, दोनों नासिकाएं और शरीर के दोनों उत्सर्जन अंग। इनमें से किसी एक द्वारा से ही मृत्यु के दौरान व्यक्ति के प्राण निकलते हैं।
पुराण के अनुसार, जो व्यक्ति अपने जीवन को पूरी निष्ठा से कर्तव्यों का पालन करते हुए या भगवान की भक्ति में लीन होकर व्यतीत करता है, उसके प्राण नाक के माध्यम से निकलते हैं। नाक से प्राणों का निकलना अत्यंत शुभ माना जाता है, क्योंकि यह केवल सदाचारी और पुण्यात्मा व्यक्तियों के साथ ही होता है। वहीं, जो व्यक्ति अपने पूरे जीवन को धर्म के मार्ग पर चलकर व्यतीत करता है, उसके प्राण मुख से निकलते हैं। मुख से प्राणों का निकलना भी एक शुभ और उत्तम आत्मा का प्रतीक माना जाता है।

जो व्यक्ति जीवन के प्रति अत्यधिक मोहग्रस्त हो, जिसे जीने की प्रबल इच्छा हो, और जिसे अपने परिवार से गहरा लगाव हो, ऐसे व्यक्ति के प्राण आंखों के माध्यम से निकलते हैं।
यही कारण है कि ऐसे लोगों की मृत्यु के समय उनकी आंखें खुली रह जाती हैं। ऐसे लोग मोह के कारण अपने प्राण त्यागना नहीं चाहते, लेकिन यमराज बलपूर्वक उनके प्राण हर लेते हैं। इसी वजह से कई बार इन व्यक्तियों की आंखें उलट जाती हैं।
जो व्यक्ति स्वार्थी हो, जिसने जीवनभर केवल अपने और अपने परिवार के हित के बारे में ही सोचा हो, अपना अधिकांश समय धन-संपत्ति कमाने में लगाया हो, जनकल्याण के कार्यों से दूर रहा हो और जिसने अपने जीवन में कामवासना को प्राथमिकता दी हो, ऐसे लोग मृत्यु के समय यमदूतों को देखकर भयभीत हो जाते हैं। इस घबराहट के कारण उनके प्राण नीचे की ओर सरक जाते हैं। इसी कारण उनके प्राण शरीर के निचले उत्सर्जन अंगों, अर्थात मल द्वार और मूत्र द्वार से निकलते हैं। ऐसे लोग मृत्यु के समय मल-मूत्र का त्याग भी कर देते हैं। गरुड़ पुराण के अनुसार, यमदूत ऐसे पापी व्यक्तियों की आत्माओं के गले में पाश बांधकर उन्हें यमलोक ले जाते हैं।
अधिक लोगों की मृत्यु जननेंद्रिय से होती है, क्योंकि अधिक लोग जीवन में जननेंद्रिय के आसपास ही भटकते रहते हैं, उसके ऊपर नहीं जा पाते।

आपकी जिंदगी जिस इंद्रिय के पास जीयी गई है, उसी इंद्रिय से मौत होगी। औपचारिक रूप से हम मृतक को जब मरघट ले जाते हैं तो उसकी कपाल—क्रिया करते हैं, उसका सिर तोड़ते हैं। वह सिर्फ प्रतीक है। पर समाधिस्थ व्यक्ति की मृत्यु उस तरह होती है। समाधिस्थ व्यक्ति की मृत्यु सहस्रार से होती है।

जननेंद्रिय सबसे नीचा द्वार है। जैसे कोई अपने घर की नाली में से प्रवेश करके बाहर निकले। सहस्रार, जो तुम्हारे मस्तिष्क में है द्वार, वह श्रेष्ठतम द्वार है।

जननेंद्रिय पृथ्वी से जोड़ती है, सहस्रार आकाश से। जननेंद्रिय देह से जोड़ती है, सहस्रार आत्मा से। जो लोग समाधिस्थ हो गए हैं, जिन्होंने ध्यान को अनुभव किया है, जो बुद्धत्व को उपलब्ध हुए हैं, उनकी मृत्यु सहस्रार से होती है।उस प्रतीक में हम अभी भी कपाल क्रिया करते हैं।

यह दरवाजा मरने के बाद नहीं खोला जाता, यह दरवाजा जिंदगी में खोलना पड़ता है। इसी दरवाजे की तलाश में सारे योग, तंत्र की विद्याओं का जन्म हुआ। इसी दरवाजे को खोलने की कुंजियां हैं योग में, तंत्र में।

इसी दरवाजे को जिसने खोल लिया, वह परमात्मा को जानकर मरता है। उसकी मृत्यु समाधि हो जाती है।

प्रत्येक व्यक्ति उस इंद्रिय से मरता है, जिस इंद्रिय के पास जीया। जो लोग रूप के दीवाने हैं, वे आंख से मरेंगे; इसलिए चित्रकार, मूर्तिकार आंख से मरते हैं। उनकी आंख खुली रह जाती है। जिंदगी—भर उन्होंने रूप और रंग में ही अपने को तलाशा, अपनी खोज की। संगीतज्ञ कान से मरते हैं, उसके बाद दृष्टिऔर फिरश्रवण इन्द्रिय मन में विलीन हो जाती हैं । उस समय वह न देख पाता है, न बोल पाता है और न ही सुन पाता है ।

उसके बाद मन इन इंद्रियों के साथ प्राण में विलीन हो जाता है उस समय सोचने समझने की शक्ति समाप्त हो जाती है, केवल श्वास-प्रश्वास चलती रहती है ।

इसके बाद सबके साथ प्राण सूक्ष्म शरीर मे प्रवेश करता है । फिर जीव सूक्ष्म रूप से पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु और आकाश (पञ्च तन्मात्राओं) का आश्रय लेकर हृदय देश से निकलने वाली 101 नाड़ियों में से किसी एक में प्रवेश करता है ।

हृदय देश से जो 101 नाड़ियां निकली हुई है, मृत्यु के समय जीव इन्हीं में से किसी एक नाड़ी में प्रवेश कर देह-त्याग करता है । मोक्ष प्राप्त करने वाला जीव जिस नाड़ी में प्रवेश करता है, वह नाड़ी हृदय से मस्तिष्क तक फैली हुई है । जो मृत्यु के समय आवागमन से मुक्त नहीं हो रहे होते वे जीव किसी दूसरी नाड़ी में प्रवेश करते हैं ।

जीव जब तक नाड़ी में प्रवेश नही करता तब तक ज्ञानी और मूर्ख दोनों की एक गति एक ही तरह की होती है । नाड़ी में प्रवेश करने के बाद जीवन की अलग अलग गतियां होती हैं।

श्री आदि शंकराचार्य जी का कथन है कि 'जो लोग ब्रह्मविद्या की प्राप्ति करते हैं वो मृत्यु के बाद देह ग्रहण नही करते, बल्कि मृत्यु के बाद उनको मोक्ष प्राप्त हो जाता है' । श्री रामानुज स्वामी का कहना है 'ब्रह्मविद्या प्राप्त होने के बाद भी जीव जीव देवयान पथ पर गमन करने के बाद ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है, उसके बाद मुक्त हो जाता है

अंबेडकर क्या सच में इतना महान थे, जितना अम्बेडकर के बारे में बढ़ा चढ़ा कर बताया जाता है ?अम्बेडकर और उसका झूठा प्रचार बं...
20/12/2024

अंबेडकर क्या सच में इतना महान थे,
जितना अम्बेडकर के बारे में बढ़ा चढ़ा कर बताया जाता है ?

अम्बेडकर और उसका झूठा प्रचार बंद होना चाहिए।
मैं कुछ मिथक रखता हूं अम्बेडकर से जुड़े हुए..

1-मिथक-अंबेडकर बहुत मेधावी थे।

सच्चाई -अंबेडकर पूरी जिंदगी में सदैव थर्ड डिग्री में पास हुए ।

2-मिथक -अंबेडकर बहुत गरीब थे!

सच्चाई -जिस जमाने में लोग फोटो नहीं खींचा पाते थे उस जमाने में अंबेडकर की बचपन की बहुत सी फोटो है वह भी कोट पैंट में!

3-मिथक- अंबेडकर ने शूद्रों को पढ़ने का अधिकार दिया !

सच्चाई -अंबेडकर के पिता जी खुद उस ज़माने में आर्मी में सूबेदार मेजर थे!

4-मिथक- अंबेडकर को पढ़ने नहीं दिया गया।

सच्चाई -उस जमाने में अंबेडकर को गुजरात बढ़ोदरा के क्षत्रिय राजा सीयाजी गायकवाड़ ने स्कॉलरशिप दी और विदेश पढ़ने तक भेजा और ब्राह्मण गुरु जी ने अपना नाम अंबेडकर दिया।

5-मिथक- अंबेडकर ने नारियों को पढ़ने का अधिकार दिया!

सच्चाई- अंबेडकर के समय ही 20 पढ़ी लिखी औरतों ने संविधान लिखने में महत्वपूर्ण योगदान दिया!

6- मिथक-अंबेडकर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे!

सच्चाई -अंबेडकर ने सदैव अंग्रेजों का साथ दिया भारत छोड़ो आंदोलन की जम कर खिलाफत की अंग्रेजो को पत्र लिखकर बोला कि आप और दिन तक देश में राज करिए उन्होंने जीवन भर हर जगह आजादी की लड़ाई का विरोध किया

7-मिथक -अम्बेडकर बड़े शक्तिशाली थे!

सच्चाई- 1946 के चुनाव में पूरे भारत भर में अंबेडकर की पार्टी की जमानत जप्त हुई थी

8- मिथक-अंबेडकर ने अकेले आरक्षण दिया!

सच्चाई- आरक्षण संविधान सभा ने दिया जिसमे कुल 389 लोग थे अंबेडकर का उसमें सिर्फ एक वोट था आरक्षण सब के वोट से दिया गया था

9-मिथक-अंबेडकर बहुत विद्वान थे।

सच्चाई-अंबेडकर संविधान के प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे।
स्थाई समीति के अध्यक्ष परम् विद्वान डाक्टर राजेंद्र प्रसाद जी थे।

10-मिथक-अंबेडकर राष्ट्रवादी थे।

सच्चाई-1931मे गोलमेज सम्मेलन में गांधी जी से भारत के टुकड़े करने की बात कर दलितों के लिए अलग दलिस्तान की मांग की थी।

11-मिथक-अंबेडकर ने भारत का संविधान लिखा।

सच्चाई-जो संविधान अंग्रेजों के1935 के मैग्नाकार्टा से लिया गया हो और विश्व के 12 देशों से चुराया गया है ,
उसे आप मौलिक संविधान कैसें कह सकते है ?
अभी भी सोसायटी एक्ट में 1860 लिखा जाता है।

12-मिथक- आरक्षण को लेकर संविधान सभा के सभी सदस्य सहमत थे।

सच्चाई- इसी आरक्षण को लेकर सरदार पटेल से अंबेडकर की कहा सुनी हो गई थी। पटेल जी संविधान सभा की मीटिंग छोड़कर बाहर चले गये थे बाद में नेहरू के कहने पर पटेल जी वापस आये थे।
सरदार पटेल ने कहा कि जिस भारत को अखण्ड भारत बनाने के लिए भारतीय देशी राजाओं, महराजाओं, रियासतदारों, तालुकेदारों ने अपनी 546 रियासतों को भारत में विलय कर दिया जिसमें 513 रियासतें क्षत्रिय राजाओं की थी।इस आरक्षण के विष से भारत भविष्य में खण्डित होने के कगार पर पहुंच जाएगा।

13-मिथक-अंबेडकर स्वेदशी थे।

सच्चाई-देश के सभी नेताओं का तत्कालीन पहनावा भारतीय पोशाक धोती -कुर्ता, पैजामा-कुर्ता, सदरी व टोपी,पगड़ी, साफा, आदि हुआ करता था।गांधी जी ने विदेशी पहनावा व वस्तुओं की होली जलवाई थी।
यद्यपि कि नेहरू, गाधीं व अन्य नेता विदेशी विश्वविद्यालय व विदेशों में रहे भी थे फिर भी स्वदेशी आंदोलन से जुड़े रहे।अंबेडकर की कोई भी तस्वीर भारतीय पहनावा में नही है।अंबेडकर अंग्रेजिएत का हिमायती थे।

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