12/05/2026
भगवान शिव ने काशी क्यों बसाई.
*अविमुक्तं न जहामि कदाचिदपि सत्तम।
तस्मिन्मम स्थितिर्नित्यं क्षेत्राणामुत्तमं च तत् ॥*
(स्कंद पुराण, काशी खंड)
शिव स्वयं कहते हैं, मैं इस अविमुक्त क्षेत्र को कभी नहीं छोड़ता। यहाँ मेरा नित्य वास है। प्रश्न यह है, कैलाश के स्वामी को पृथ्वी पर एक नगरी क्यों चाहिए थी। उत्तर केवल भूगोल में नहीं, मनोविज्ञान, धर्म और मोक्ष के रहस्य में है।
1. कैलाश पर एक घर की चाह
कथा आरंभ होती है कैलाश से। शिव वैरागी, भस्म रमे, व्याघ्र चर्म पर बैठे। पार्वती राजकुमारी से तपस्विनी बनीं, फिर अर्धांगिनी।
विवाह के बाद एक दिन पार्वती ने धीरे से कहा, नाथ, हर स्त्री का एक घर होता है जहाँ वह दीप जलाती है, अन्न पकाती है, अतिथि को आसन देती है। आप तो आकाश हैं, पर मैं धरती की बेटी हूँ। मुझे एक ऐसा घर चाहिए जो मेरा भी हो, आपका भी हो।
शिव मुस्कुराए। उन्होंने कहा, मेरा घर तो श्मशान है, मेरा आभूषण सर्प है। पर तुम्हारी इच्छा मेरा धर्म है।
पार्वती की यह इच्छा कोई विलास नहीं थी। यह सृष्टि का संतुलन माँग रही थी। शिव यदि केवल कैलाश पर रहें, तो वे देवताओं के रहेंगे, मनुष्यों के नहीं। मनुष्य को ऐसा स्थान चाहिए जहाँ वह बिना हिमालय चढ़े शिव को छू सके।
शिव ने आँखें मूँदीं। त्रिकालदर्शी ने देखा, पृथ्वी पर एक बिंदु है जो प्रलय में भी नहीं डूबता।
2. अविमुक्त — जो कभी छूटता नहीं
पुराण कहते हैं, जब सृष्टि जलमग्न होती है, तब भी काशी सुरक्षित रहती है। शास्त्रों के अनुसार, जब प्रलय काल में पृथ्वी डूबने लगती है, तब महादेव काशी को अपने त्रिशूल की नोक पर उठा लेते हैं। सृष्टि का पुनरुद्धार होने पर इसे वापस पृथ्वी पर स्थापित कर दिया जाता है। इसी कारण इसे अविमुक्त क्षेत्र कहा जाता है।
अविमुक्त का अर्थ है, जो शिव से कभी वियुक्त न हो। यह केवल भौगोलिक ऊँचाई नहीं, चेतना की ऊँचाई है। शिव ने पार्वती से कहा, मैं तुम्हें महल नहीं दूँगा, मैं तुम्हें एक ऐसा क्षेत्र दूँगा जहाँ मृत्यु भी मुक्ति बन जाए।
उन्होंने त्रिशूल उठाया। उसके तीन शूल — सत्व, रज, तम — के बीच एक सूक्ष्म भूमि प्रकट हुई। वह न स्वर्ग थी, न पाताल। वह मध्य में थी, मनुष्य के हृदय जैसी। शिव ने उसे अपने त्रिशूल पर धारण किया और कहा, यही हमारा घर होगा।
3. ब्रह्महत्या और कपाल मोचन
काशी बसाने का दूसरा कारण शिव के अपने अतीत में छिपा है। कथा प्रसिद्ध है, ब्रह्मा के पाँच मुख थे। एक मुख अहंकार में शिव की निंदा कर बैठा। शिव ने कालभैरव रूप में उस पाँचवें सिर को काट दिया।
वेद कहता है, ब्राह्मण की हत्या महापाप है, ब्रह्मा की तो परम। वह कटा हुआ कपाल शिव के हाथ से चिपक गया। कपाल लेकर महादेव तीनों लोकों में भटके, लेकिन कहीं भी उन्हें शांति नहीं मिली।
वे जहाँ जाते,कपाल रक्त टपकाता रहता तीर्थों में स्नान किया, यज्ञ किए, पर वो पाप नहीं छूटा। अंततः वे एक अज्ञात वन में पहुँचे जहाँ गंगा की एक धारा आकाश से नहीं, पाताल से निकल रही थी। जैसे ही महादेव ने इस नगरी की सीमा में प्रवेश किया, ब्रह्मा जी का वह कपाल उनके हाथ से गिर गया और वे दोषमुक्त हो गए।
वही स्थान काशी था। शिव ने समझा, यह भूमि पाप को नहीं धोती, पाप को जला देती है। क्योंकि यहाँ मैं स्वयं अग्नि हूँ।
शिव ने घोषणा की, यह नगरी मेरा शरीर है और मैं यहाँ सदा निवास करूँगा।
4. विश्वकर्मा का शिल्प — सूक्ष्म को स्थूल बनाना
संकल्प हो गया, अब रूप चाहिए था। देवशिल्पी विश्वकर्मा को बुलाया गया। उन्होंने ही यहाँ दिव्य मंदिरों, मणिकर्णिका जैसे घाटों और सोने जैसी चमकती इमारतों का निर्माण किया।
विश्वकर्मा ने पहले गंगा को आमंत्रित किया। गंगा स्वर्ग से उतरीं, पर काशी में वे उत्तरवाहिनी हो गईं, दक्षिण से उत्तर की ओर बहीं। यह उल्टी धारा प्रतीक है, यहाँ समय उल्टा चलता है, मृत्यु जीवन की ओर लौटती है।
फिर उन्होंने मणिकर्णिका घाट बनाया। कथा है, पार्वती का कर्णफूल यहाँ गिरा था, शिव ने उसे खोजने के लिए काल को भी रोक दिया। इसलिए यहाँ दाह संस्कार रुकता नहीं, पर आत्मा रुकती नहीं।
नगरी इतनी सुंदर थी कि स्वयं देवताओं ने भी यहाँ निवास करने की इच्छा प्रकट की। इंद्र ने कहा, मुझे स्वर्ग नहीं, काशी का एक कोना दो। विष्णु ने बिंदु माधव रूप में वास किया।
5. पार्वती को मिला घर, जीव को मिला मोक्ष
शिव ने पार्वती से कहा, देखो, यह घर तुम्हारा है। यहाँ तुम अन्नपूर्णा बन कर सबको भोजन दोगी। मैं यहाँ विश्वनाथ बन कर सबको अभय दूँगा।
काशी को मोक्ष की नगरी कहा जाता है क्योंकि यहाँ मृत्यु दंड नहीं, दीक्षा है। शिव पुराण कहता है, काशी में प्राण छोड़ने वाले के कान में स्वयं शिव तारक मंत्र देते हैं — राम नाम। वह मंत्र सुनते ही जीव जन्म मरण के चक्र से छूट जाता है।
यह वरदान केवल मनुष्य को नहीं, पशु, पक्षी, चांडाल, पापी सबको है। क्योंकि काशी शिव का शरीर है, और शरीर में कोई भेद नहीं होता।
6. त्रिशूल पर टिकी नगरी का विज्ञान
लोग पूछते हैं, क्या सच में काशी त्रिशूल पर है। शास्त्र रूपक में बोलता है। त्रिशूल के तीन शूल तीन नाड़ियाँ हैं — इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना। काशी इन्हीं के संगम पर बसी है। गंगा इड़ा, यमुना पिंगला, सरस्वती सुषुम्ना। जहाँ तीनों मिलें, वहाँ कुंडलिनी जागती है।
भौगोलिक रूप से भी काशी एक ऊँचे कगार पर है, जो बाढ़ में भी नहीं डूबता। प्राचीन ग्रंथों में इसे वाराणसी कहा गया, वरणा और असी नदियों के बीच। यह प्राकृतिक त्रिशूल है।
इसीलिए कहा जाता है, प्रलय में भी काशी नहीं डूबती। क्योंकि चेतना का केंद्र कभी नष्ट नहीं होता।
7. आज काशी क्यों प्रासंगिक है
काशी केवल शहर नहीं, महादेव का साक्षात स्वरूप है। आज जब हम भागते हैं, काशी ठहरना सिखाती है। जब हम जोड़ते हैं, काशी छोड़ना सिखाती है।
यहाँ आ कर राजा हरिश्चंद्र डोम बने, तुलसी ने रामचरितमानस लिखा, कबीर ने कपड़ा बुना, रैदास ने जूते सिए। सबने एक ही बात कही, काशी में रहना मतलब शिव की गोद में रहना।
शिव ने काशी इसलिए बसाई क्योंकि पार्वती को घर चाहिए था, और जीव को माँ चाहिए थी। कैलाश दूर है, काशी पास है। कैलाश पर जाना पड़ता है, काशी बुला लेती है।
8. निष्कर्ष — घर का अर्थ
तो उत्तर सरल है। भगवान शिव ने काशी इसलिए बसाई —
अपनी अर्धांगिनी की इच्छा पूरी करने के लिए, गृहस्थ धर्म निभाने के लिए।
अपने ब्रह्महत्या दोष से मुक्त होने के लिए, क्योंकि केवल अविमुक्त क्षेत्र ही पाप को जला सकता था।
जीवों को मोक्ष देने के लिए, जहाँ मृत्यु भी मुक्ति बने।
सृष्टि को एक ऐसा केंद्र देने के लिए जो प्रलय में भी न छूटे, जो त्रिशूल पर टिका रहे।
शिव आज भी कहते हैं, अविमुक्तं न जहामि। मैं काशी नहीं छोड़ता। इसका अर्थ है, मैं तुम्हें नहीं छोड़ता। तुम जहाँ भी हो, यदि मन में काशी बसा लो — अर्थात् स्थिरता, करुणा, वैराग्य — तो शिव वहीं वास करते हैं।
काशी जाना तीर्थ है, काशी होना साधना है।
हर हर महादेव ....