14/09/2024
जीते जी जीवन आदमी भले ही कितने ही अच्छे कर्म करे मगर दुनिया तारीफ मरने के बाद करती है, खासकर बाहरवें तक परिवार, मित्र, पड़ोसी और रिश्तेदार प्रशंसा करते थकते नहीं है, जब परिवार के किसी बुजुर्ग का निधन हो जाता है, ये संसार का धारा है, मगर कोई जवान अचानक या घटना, दुर्घटना में असमय मृत्यु हो जाने पर सिर्फ एक बार रिस्तेदारो, विशेषकर कर खून के रिश्ते वालो का अवश्य इंतजार करते हैं, ताकि अंतिम दर्शन कर सके या अंतिम संस्कार में शामिल हो सके, परिवार को अथवा अन्य मानव स्वभाव अनुसार दुःख होता हैं, और प्रकट भी अपने अपने तरीके से करते हैं, कुछ दिल के मजबूत ग्रामीण होते हैं, हरी इच्छा प्रबल बोलकर ढाढस बंधाते है, कमजोर दिल रो पड़ते हैं, भूमि या अग्नि संस्कार रात्रि में लगभग नही करते हैं परंपरा अनुसार लेकिन सूर्यास्त समय मृत्यु होने पर रात्रि भर देह के पास बैठकर परिवार को संबल प्रदान करते हैं, अगली सुबह अंतिम संस्कार करते हैं, जो भी भूमि या अग्नि यदि बेंकूटी निकालते हैं तो खास रिश्तेदार परिवार, गांव मुखियो से पहले सलाह मशविरा जरूर करते हैं, अंतिम संस्कार के लिए बेकुंट धाम याने शमशान रवाना होते ही, कुछ खासकर जानकर लोग अन्य कार्यों में लग जाते हैं, ये एक लंबी परंपरा है, जिसका सामाजिक जीवन में सबको पालन करना होता है, फिर एक व्यक्ति के जाने से पूरा परिवार, पड़ोसी , रिश्तेदार भूखे, प्यासे नही रह सकते है साथ ही परिवार को भी ढांढस देना है , तो सब प्रक्रिया सुचारू संचालन करके, बीड़ी, डोडा, चाय, खाना सब विधि अनुसार शुरू हो जाता है, फिर पला, दरी डाल देते हैं, जो कि बाहरवें बाद उठाते हैं, अच्छी बात दुःख में सब शरीक होते हैं, शोक संतृप्त परिवार को संबल प्रदान करते हैं ताकि वो उनका दुःख भूल जाए, और उनको लगे की भाई, परिवार, रिश्तेदार सब साथ है मगर खराब बात बाल मौत पर भी एक तरफ रो रहे हैं तथा दूसरी तरफ सब कुछ चलता रहता है, हमारे शास्त्रों और सनातन धर्म में सिर्फ ये सेवा की अंतिम सेवा है, उस व्यक्ति के जीवन पर कैसी कमाई रही तय होता हैं, उनकी अंतिम यात्रा में कितने लोग शामिल हुए या परिवार से मिलने पहुंचे अथवा मरने के बाद लोग किस रूप में उनको याद करते हैं या खून के रिश्ते वालो ने आने वाले या मिलने वाले, बैठने आने वाले की क्या सेवा की या अन्य धार्मिक कर्म कांड कैसे निभाते हैं, वैसे अब थाली, परोसना, चाडिया वगैरा सब मृत्यु भोज बंद हो चुके हैं, लगभग वर्तमान में मर्जी से थोड़ा या ज्यादा उनके हिसाब से करते हैं, साधारण खाना, सादगी वाला करके उदारहण पेश करना चाहिए, लेकिन समय अभाव के कारण सभी परिजनों, पड़ोसी, ग्रामीण, रिश्तेदार सबको एक दिन बुला लेते हैं ताकि पगड़ी रश्म के साथ साथ बैठने, मिलने का काम एक दिन में ही निपट जाए, ये अच्छी पहल कह सकते हैं, लेकिन कुछ बुराइयां आज भी रीति रिवाज के नाम पर जारी है, मगर किसी की भी हिम्मत नहीं है, पंचो को चुनौती दे सके, हालांकि अब पंच, गांव के मुखिया भी सर्व सहमति से निर्णय लेने लगे हैं, या बहुमत से अपनी बात को मनवाते है, इन पंचों की वजह से आज भी कुछ धर्म कर्म हो जाता है ये अच्छी बात है, एक बात की खासियत होती हैं कि ऐसे मौके पर कोई भी किसी भी चीज की मना नही करते हैं, समय निकालकर निस्वार्थ भाव से आने वाले लोगो की सेवा करते हैं, पूरे दिन मरने वाले के गुणगान करते भी थकते नहीं है, आदमी को भला आदमी पूरी दुनिया से कहलवाना हैं तो मरना पड़ेगा, खुद के मरे बगैर उनके बदले स्वर्ग देखने कौन जाए, मुझे कुछ खरी खरी बाते भी लिखनी थी मगर हिम्मत तो उस परंपरा को तोड़ने की मेरी भी नहीं हुई, वैसे आजकल रोने वाले से लेकर सब कुछ किराए पर भी मिलते हैं, जिनके, रिश्तेदार नही आते हैं, तो ऑनलाइन बुकिंग जोधपुर में अंतिम सत्य संस्था है, असली रोने वालो को भी रोने में पीछे छोड़ देते हैं, मुझे सबसे अच्छी बात लोगो का प्रेम,, सेवा भाव, समय देना और जिंदगी में पहली बार मरने के बाद उस आदमी में सिर्फ अच्छाई ही अच्छाई नजर आना हमारी परंपरा है, जीते जी कमियां हर व्यक्ति में होती है मगर मरने के बाद निंदा नही करनी चाहिए।