25/12/2018
बागरु (मोती-डूंगरी) की लड़ाई में मुग़ल-मराठा-राजपूत-होल्कर की 7 सेनाओं को इकट्ठा हरा प्रिंस सूरज कहलाये थे महाराजा सूरजमल:
महाराजा सूरजमल जी के 253 वें शहीदी दिवस (25 दिसम्बर, 1763) पर विशेष!
आमेर (जयपुर) राजघराने की राजगद्दी बाबत राजपूत राजा ईश्वरी सिंह और उनके भाई माधो सिंह की लड़ाई थी बागरू की लड़ाई|
इस पर राजा ईश्वरी सिंह ने ब्रजराज बदन सिंह को कुछ यूँ सन्देश भिजवाया:
देषि देस को चाल ईसरी सिंह भुवाल नैं।
पत्र लिख्यौ तिहिकाल बदनसिंह ब्रजपाल कौ।।
करी काज जैसी करी गुरुडध्वज महाराज।
पत्र पुष्प के लेते ही थे आज्यौ ब्रजराज।।
आयौ पत्र उताल सौं ताहि बांचि ब्रजयेस।
सुत सरज सौं तब कहौ थामि ढुढाहर देस।|
इस पर ब्रजराज ने अपने प्रिन्स सूरज के नेतृत्व में 20000 सेना भेजी| युद्धे-मैदान कुछ यूँ सजा:
20-21-22 अगस्त 1748 तीन दिन की इस ऐतिहासिक लड़ाई में एक तरफ तीन लाख तीस हजार (330000) सैनिकों से सजी मुगल-मराठा पेशवाओं और माधो सिंह के पक्ष वाले राजपूतों की 7-7 सेनायें, तो दूसरी तरह राजा ईश्वरी सिंह के पक्ष में सजी मात्र बीस हजार (20000) की कुशवाहा राजपूत और हरयाणा-ब्रज रियासत भरतपुर की सिर्फ 2 सेनाएं।
एक तरफ छोटे आकार के सैनिक तो दूसरी तरफ ये 7-7 फुटिये लम्बे-चौड़े 150-150 किलो वजनी भरतपुर जाट सेना के सैनिक।
एक तरफ अस्सी हजार (80000) की टुकड़ी तो दूसरी तरफ मात्र दो हजार (2000) की टुकड़ी उनको गुर्रिल्ला वार में छका-छका के पीटती हुई।
एक तरफ गाजर-मूली की तरह कटते सैनिक तो दूसरी तरफ पचास-पचास (50-50) को मारने वाला एक-एक जाट और कुशवाहा राजपूत सैनिक।
एक तरफ 7-7 राजा तो दूसरी तरफ 7 फुटी 200 किलो वजनी अकेले भरतपुर प्रिन्स सूरज।
और यह लड़ाई चली भी पूरे तीन दिन थी और वो भी बरसाती तूफानों में अरावली के रेतीले मैदानों और पथरीले पहाड़ों के बीच सरे-मैदान लड़ी गई थी। कुल मिला के क्या 'ट्रॉय', क्या 'ग्लैडिएटर', क्या 'स्पार्टा', क्या '300' और क्या 'बाहुबली'; इनसे भी कालजयी थिएट्रिकल दृश्य उस युद्धे-मैदान सजा था|
कुशवाहा राजपूत सेनापति दूसरे दिन वीरगति को प्राप्त हुआ तो अब सारा दारोमदार अकेले सूरज-सुजान के कन्धों पर आन पड़ा| और तब वो दुदुम्भी मची थी कि रणचंड़ी भी स्तब्ध देखती रह गई और अंत में माधो सिंह की जिद्द की हार हुई और इस प्रकार सूरज-सुजान ने राजा ईश्वरी सिंह आमेर की गद्दी पर विराजमान रखवाये|
उनकी वीरता को देख बूँदी कोर्ट के राजकवि सूर्यमल के मुख से कर्कश ही यह पंक्तियाँ निकली:
नहीं जाटनी ने सही व्यर्थ प्रसव की पीर,
जन्मा उसके गर्भ से सूरजमल सा वीर!
धन्य है यह धरा, धन्य है वो कायनात, जिसने उस अफलातून को साक्षात् धरती पर चलते हुए देखा, तांडव करते हुए देखा|