03/06/2026
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किसान-मजदूर के असली मसीहा- जनसंघर्ष के प्रतीक कॉमरेड अमरा राम बनाम अवसरवाद की 'किलकी गैंग'
आज जब सोशल मीडिया का उस्तरा हर हाथ में पहुंच चुका है, तो राजनीति का स्तर गिरकर केवल शोरगुल, गाली-गलौज और अंधभक्ति तक सीमित रह गया है। इस वर्चुअल दौर में रातों-रात पैदा हुए 'तथाकथित मसीहा' खुद को सर्वशक्तिशाली समझने का भ्रम पाले बैठे हैं। लेकिन राजस्थान की मरुभूमि गवाह है कि असली जननायक मंचों पर बैठकर शादियां भुनाने, जातिवाद का जहर घोलने या आधी रात को फेसबुक पर फर्जी क्रांतियां करने से नहीं, बल्कि पांच दशकों तक सड़कों पर लाठियां खाकर और जेल की सलाखों के पीछे रहकर बनते हैं।
सीकर के सांसद कॉमरेड अमरा राम और हनुमान बेनीवाल की तुलना करना ही सबसे बेमानी और मूर्खतापूर्ण प्रयास है। एक तरफ जहाँ अमरा राम के नेतृत्व में हुए ऐतिहासिक किसान आंदोलनों की बदौलत आज राजस्थान के हर किसान और मजदूर के घर के बिजली बिल में *सब्सिड Subsidy* का कॉलम दिखाई देता है, जिससे उनके हजारों रुपए बच रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ हनुमान बेनीवाल के पास अपनी कोई एक भी ऐसी सांगठनिक नीति या सफल आंदोलन नहीं है जिसका सकारात्मक परिणाम पूरे प्रदेश की जनता को मिला हो। सहकारी समितियों (सोसाइटी) के 50-50 हजार रुपये के लोन माफ करवाने से लेकर किसानों के हक की हर लड़ाई को अमरा राम जी ने पूरी ईमानदारी से अंतिम मुकाम तक पहुंचाया है। उन्होंने कभी किसी सरकार या पूंजीपति के साथ राजनीतिक "सेटिंग" नहीं की, यही वजह है कि आज भी राजस्थान सरकार को हर साल झुककर किसान-मजदूरों के हक के 1800 करोड़ रुपये बिजली सब्सिडी के रूप में देने पड़ते हैं।
हनुमान बेनीवाल की राजनीति का असल सच उनके अति-महत्वाकांक्षी अहंकार, अभद्र भाषा और अवसरवाद में छिपा है। जो व्यक्ति मंचों से माइक तोड़ते हुए कांग्रेस और बीजेपी दोनों को कोसता था, उसकी राजनीतिक प्रासंगिकता की हवा तब निकल गई जब अपनी राजनीतिक जमीन बचाने के लिए कभी उसे बीजेपी के रथ पर सवार होना पड़ा, तो कभी कांग्रेस के 'हाथ' का पल्लू थामना पड़ा। उनकी पार्टी (RLP) में संगठन नाम की कोई चीज नहीं है; वे अपनी फिल्म के अकेले हीरो, डायरेक्टर और स्पॉटबॉय हैं। इस तथाकथित मसीहा के पीछे जो भारी-भरकम चुनावी सिस्टम, रैलियां और हेलीकॉप्टर्स नजर आते हैं, उनका फाइनेंसर कोई और नहीं बल्कि वही सत्ताधारी ताकतें हैं जिनके इशारे पर यह पूरी पटकथा लिखी जाती है। बेनीवाल केवल मिर्धा, मदेरणा या डोटासरा जैसे स्थापित चेहरों की आलोचना करके संजीवनी पाते रहे हैं, और जब संकट आता है तो पर्दे के पीछे साठगांठ कर लेते हैं।
विडंबना देखिए कि हनुमान बेनीवाल के लगभग 90% समर्थक खुद को सुरक्षित रखने के लिए आरएलपी के साथ-साथ बीजेपी या कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टियों में भी पैर रखते हैं, क्योंकि वे अच्छी तरह जानते हैं कि उनका नेता कभी भी उन्हें धोखा देकर पाला बदल सकता है। उनके समर्थकों की जो 'किलकी गैंग' सोशल मीडिया पर हुड़दंग मचाती है, वह नशे की आदी, असभ्य और पूरी तरह से रिजेक्टेड लड़कों की फौज जैसी है, जो अपनी ही जड़ों को भस्म करने पर तुली है। जब ये लोग पूर्व में महिला नेताओं (किरण माहेश्वरी या दिव्या मदेरणा) पर अभद्र टिप्पणियां कर रहे थे, तब इस गैंग ने खूब तालियां बजाई थीं, लेकिन आज जब खींवसर विधानसभा उपचुनाव में हनुमान बेनीवाल अपनी पत्नी की राजनीतिक प्रतिष्ठा तक नहीं बचा पाए और वे चुनाव हार गईं, तो इस हार पर बोला गया 'धूल चाटने' जैसा सामान्य मुहावरा भी इस हुड़दंगी गैंग को चुभ रहा है और वे माफी की मांग कर रहे हैं
गठबंधन का मतलब सहभागिता होती है, कोई अहसान नहीं। दूसरों को नसीहत देने से बेहतर है कि ये तथाकथित मसीहा और उनकी किलकी खुद में सुधार करें। जब किलकी गेंग के लोगों की मावाए उनको निक्कर पहनाए करती थीं, तब कॉमरेड अमरा राम सरकारों के खिलाफ सड़कों पर लाठियां खा रहे थे। पिछली पीढ़ी के इस निस्वार्थ त्याग और सादगी का अनादर करके कोई आबाद नहीं हो सकता।
कॉमरेड अमरा राम का 50 साल का ऐतिहासिक संघर्ष: छात्र राजनीति से संसद तक
राजस्थान की राजनीति में जहाँ बड़े-बड़े राजनेता सत्ता के वातानुकूलित कमरों और गठबंधनों के जरिए अपनी जगह बनाते हैं, वहीं सीकर के सांसद कॉमरेड अमरा राम ने पिछले 50 वर्षों (1975 से वर्तमान) में सड़क से लेकर विधानसभा और संसद तक जनसंघर्ष की एक अद्वितीय इबारत लिखी है। उन्हें "समझौता न करने वाले" और "परिणाम देने वाले" जननायक के रूप में जाना जाता है। सार्वजनिक दस्तावेजों और इतिहास के पन्नों पर दर्ज उनके सबसे बड़े और सफल आंदोलनों का ब्योरा इस प्रकार है:
# 1. छात्र राजनीति और आपातकाल का संघर्ष (SFI दौर: 1975 - 1980)
* **अधिकारों की लड़ाई और जेल यात्राएं:** आपातकाल (Emergency) के दौर में अमरा राम ने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) की छात्र शाखा SFI के बैनर तले छात्र राजनीति की शुरुआत की थी। छात्र हितों, कॉलेज में सीटों को बढ़ाने और दाखिले के अधिकारों को लेकर उन्होंने कई उग्र और सफल आंदोलन किए, जिसके कारण तत्कालीन व्यवस्था ने उन पर कई पुलिस केस दर्ज किए और उन्हें जेल भी जाना पड़ा।
* **ऐतिहासिक छात्रसंघ चुनाव (1979):** विपरीत परिस्थितियों और मुकदमों के बावजूद, 1979 में वे राजस्थान के दूसरे सबसे बड़े कॉलेज, **श्री कल्याण राजकीय महाविद्यालय (सीकर)** के छात्रसंघ अध्यक्ष चुने गए। इस जीत ने शेखावाटी में वामपंथी छात्र आंदोलन की मजबूत नींव रखी।
# 2. 2000 का ऐतिहासिक घड़साना-रावला पानी आंदोलन
* **सिंचाई के पानी का हक:** इंदिरा गांधी नहर परियोजना (IGNP) के पहले चरण में किसानों को सिंचाई के पानी की आपूर्ति में कटौती की जा रही थी। इसके खिलाफ सीमावर्ती जिलों के किसान उठ खड़े हुए।
* **आंदोलन की तीव्रता और परिणाम:** इस आंदोलन के दौरान किसानों और पुलिस के बीच भारी टकराव हुआ, जिसमें कई किसान शहीद भी हुए। सरकार ने कर्फ्यू लगाया और दमन चक्र चलाया, लेकिन अमरा राम और किसान सभा के नेताओं ने मोर्चे को टूटने नहीं