15/05/2025
शहीद सुखदेव थापर: विचारों की मशाल, इंकलाब का अमिट नाम
(जन्म: 15 मई 1907, शहादत: 23 मार्च 1931)
आज 15 मई है—एक ऐसे क्रांतिकारी की जयंती, जिसने अपने जीवन को न सिर्फ़ देश की आज़ादी के लिए कुर्बान किया, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को यह सबक भी दिया कि बिना विचारधारा के संघर्ष अधूरा होता है।
सुखदेव थापर, लाहौर के रहने वाले, हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के प्रमुख स्तंभों में से एक थे। वो केवल एक क्रांतिकारी नहीं, बल्कि एक संगठनकर्ता, विचारक और अनुशासित कार्यकर्ता थे, जो भगत सिंह और राजगुरु के साथ ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ सबसे मजबूत आवाज़ बनकर उभरे।
उनका संघर्ष सिर्फ़ अंग्रेजों के खिलाफ़ नहीं था...
सुखदेव का संघर्ष सामाजिक अन्याय, जातिवाद, शोषण और पूंजीवादी गुलामी के खिलाफ भी था। वह मानते थे कि सिर्फ राजनीतिक आज़ादी ही नहीं, सामाजिक और आर्थिक समानता भी ज़रूरी है।
सुखदेव और भगत सिंह—इंकलाब के दो कंधे
जहाँ भगत सिंह विचारधारात्मक गहराई के लिए जाने जाते हैं, वहीं सुखदेव उस विचार को कार्यान्वयन में बदलने वाले योद्धा थे। भगत सिंह की लेखनी के पीछे सुखदेव की रणनीति और संगठन क्षमता का भी बड़ा योगदान था।
लाहौर षड्यंत्र केस और शहादत
सुखदेव को भगत सिंह और राजगुरु के साथ 23 मार्च 1931 को लाहौर में फाँसी दी गई। तीनों ने मौत को गले लगाया, लेकिन झुके नहीं।
उनकी शहादत ने पूरे देश में क्रांति की लहर फैला दी।
आज की ज़रूरत—सुखदेव को समझना, याद रखना और जीना
आज जब समाज फिर से असमानता, धार्मिक उन्माद, बेरोजगारी और पूंजीवाद के चंगुल में फंसा है, तो सुखदेव को याद करना सिर्फ श्रद्धांजलि देना नहीं है—बल्कि उनके अधूरे सपनों को पूरा करने की ज़िम्मेदारी उठाना है।
सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम सवाल उठाएं, अन्याय के खिलाफ खड़े हों, और एक ऐसे समाज के लिए संघर्ष करें जो बराबरी, भाईचारा और न्याय पर टिका हो।
"इंकलाब ज़िंदाबाद" केवल नारा नहीं था, वह एक सोच थी—जिसे सुखदेव ने जिया।
आज उनके जन्मदिवस पर संकल्प लें—कि हम भी उस सोच को जिएंगे।"