01/10/2024
उत्तर बिहार के 16 जिलों की लगभग 10 लाख आबादी इस समय बाढ़ के कहर से जूझ रही है। उनके घर-बार पानी में डूब चुके हैं, खेतों में लहलहाती फसलें बर्बाद हो गई हैं, और रोजमर्रा की जरूरतें - खाना, पानी, दवाइयां - सब कुछ संकट में हैं। जो लोग इस समय फंसे हुए हैं, हर दिन बाढ़ की तबाही को अपनी आंखों के सामने देखते हुए अपनी जिंदगी की जद्दोजहद कर रहे हैं। उन परिवारों का दर्द सुरक्षित बैठा व्यक्ति नहीं समझ सकता। अपने मुखियाकाल में मैंने स्वयं बाढ़ की इस विभीषिका को न केवल देखा है, बल्कि महसूस भी किया है। बाढ़ सिर्फ पानी नहीं लाती, वह लोगों की उम्मीदों, सपनों, और जीविका को बहा ले जाती है। घरों में घुसा पानी लोगों की मेहनत, बचत, और भविष्य को एक झटके में तबाह कर देता है।
हर साल जब बाढ़ आती है, तब सरकार दो महीने के लिए 'भारी बारिश' और 'नेपाल से छोड़े गए पानी' को कोसती है, और फिर दस महीने के लिए सो जाती है, जैसे कोई समस्या थी ही नहीं। क्या सरकार को यह नहीं पता कि मानसून आएगा, नदियों का जलस्तर बढ़ेगा, और बाढ़ से जान-माल की क्षति हो सकती है? तो फिर इसकी तैयारी क्यों नहीं की जाती? क्यों हर साल हम उसी त्रासदी का सामना करने को मजबूर होते हैं? नदियों के गाद को निकालने का काम, बाढ़ रोकथाम की दीर्घकालिक योजनाएं, या जल प्रबंधन की सही रणनीति - सरकारी मशीनरी इनका क्रियान्वयन पहले से क्यों नहीं करती है ?