17/03/2023
राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार से सम्मानित श्रीमाम अरुण कुकसाल जी द्वारा ठाकुर सुंदर सिंह चौहान चौहान जी के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालता यह लेख है।
'समस्यायें हैं तो उनके समाधान भी हैं’
जीवन-मंत्र से मिली कामयाबी- सुन्दर सिंह चौहान
समाज आपके लिए क्या सोचता और करता है कि जगह, आप अपने और अपने समाज के लिए, क्या सोचते और करते हैं, के प्रति समर्पित हैं, तो आप जीवनीय सफलता के मुकाम पर अवश्य पहुंचेगे। जीवन की बाधाओं से तब उदासी नहीं, उत्साह का भाव आपके मनोबल को बढ़ायेगा। क्योंकि, जीवन में बाधायें रोकती कम और सचेत रहना ज्यादा सिखाती हैं।
सफल उद्यमी और प्रतिष्ठित समाजसेवी सुन्दर सिंह चौहान उन कामयाब व्यक्तित्वों में हैं जिन्होने जीवन की कमियों को ‘परे हट’ मानते हुए अपने कर्म और धर्म को हमेशा जीवंत रखा है। जीवनीय निश्चितता और जीवन में आगे के निर्णयों के भाव उनके मुख-मंडल पर एक साथ मुखर हैं। सोच में दूरदर्शिता और नित्यकर्म में पारदर्शिता लिए वे समाज की खुशहाली में ही अपनी सफलता का सपना संजोते हैं।
किसान, मैकेनिक, कण्डक्टर, ड्रायवर, ट्रांसपोर्टर, ठेकेदार, उद्यमी, राजनीतिज्ञ, संगठनकर्ता और समाजसेवी की उनकी जीवन-यात्रा के दुर्गम उतार-चढ़ाव रहे हैं। ‘समस्यायें हैं तो उनके समाधान भी हैं’ का जीवन-मंत्र उन्होने बचपन में ही हासिल कर लिया था। पैतृक विरासत में मिले अभावों के साथ-साथ संगी-साथियों से मिले घाव भी उनको कर्म-पथ से विचलित नहीं कर सके। तभी तो, आज उन्हें शानदार उद्यमीय उपलब्धियां और सामाजिक प्रतिष्ठा हासिल हुई है।
टिहरी (गढ़वाल) जिले की जाखणीधार पट्टी के दणोली गांव में 9 मई, 1949 को जन्मे सुन्दर सिंह चौहानजी के जीवन संघर्षों के गवाह कई स्थान हैं। जहां हुनर भी सीखा और हार कर उभरना भी सीखा। पिता अर्जुन सिंह के पास गुजर-बसर करने लायक खेती थी। दुर्भाग्य से माता श्रीमती धागी देवी का निधन उनके 6 माह के नवजात जीवनकाल में ही हो गया था। जीवन का इस बड़ा दुःख और क्या हो सकता है?
बचपन के लाल सिंह चौहान ने प्राथमिक विद्यालय, भरेटीधार से सन् 1961 में पांचवी और सन् 1964 में जूनियर हाईस्कूल, जाखणीधार से 8वीं कक्षा पास की। परिवार में अभावों का बोल-बाला था। इसलिए, आगे की शिक्षा प्राप्त करने की इच्छा को त्यागकर पिता के साथ खेती-बाड़ी से जुड़ गये। मन-मस्तिष्क में पढ़ने की लगन थी तो सन् 1968 में प्राईवेट छात्र के रूप में हाई स्कूल पास किया। और, नाम को परिवर्तित करके लाल सिंह चौहान से सुन्दर सिंह चौहान बन गए। पहला विवाह श्रीमती दर्शनी देवी और 11 साल बाद दूसरा श्रीमती सोनी देवी से हुआ।
परिवार की आर्थिक स्थिति की दयनीयता को जानते हुए रोजगार के लिए सन् 1969 को ऋिषीकेश आना हुआ। मोटर वर्कशाप में लेबरी का काम मिला। लगन और मेहनत के बल पर कुछ ही समय में कुशल मैकेनिक बन गए। गाड़ी चलाने के शौक ने बाद में मैकेनिकी छुड़ा कर मोटर का कण्डक्टर बना दिया। हुनरबंदी के बलबूते पर कण्डक्टरी से ड्रायवर बनने में ज्यादा समय नहीं लगा।
जीवन में आगे बढ़ने की बैचेनी ने गाड़ी मालिक बनने को उकसाया। सन् 1971 में 10 हजार परिवार से और 20 हजार रुपया ब्याज पर उधार लेकर बस खरीदी। काम चल निकला, तुरंत दूसरी बस और एक ट्रक खरीद लिया। नया उद्यम करना उनकी मूल अभिवृत्ति रही, इसलिए, सोने-चांदी के व्यापार में भी हाथ अजमाया।
परन्तु, सभी दिन एक समान नहीं रहते। बुरी संगत ने धर-दबोचा। शराब और लापरवाही के व्यसनों के कारण चार साल में ही बस और ट्रक बिकने सेे सारा कारोबार चौपट हो गया। सब कुछ लुटाकर उसी गर्दिश में पहुंच गए जहां से चले थे।
देश में सन् 1975 के आपातकाल का दौर था। सुन्दर सिंह चौहान मजबूरन ऋिषीकेश से दिल्ली रोजगार के लिए गाड़ी चलाने आये। मैदानी क्षेत्र में गाड़ी चलाने का अनुभव नहीं था। पर, जीवन की जरूरतें सब कुछ सीखा और करा देती हैं। दिल्ली में सीमेण्ट ढोने वाले ट्रक चलाने लग गए। इस काम में धोखेबाजों से पाला पड़ा। चालाकी और बेईमानी से चौहानजी का दूर का नाता भी नहीं था। इसलिए, ये काम छोड़ना पड़ा। फिर, दिल्ली से आसाम, नागालैण्ड और मणिपुर की ओर रोजगार के लिए कठिन सफर प्रारम्भ हुआ। परन्तु, बेईमान मानसिकता पग-पग उनका पीछा कर रही थी। किसी तरह वहां से भी पीछा छुडा कर एक मित्र के सहयोग से सन् 1979 मेें कोटद्वार आ गए।
कोटद्वार में फिर ट्रक की ड्रायवरी का दौर शुरू हुआ। मेहनत रग-रग में रही, इस कारण जल्दी ही ठीक-ठाक पूंजी कमा ली थी। सन् 1984 में अपना ट्रक खरीद लिया। सतपुली क्षेत्र में सन् 1986 विश्व बैंक परियोजना जलागम के कामों के लिए ट्रक चलाते हुये फिर नया करने की ठानी।
मेहनत रंग लाई और सन् 1987 से ट्रकों से रेत-बजरी का ढुलान करते हुए वर्ष- 2006 में सतपुली के पास मलेठीसैण में स्टेट बैंक, सतपुली के वित्तीय सहयोग से क्रेशर प्लांट के मालिक हो गये। उसके पश्चात उनके उद्यमीय प्रयास सफलता के नित्य नये आयाम हासिल करते गये। आज सतपुली क्षेत्र के आस-पास पेट्रोल पम्प, हॉट मिक्स प्लांट, बाटलिंग प्लांट, मशरूम उत्पादन, पोल्ट्री फार्म, चौहान लॉज और होटल उनकी अदम्य उद्यमीय अभिवृत्ति का ही प्रतिफल है। उद्यमी सुन्दर सिंह चौहान के इन उद्यमों में आज 500 से अधिक प्रत्यक्ष और हजारों अप्रत्यक्ष रूप में लोग रोजगार से जुड़ें हैं।
सुन्दर सिंह चौहान के व्यक्तित्व का एक पक्ष उनके एक सफल उद्यमी होना है। उनकी जीवन-यात्रा का दूसरा सुनहरा पक्ष उनकी सामाजिक दायित्वशीलता के कर्तव्य को बखूबी निभाने का है। बचपन में झेली गरीबी, दुनिया-दारी में मिले धोखे और समाज की बेहतरी की ललक ने उन्हें हमेशा जागरूक बनाये रखा। उन्होने समाज से मिले अपमान को सहन किया पर अपने स्वाभिमान को कभी नहीं झुकने दिया।
बात सन् 1982 की है। अपने गांव दणोली के प्रधान पद का उन्होने चुनाव लड़ा। धोखाधडी से उन्हें हारा हुआ घोषित किया गया। बाद में जांच हुई और वे प्रधान चुने गये। परन्तु, उन्होने ये प्रधानी स्वीकारी नहीं।
सुन्दर सिंह चौहान समय-समय पर उत्तराखंड की राजनीति में सक्रिय रहे हैं। उत्तराखण्ड क्रांति दल, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी से उन्होने अपना नाता जोड़ा, पर अच्छे अनुभव नहीं रहे। उत्तराखण्ड क्रांति दल से वर्ष- 2007 और निर्दलीय के रूप में वर्ष-2017 में चौबट्टाखाल विधान सभा से वे विधायक प्रत्याशी रहे हैं। वर्तमान में वे उत्तराखण्ड कोे शहीदों के सपनों का राज्य बनाने के संकल्प के साथ ‘बलिदान ब्रिगेड’ के प्रान्तीय अध्यक्ष हैं। उन्होने इसी उद्देश्य के तहत मलेठीसैण में ‘शहीद स्मारक’ के लिए अपनी 5 नाली भूमि दान दी है।
राज्य के विकास के लिए सुन्दर सिंह चौहानजी के संयोजन में गोष्ठियों आयोजन होता आया है। राज्य के समग्र विकास के लिए उनके पास ठोस योजनायें और सुझाव हैं। और, उनको स्वयं अपने प्रयासों से व्यवहारिक धरातल पर लाने के लिए वे दृड-संकल्पित हैं। उनका मानना है कि केवल बोल कर नहीं वरन जो बोला उसे स्वयं अमल में लाने की नीति होनी चाहिए।
सुन्दर सिंह चौहान के व्यक्तित्व का एक खूबसूरत पक्ष उनकी समाज सेवा में बढ़-चढ़कर सक्रियता है। उल्लेखनीय है कि वे अपनी समस्त आय का 25 प्रतिशत अनिवार्यतः जन सेवा और कल्याण के लिए समर्पित करते हैं। सामाजिक सरोकारों में अग्रणी योगदान देते हुए वे मलेठीसैण में 100 लोगों के रहने के लिए आरामदायक सुविधाओं से युक्त वृद्धाश्रम का संचालन कर रहे हैं। स्कूलों, मंदिरों और सार्वजनिक उपयोग के कामों में उनका सहयोग सार्वजनिक है। जरूरतमंद परिवारों की कन्याओं के विवाह की जिम्मेदारियों को वे पारिवारिक अभिभावक के तौर पर वहन करते हैं। शवदाह से वापस लोगों को निःशुल्क भोजन कराने की पुण्यदाई परम्परा को वे निभाते आ रहे हैं।
महत्वपूर्ण यह भी है कि, पक्षाघात की बीमारी से जूझते हुए भी कोरोना काल में वे समाज के प्रति अपनी दायित्वशीलता से पीछे नहीं हटे। उस विकट दौर में वे 1 हजार से अधिक परिवारों के भरण-पोषण का वे मजबूत सहारा बने।
प्रसन्नता की बात यह है कि श्री राकेश मोहन खन्तवाल ने ‘साधना और सफलता’ पुस्तक में श्री सुन्दर सिंह चौहान की जीवन-गाथा को खूबसूरत तरीके से लिपिबद्ध किया है। चार खण्डों के फैलाव में यह पुस्तक चौहानजी के षून्य से शिखर तक की जीवन-यात्रा का सार है। चौहानजी के प्रारम्भिक जीवन के बारे में उनके परम मित्र गुणपाल सिंह नेगी ने अपना लेखकीय सहयोग प्रदान किया है। इस पुस्तक की भूमिका गणेश खुगशाल ‘गणी’ ने लिखी है। जगमोहन डांगी, मंगल सिंह नेगी, यू. एस. रावत, प्रताप सिंह, उम्मेद सिंह चौहान, राजनितिन सिंह रावत, पुष्पेन्द्र राणा, चंद्रशेखर भट्ट, गुणपाल सिंह, रेखा नेगी, राजेश सेमवाल ‘मृदुल’, प्रो. राकेश नेगी ‘अनंत’, नीलम सिंह नेगी ‘नीलकंठ’ ने श्री सुन्दर सिंह चौहान के बहुआयामी व्यक्तित्व और कृतित्व को सुन्दर तरीके से प्रस्तुत किया है।
सतपुली के निकट मलेठीसैंण में स्थित उनका घर परम्परागत संयुक्त परिवार का आर्दश और जीवन्त उदाहरण है। उनके उपक्रमों में कार्यरत कार्मिकों के साथ पशुपालन और खेत-खलिहान में व्यस्त परिवारजनों की सादगी और सौम्यता सुन्दर सिंह चौहानजी के जीवनीय व्यक्तित्व का ही सुन्दर प्रभाव और प्रवाह है। यह परम्परा अनवरत बनी रहे, ऐसी शुभकामना है।
डॉ. अरुण कुकसाल
ग्राम- चामी पोस्ट- सीरौं 246163
पौड़ी (गढ़वाल), उत्तराखण्ड