05/06/2026
🌾 विश्व पर्यावरण दिवस पर एक रचना "स्वार्थ की आग और बेजुबान का क्रंदन 🌾
इंसान ने जब अपने हिस्से का अनाज समेट लिया, तो उसने ज़मीन को बोझ समझ लिया। पीछे छूट गई पराली को जलाने के लिए उसने माचिस की एक तीली क्या सुलगाई, उसने मानवता को ही राख कर दिया।
कड़वी हकीकत😡😡
भूख का अंत: अपने हिस्से की रोटी पाकर इंसान यह भूल गया कि उस बचे हुए चारे में किसी बेजुबान जानवर का निवाला था।
घरों की तबाही: उस आग की जद में आकर सदियों पुराने बड़े-बड़े पेड़ झुलस गए, जिन्होंने कभी हमें ठंडी छांव,फल,लकड़ियां और खूबसूरत बचपन दिया था।
मासूमों की चीखें: उन पेड़ों पर बसे हज़ारों बेजुबान पक्षी और उनके घोंसले पल भर में राख हो गए।
मित्रों की हत्या: धरती मां की गोद को उपजाऊ बनाने वाले लाखों मित्र-कीट इस स्वार्थ की आग में जिंदा जल गए।
एक संदेश इंसानी ज़मीर के नाम:
"हे इंसान, तेरी भूख तो अनाज के दानों से मिट गई, पर उन बेजुबानों का क्या जिनकी पूरी दुनिया ही तूने अपनी ज़रा सी सहूलियत के लिए फूंक दी? प्रकृति का पेट सिर्फ इंसानों के लिए नहीं, हर जीव के लिए भरता है। पराली में आग मत लगाओ, अपने भीतर की संवेदनशीलता को जीवित रखो।
"यह गीत एक चेतावनी है, एक पुकार है और आने वाली पीढ़ी के प्रति हमारे पावन फर्ज की याद दिलाता एक सामूहिक आह्वान है।
आइए, इस गीत के माध्यम से एक संकल्प लें—खेतों में आग नहीं लगाएंगे, अपनी धरती मां को बंजर होने से बचाएंगे।
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