25/02/2026
◆गुरुकुलों में दी जाने वाली प्रमुख विद्याएँ...
◆ अग्नि विद्या — धातु विज्ञान
◆ वायु विद्या — उड़ान विज्ञान
◆ जल विद्या — नौपरिवहन
◆ अंतरिक्ष विद्या — अंतरिक्ष विज्ञान
◆ पृथ्वी विद्या — पर्यावरण और भूविज्ञान
◆ सूर्य विद्या — सौर अध्ययन
◆ चन्द्र व लोक विद्या — चन्द्र और ग्रहों का अध्ययन
◆ मेघ विद्या — मौसम विज्ञान
◆ पदार्थ विद्युत विद्या —ऊर्जाविज्ञान
◆ विमान विद्या — विमान निर्माण
◆ आकर्षण विद्या — गुरुत्वाकर्षण
◆ खगोल विद्या — ज्योतिर्विज्ञान
◆ काल विद्या — समय मापन
◆ यंत्र विद्या — यांत्रिक विज्ञान
◆ रत्न व धातु विद्या — रसायन और धातु अध्ययन
◆ कृषि, पशुपालन, वस्त्र निर्माण, वास्तु, पाक विद्या, औषधि विज्ञान।
ये सभी ज्ञान गुरुकुलों में व्यवहारिक रूप से सिखाए जाते थे। भारत में अंग्रेजों से बहुत पहले, 1811 से पूर्व ही।
7 लाख 32 हज़ार से अधिक गुरुकुल थे। वहीं इंग्लैंड में पहला स्कूल 1811 में खुला। यही भारत को विश्वगुरु बनाता था।
वेद = विज्ञान + शिल्प + आत्मज्ञान वेद केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं,बल्कि सृष्टि-विज्ञान के शुद्धतम सूत्र हैं।
◆वेद कहते है:-("विज्ञानं ब्रह्म” )
अर्थात विज्ञान ही ब्रह्म है।
◆तैत्तिरीयोपनिषद में कहा गया है:-
“विज्ञानाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते।”
“समस्त प्राणी विज्ञान से उत्पन्न होते हैं।विज्ञान से ही जीवन जीते हैं और विज्ञान में ही लीन हो जाते हैं।” विज्ञान को ब्रह्मस्वरूप माना गया है यज्ञ और कर्म की वृद्धि भी विज्ञान से ही होती है।
◆इसलिए ऋषि कहते हैं:-
“विज्ञानं देवा: सर्वे ब्रह्म ज्येष्ठमुपासते।” समस्त देवता विज्ञान को श्रेष्ठ ब्रह्म के रूप में उपासते हैं।
शिल्प = यज्ञ कर्म
◆वास्तुसूत्रोपनिषद में कहा गया है:-
“शुल्वं यज्ञस्य साधनं, शिल्पं रूपस्य साधनम्।”
अर्थात। शुल्ब सूत्र (विज्ञान) यज्ञ का साधन है, और शिल्प (रचना) उसका रूप है।
“आत्मा संस्कृतिर्वै शिल्पानि”
अर्थात शिल्प वह कर्म है जो आत्मा को शुद्ध करता है।
इसलिए शिल्प और विज्ञान दोनों ही ईश्वर की आराधना हैं। विश्वकर्मा ऋषि सृष्टि के शिल्पी हैं।
◆ऋग्वेद कहता है:-
“त्रिधातु शर्म वहतं शुभस्पती”
हे शिल्पियों! लोहे, ताँबे और पीतल से यान बनाओ और देश-देशांतरों में उपयोग करो। विश्वकर्मा वंश श्रेष्ठ कहलाया ।
“धर्मज्ञो वेद पारगः, ज्योतिष शास्त्र च पारगः।”
वे गणित, खगोल, भूगोल, धातु विज्ञान और वास्तु के पारंगत थे। यही कारण है कि शिल्पी ब्राह्मणों को पाँचाल कहा गया। “पंचभिः शिल्पैः भूषयन्ति जगत् इति पञ्चालाः।”
जो पाँच प्रकार के शिल्पों से जगत को सजाते हैं, वे पाँचाल कहलाते हैं।
अतः वेद ज्ञान है, शिल्प विज्ञान है, यही राष्ट्र निर्माण का आधार है। बिना शिल्प विज्ञान के सृष्टि विज्ञान की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
विज्ञान जब धर्म से जुड़ता है तो सृजन होता है, और जब धर्म विज्ञान से अलग होता है तो विनाश होता है। इसलिए भारत को पुनः विश्वगुरु बनाना है तो वेद, विज्ञान और शिल्प तीनों का समन्वय आवश्यक है।वेद = विज्ञान = ब्रह्म।
विज्ञान ही ब्रह्म है, और शिल्प उसी का ही रूप। इस कथन का आशय यह है कि गुरुकुल शिक्षा पद्धति, जो वैदिक काल से चली आ रही है, समग्र शिक्षा का केंद्र थी,इसलिए इसे विज्ञान की जननी कहना इस प्रणाली के व्यापक योगदान को रेखांकित करता है।
जयति जयति जय पुण्य सनातन संस्कृति, जयति जयति