Satish Kumar

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*त्योहार की आस्था पर राजनीति की चोट!”: सलेमपुर मे माँ दुर्गा की मूर्ति विसर्जन के बीच एक पोस्टर — “एक रहेंगे तो सेफ रहें...
03/10/2025

*त्योहार की आस्था पर राजनीति की चोट!”: सलेमपुर मे माँ दुर्गा की मूर्ति विसर्जन के बीच एक पोस्टर — “एक रहेंगे तो सेफ रहेंगे” - Satish Kumar*
सलेमपुर दुर्गा विसर्जन 2025 में नरेंद्र मोदी जी के चेहरे वाला पोस्टर नज़र आया, जिस पर लिखा था — “एक रहेंगे तो सेफ रहेंगे।” यह नारा हिंदुओं को टारगेट करके दिया गया, लेकिन असल में समाज को तोड़ने वाला संदेश है। नीचे लिंक या फोटो पर क्लिक करें और पूरा पढ़ें👇

सलेमपुर दुर्गा विसर्जन 2025 में नरेंद्र मोदी जी के चेहरे वाला पोस्टर नज़र आया, जिस पर लिखा था — “एक रहेंगे तो सेफ रहें.....

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26/09/2025

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एक क्रांतिकारी नेता **कॉमरेड सतीश कुमार** की संघर्ष और समाज सेवा की कहानी, किसान-मज़दूर अधिकारों की लड़ाई और जनसेवा .....

27/05/2025

पटरी पर बिछा दर्द का इतिहास: सलेमपुर ओवरब्रिज के नीचे छिपा अन्याय

सलेमपुर शहर की पहचान कभी उसके ओवरब्रिज के नीचे लगी हँसती-मुस्कुराती छोटी दुकानों से होती थी। पटरी व्यापारी – वे जो वर्षों से गर्मी, बरसात और सर्दी की परवाह किए बिना हर सुबह अपनी रोजी-रोटी का ठेला लेकर आते थे। यही वे लोग थे जिन्होंने शहर की धड़कनों को जीवंत रखा, यात्रियों को चाय, कपड़े, फल-सब्ज़ी, बिंदी-सिंदूर और सस्ता सुख दिया। पर आज… आज ओवरब्रिज के नीचे सन्नाटा पसरा है।

वहां अब कोई आवाज नहीं गूंजती, न “भैया देखिए ना सस्ता माल” की पुकार, न किसी बच्चे की खिलखिलाहट, न कोई माँ अपने बेटे से कहती दिखती है “बेटा यहीं से कपड़े ले लो, पैसे बच जाएंगे।” अब वहाँ खड़ी हैं मोटी रेखाएं खींची हुई – पार्किंग की लकीरें। और एक चमचमाता बोर्ड: "पार्किंग -सौजन्य से नगर पालिका"।

पर यह 'सौजन्यता' किसके हिस्से का निवाला छीन कर आई?
वो बूढ़ा दुकानदार जो पिछले 22 साल से वहीं बैठता था, आज अपने तीन बच्चों के साथ फुटपाथ पर बैठा रो रहा है। वह महिला, जिसने अपने पति के गुजर जाने के बाद वहीं कपड़ों की छोटी सी दुकान लगाकर दो बच्चों को पढ़ाया, आज अपनी सूनी आँखों से उस जगह को देख रही है जहाँ उसका सपना उजड़ गया।

नगर पंचायत का निर्णय था - 'शहर को सुंदर बनाना है।'
पर क्या सुंदरता सिर्फ गाड़ियों के लिए जगह बना देने से आती है? क्या इंसानों की तकलीफें विकास की राह में बोझ बन गई हैं? क्या उस पुलिस की लाठी सिर्फ गाड़ियों के लिए रास्ता बनाने को उठती है और गरीबों की चीखें दीवारों से टकराकर लौट जाती हैं?

सच्चाई यह है कि यह सब एक सुनियोजित साजिश का हिस्सा लग रहा है। नगर पंचायत अध्यक्ष की निगरानी में उस जगह को "साफ" किया गया ताकि वहां पार्किंग बनाई जा सके। अब वहां से रोज़ हजारों रुपये की वसूली होती है। लेकिन वह वसूली किसी सरकारी खजाने में जाती है क्या? तो कहा जा रही है, क्या उनके पास जा रही है जिनके लिए एक गरीब का ठेला सिर्फ एक 'अवरोध' था।

जो पटरी व्यवसाई कभी आत्मनिर्भरता का प्रतीक थे, आज भिक्षा की कगार पर हैं। और यह सब सिर्फ इसलिए क्योंकि सरकार को गाड़ियों के लिए छांव चाहिए थी – और गरीबों के सपनों की छाया उन्हें अखर रही थी।

क्या हम इतने अंधे हो गए हैं कि अब इंसानों के आँसू भी दिखाई नहीं देते?
क्या हम इस 'विकास' पर तालियाँ बजाएँ जब वह किसी की रोज़ी रोटी कुचल कर निकले?

सलेमपुर का ओवरब्रिज अब सिर्फ एक ढांचा नहीं है – वह उन सैकड़ों टूटे हुए सपनों का कब्रगाह बन चुका है, जिनकी चीत्कारें हमारे बीच गूंज रही हैं – पर सुनने वाला कोई नहीं।

अब समय है आँखें खोलने का।
क्योंकि कल अगर यह अन्याय आपके दरवाज़े पर आया… तो शायद कोई नहीं होगा जो आपकी आवाज़ बने।

------------------------ MyRevolution.in

26/05/2025

सलेमपुर के पटरी दुकानदार – उजड़ती दुकानों के साथ बुझते चूल्हे

उत्तर प्रदेश के देवरिया ज़िले की सलेमपुर तहसील… जहां कभी सुबह की पहली किरण के साथ ओवरब्रिज के नीचे ज़िंदगी जागती थी। ठेले पर फल, सब्ज़ियाँ, कपड़े, खिलौने — सब कुछ बिकता था। लोग मुस्कुराते थे, ग्राहक आते थे, बच्चों के लिए टॉफियाँ मिलती थीं, बुज़ुर्गों के इलाज के लिए पैसे जुटते थे। पर आज वहाँ सन्नाटा है। वहाँ आज चीखें हैं, आंसू हैं, और टूटती उम्मीदें हैं।

प्रशासन ने "विकास" के नाम पर इन 50-60 दुकानदारों को बेघर कर दिया। और सिर्फ ये नहीं — इनके पीछे हैं लगभग 1500 परिवार, जिनका चूल्हा अब बुझ चुका है। ये वही लोग हैं जिन्होंने नगर पंचायत में पंजीकरण कराया, प्रधानमंत्री स्वनिधि योजना के तहत प्रमाण पत्र पाए — फिर भी न सुना गया, न समझा गया।

एक माँ कहती है — “बेटा बुखार में तप रहा है, दवा के पैसे नहीं हैं। अगर दुकान हट गई तो मर जाएगा।”
एक पिता चुपचाप बैठा है, शायद सोच रहा है — “लोन तो लिया था, अब लौटाएंगे कैसे?”
एक बूढ़ी माँ कांपते हाथों से ठेले का टूटा पहिया उठा रही है — जैसे अपने बेटे का बिखरा भविष्य जोड़ रही हो।

यह सिर्फ दूकानें नहीं थीं, यह रोटियों की फैक्ट्री थी। कोई अपना पेट काटकर बच्चों की किताबें खरीदता था, कोई बेटी की शादी के लिए पैसे जोड़ रहा था। लेकिन आज? आज वही लोग लाठी खा रहे हैं, घसीटे जा रहे हैं, क्योंकि वो “अवैध अतिक्रमण” हैं!

सोचिए, जो सरकार उनके नाम प्रमाण पत्र देती है, योजना में लोन देती है, वही उन्हें जबरन हटवा भी देती है। क्या ये दोहरा मापदंड नहीं? क्या गरीब होना अब अपराध है?

हमें यह समझना होगा — विकास केवल इमारतों से नहीं, इंसानों से होता है। जब सड़कें साफ़ हों, लेकिन दिलों में चीखें हों, तब कोई समाज तरक्कीशुदा नहीं कहलाता।

हर दिन वो दुकानदार अपनी पत्नी, बच्चे और बूढ़े माँ-बाप के साथ उस पुल के नीचे खड़े रहते हैं — एक बार फिर से जगह मिलने की उम्मीद लिए। मगर उम्मीद भी आखिर कब तक जिंदा रहे?

ये लेख सिर्फ आँकड़े नहीं, ये उस वर्ग की चीख है जिसे हमेशा नजरअंदाज किया गया।
यदि आज हम चुप रहे, तो कल और भी चूल्हे बुझेंगे। ज़रूरत है कि हम आवाज़ उठाएं — ताकि सरकार को समझ आए कि फुटपाथ पर भी इंसान रहते हैं, और उनका जीवन भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना किसी मंत्री की मुस्कान।

कभी-कभी सबसे ज़्यादा दर्द वहीं होता है जहाँ सबसे ज़्यादा चुप्पी होती है।

Salempur Deoria (Up)

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