17/03/2026
“दिल्ली मेट्रो में एक छोटी सी बच्ची ने जब अपना नाम बताने से पहले कहा – ‘मैं मुस्लिम हूँ दीदी…’ तो मुझे समझ आया कि हम कैसा समाज बना रहे हैं।
दिल्ली मेट्रो में एक छोटी-सी घटना हुई… लेकिन उसने दिल के अंदर बहुत बड़ा सवाल छोड़ दिया।
मैं मेट्रो में बैठी थी। मेरे हाथ में रुद्राक्ष था।
मेरे बगल वाली सीट पर एक छोटी-सी, बहुत प्यारी और मासूम बच्ची आकर बैठ गई।
बच्चे तो वैसे भी जल्दी घुल-मिल जाते हैं…
वो मुझे देख-देखकर मुस्कुरा रही थी, तो मैंने भी उससे बात शुरू कर दी।
मैंने प्यार से पूछा,
“तुम्हारा नाम क्या है?”
अभी तक जो बच्ची खिलखिला रही थी…
अचानक उसकी मुस्कान गायब हो गई।
उसने नज़रें झुका लीं… थोड़ी देर चुप रही।
मैंने पूछा,
“क्या हुआ?”
धीरे से बोली—
“मैं… मुस्लिम हूँ दीदी।”
उसकी आवाज़ में एक अजीब-सा डर था।
जैसे उसे लगा हो कि अगर उसने अपना मुस्लिम नाम बताया…
तो शायद मेरे चेहरे के भाव बदल जाएंगे।
शायद मैं उससे उतने प्यार से बात नहीं करूँगी।
और उस पल मुझे लगा…
हमने ये कैसा समाज बना दिया है?
जहाँ एक छोटी-सी बच्ची को अपना नाम बताने से पहले डर लगे…
जहाँ उसे लगे कि सामने बैठा इंसान उसके धर्म से तय करेगा कि उससे कैसे पेश आना है।
मुझे उस पल ये साबित करने की जरूरत महसूस हुई कि—
मैं उन लोगों जैसी “हिंदू” नहीं हूँ जो किसी मुस्लिम से नफरत करते हैं।
मेरे माँ-बाप ने मुझे ऐसे संस्कार नहीं दिए
कि मैं किसी इंसान को उसके धर्म से तौलूँ।
वो बच्ची कुछ देर बाद फिर मुस्कुराने लगी…
और हम दोनों फिर से बातें करने लगे।
लेकिन उसके उस एक वाक्य ने मेरे दिल में एक सवाल छोड़ दिया—
क्या हमने सच में बच्चों तक को हिंदू-मुस्लिम के डर में जीना सिखा दिया है?
— पल्लवी दुबे