30/08/2026
*श्रीराम जाटव के संघर्ष को याद रखो—समाज अपने संघर्षशील योद्धाओं को न भूले* 30 वर्ष जीवन के जेल की काल कोठरी में गुजारना ये किसी तपस्या से कम नहीं है......
श्रीराम जाटव/चमार, अहीरवार, कुरील, संखवार, बैरवा, बाल्मीकि —आप उन्हें जिस नाम से जानते हों, लेकिन उनके संघर्ष और त्याग को जरूर याद रखिए।
*खासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोगों को यह जानना चाहिए कि मेरठ की धरती पर एक ऐसा संघर्ष हुआ, जिसमें श्रीराम जाटव ने समाज के सम्मान, स्वाभिमान और अधिकारों के लिए अपनी जवानी के लगभग 30 वर्ष जेल में गुजार दिए।*
*सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस समाज के लिए उन्होंने अपना जीवन खपा दिया, उसी समाज में आज बड़े-बड़े अधिकारी हैं, मंत्री हैं, संपन्न लोग हैं—लेकिन कितने लोगों ने यह जानने की कोशिश की कि श्रीराम जाटव और उनका परिवार किस हाल में है?*
उनके संघर्ष की कीमत उनके परिवार ने भी चुकाई। जमीन-जायदाद चली गई, बच्चे कठिन परिस्थितियों में जीवन जीने को मजबूर हुए और वर्षों तक समाज की ओर से वह सहयोग नहीं मिला जिसके वे हकदार थे।
लेकिन संघर्ष कभी व्यर्थ नहीं जाता।
*विजय कुमार जाटव जी* और उनकी टीम ने इस मुद्दे को दोबारा उठाया। लगातार प्रयास हुए। कभी लखनऊ, कभी आगरा, कभी इलाहाबाद और अन्य स्थानों पर कानूनी लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए प्रयास किए गए। अनेक सहयोगियों, कानून के जानकारों और अधिवक्ताओं ने साथ दिया।
लंबे संघर्ष के बाद श्रीराम जाटव को जेल से बाहर लाने का प्रयास सफल हुआ। यह केवल एक व्यक्ति की रिहाई नहीं, बल्कि उस संघर्ष की जीत है जिसे वर्षों तक भुला दिया गया था।
अब असली जिम्मेदारी समाज की है।
जिस व्यक्ति ने समाज के सम्मान के लिए अपने जीवन के 30 वर्ष खो दिए, उसके परिवार को अकेला छोड़ देना किसी भी समाज की मजबूती का प्रमाण नहीं हो सकता।
हमें श्रीराम जाटव और उनके परिवार को सम्मान, सहयोग और आर्थिक मजबूती देने के लिए आगे आना चाहिए।
क्योंकि सवाल सिर्फ श्रीराम जाटव का नहीं है—
सवाल यह है कि जब अगली बार कोई व्यक्ति समाज के अन्याय के खिलाफ खड़ा होगा, तो क्या समाज उसके साथ खड़ा होगा?
संघर्ष करने वालों की हार नहीं होती।
देर हो सकती है, लेकिन संघर्ष रंग जरूर लाता है।
आइए, अपने संघर्षशील लोगों को याद करें, उनके परिवारों का साथ दें और समाज में ऐसी एकजुटता पैदा करें कि कोई भी व्यक्ति अपने संघर्ष में खुद को अकेला महसूस न करें!