08/05/2026
समाज की भलाई के लिए खल-वंदना भी करें।
“खल” अर्थात् दुष्ट , कपटी , ईर्ष्यालु , दूसरों के सुख से दुखी और दूसरों के दुख से सुखी होने वाला प्राणी। और “वंदना” अर्थात् प्रणाम , स्तुति या सम्मान। अब पहली नज़र में यह बड़ा विचित्र लगता है कि भला दुष्टों की वंदना क्यों ? सज्जनों की वंदना समझ में आती है , देवताओं की वंदना भी उचित है , पर खल-वंदना ? यह तो ऐसा हुआ जैसे मच्छरों को धन्यवाद देना कि वे रात भर हमें जगाकर योगाभ्यास करवा रहे हैं!
परंतु भारतीय काव्य-परंपरा बड़ी गूढ़ है। यहाँ व्यंग्य भी है , नीति भी है और अनुभव का निचोड़ भी। विशेषतः गोस्वामी तुलसीदास ने “रामचरितमानस” में खल-वंदना करके यह सिद्ध कर दिया कि जीवन का सबसे बड़ा शिक्षक कभी-कभी सज्जन नहीं , दुष्ट ही होते हैं।
खल-वंदना क्यों ?
दुष्ट व्यक्ति समाज का “अनचाहा अलार्म सिस्टम” है।
वह हमें सावधान रहना सिखाता है।
सज्जन व्यक्ति हमें प्रेम देता है ,
पर खल व्यक्ति हमें “पासवर्ड बदलना” सिखाता है।
सज्जन कहता है -
“भाई , सब अच्छा होगा।”
खल कहता है—
“देख लेना , मैं कुछ न कुछ गड़बड़ जरूर करूँगा।”
और आश्चर्य यह कि दूसरे की बात ही अधिक सत्य निकलती है !
इसलिए खल-वंदना वास्तव में दुष्ट की प्रशंसा नहीं , बल्कि उसकी उपयोगिता की स्वीकृति है।
खल व्यक्ति बड़ा परोपकारी होता है -
स्वयं जलता है और दूसरों को भी जलाता है।
उसे आपकी उन्नति देखकर इतना कष्ट होता है कि वह बिना डॉक्टर की सलाह के ही रातभर करवटें बदलता रहता है।
आपकी सफलता उसके लिए वैसा ही आघात है जैसा विद्यार्थी के लिए “कल परीक्षा है” का संदेश।
यदि आपने सामूहिक कन्या विवाह में उपहार दिए हैं तो वह बोलेगा , “अच्छा है नम्बर दो की कमाई बहुत होगी न ?”
यदि आपने पुरस्कार पाया है तो वह कुटिलता पूर्वक मुस्कुराएगा, “अरे , आजकल तो सब सेटिंग से ही होता है।”
अब ऐसे महान आत्माओं को प्रणाम न करें तो क्या करें ?
समाज में तो खल व्यक्ति नमक की तरह है - अधिक हो जाए तो भोजन बिगड़ जाए ,
यदि बिल्कुल भी न हो तो स्वाद फीका लगे।
अर्थात यदि संसार में केवल सज्जन ही होते ,
तो “सावधान” शब्द शब्दकोश से हीं गायब हो जाता।
न कोई राजनीति रोचक होती ,
न कोई दफ्तर रोमांचक ,
न पड़ोस की चर्चा में रस आता।
खल व्यक्ति ही समाज को “कथानक” देता है।
रामायण में यदि रावण न होता ,
तो कथा इतनी विराट कैसे बनती ?
महाभारत में यदि दुर्योधन न होता ,
तो नीति-शिक्षा किससे मिलती ?
अतः खल व्यक्ति कथा का विलेन ही नहीं , कथानक का इंजन भी होता है।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने खल-वंदना इसलिए की क्योंकि दुष्ट व्यक्ति बिना बुलाए आलोचक होता है।
वह आपके दोष ढूँढने में इतनी मेहनत करता है कि जितनी आप गुण बनाने में भी नहीं करते।
वह आपकी पीठ पीछे चर्चा करता है
अर्थात् आपकी “मुफ़्त पब्लिसिटी” करता है।
वह आपको नीचा दिखाने का प्रयास करता है
अर्थात् आपको ऊँचा उठने की प्रेरणा देता है।
इस प्रकार खल व्यक्ति अनजाने में आपका चरित्र-निर्माण ही करता है।
वह आपका शत्रु कम, निजी प्रशिक्षक अधिक होता है।
खल-वंदना हमें तीन बातें सिखाती है
(1) सजग रहो
हर मुस्कान मित्रता नहीं होती।
(2) धैर्य रखो
क्योंकि दुष्ट का काम है कहना
और बुद्धिमान का काम है समझना।
(3) विनम्र रहो
क्योंकि कभी-कभी हम स्वयं भी किसी और की कहानी में “खल पात्र” हो सकते हैं , मेरा प्रत्यक्ष अनुभव सबके सम्मुख है।
यह विचार मनुष्य को अहंकार से बचाता है।
आज के समय में खल व्यक्ति कई रूपों में मिलते हैं -
समाजसेवक के रूप में ,
ऑफिस के सहकर्मी रूप में ,
रिश्तेदारी के विशेषज्ञ रूप में ,
सोशल मीडिया के टिप्पणी-वीर रूप में ,
पड़ोस के समाचार चैनल रूप में
और व्हाट्सऐप विश्वविद्यालय के कुलपति रूप में।
इन सबकी वंदना आवश्यक है ,
क्योंकि ये हमें मानसिक रूप से इतना मजबूत बना देते हैं कि फिर जीवन की असली समस्याएँ भी छोटी लगने लगती हैं।
कुल मिलाकर खल-वंदना का अर्थ दुष्टता का सम्मान नहीं ,
बल्कि अनुभव का सम्मान है।
दुष्ट व्यक्ति हमें विवेक देता है ,
सावधानी देता है ,
आत्मबल देता है
और कभी-कभी अच्छे व्यंग्य लेख लिखने की सामग्री भी देता है।
अतः कहा जा सकता है कि सज्जन हमें जीना सिखाते हैं और खल हमें बचकर जीना सिखाते हैं।
इसलिए खल को प्रणाम करना उसकी महानता नहीं बल्कि आपकी अपनी समझदारी का प्रमाण है।
सच्चाई यह है कि
जिस दिन आपके विरोधी बढ़ जाएँ तो समझ लीजिए आप कुछ अच्छा कर रहे हैं !