03/11/2025
कई सालों से मैं महिला क्रिकेट को देखता आया हूँ। जब टीवी पर “India Women vs Australia Women” या “India’s Women Semi Final” लिखा दिखता था, तो जोश के साथ चैनल ऑन करता था। लेकिन जैसे ही लोग देखते कि ये महिला क्रिकेट है, तो कहते—"अरे ये तो लड़कियों का है"—और चैनल बदल देते या अपने काम में लग जाते।
मुझे आज भी याद है, 2017 का वो फाइनल जब मैं बेंगलुरु से दिल्ली ट्रेन में सफर कर रहा था। नेटवर्क बहुत कमजोर था, इसलिए हर ओवर का अपडेट गूगल पर देख रहा था। 3-4 ओवर में 20 रन चाहिए थे, रन रेट 6 से भी कम, 3-4 विकेट बचे थे। लगा जीत पक्की है। कुछ मिनट बाद जब कहा "हार गए", तो लोगों ने कहा—“लड़कियाँ थीं, इसलिए।” कितनी आसानी से एक कठिन लड़ाई को लिंगभेद में बाँट दिया जाता है, जबकि पुरुष क्रिकेट में वही हार किसी खिलाड़ी के खराब दिन या गलती पर डाल दी जाती है।
मैं खेलों में थोड़ा अंधविश्वासी हूँ, इसलिए ऑस्ट्रेलिया पर भारत की ऐतिहासिक रन चेज़ के बाद भी कुछ नहीं लिखा। मन में बस यही डर था कि कहीं दक्षिण अफ्रीका की महिला टीम, पुरुष टीम की हार का बदला न ले ले।
परंतु इस बार की यात्रा—शानदार शुरुआत, फिर लगातार तीन हार, उसके बाद न्यूज़ीलैंड पर निर्णायक जीत और अंत में यह ऐतिहासिक मुकाम—सिर्फ एक टूर्नामेंट की जीत नहीं, बल्कि वर्षों के संघर्ष, समर्पण और आत्मविश्वास की विजय है।
झूलन गोस्वामी जैसी महान गेंदबाज़, जो आज भी ODI की सर्वाधिक विकेट लेने वाली खिलाड़ी हैं, और दीप्ति शर्मा जैसी ऑलराउंडर जिन्होंने एक ही टूर्नामेंट में 200+ रन और 20+ विकेट लिए—इन सबने यह साबित कर दिया कि प्रतिभा का कोई लिंग नहीं होता।
आज यह जीत सिर्फ क्रिकेट की नहीं, बल्कि उन लाखों बेटियों की है जो सपने देखने की हिम्मत रखती हैं और उन्हें पूरा करने का साहस भी।
हर बेटी में एक नई सुबह का प्रकाश छिपा है, बस जरूरत है उसके उड़ान पर भरोसा करने की।
सभी खिलाड़ियों को हार्दिक बधाई।
आप सिर्फ मैच नहीं जीतीं, आपने देश का दिल जीत लिया।
जय हिन्द 🇮🇳