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इसे सेव कर सुरक्षित कर लें, ऐसी पोस्ट कम ही आती है..मानव शरीर में सप्तचक्रों के प्रभाव का रहस्य...अंत तक जरुर पढ़े🧵1. मू...
23/01/2026

इसे सेव कर सुरक्षित कर लें, ऐसी पोस्ट कम ही आती है..

मानव शरीर में सप्तचक्रों के प्रभाव का रहस्य...अंत तक जरुर पढ़े🧵
1. मूलाधारचक्र :
यह शरीर का पहला चक्र है। गुदा और लिंग के बीच 4 पंखुरियों वाला यह 'आधार चक्र' है। 99.9% लोगों की चेतना इसी चक्र पर अटकी रहती है और वे इसी चक्र में रहकर मर जाते हैं। जिनके जीवन में भोग, संभोग और निद्रा की प्रधानता है उनकी ऊर्जा इसी चक्र के आसपास एकत्रित रहती है।

मंत्र : लं
चक्र जगाने की विधि : मनुष्य तब तक पशुवत है, जब तक कि वह इस चक्र में जी रहा है इसीलिए भोग, निद्रा और संभोग पर संयम रखते हुए इस चक्र पर लगातार ध्यान लगाने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है। इसको जाग्रत करने का दूसरा नियम है- यम और नियम का पालन करते हुए साक्षी भाव में रहना।

प्रभाव : इस चक्र के जाग्रत होने पर व्यक्ति के भीतर वीरता, निर्भीकता और आनंद का भाव जाग्रत हो जाता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए वीरता, निर्भीकता और जागरूकता का होना जरूरी है।
2. स्वाधिष्ठानचक्र-

यह वह चक्र है, जो लिंग मूल से 4 अंगुल ऊपर स्थित है जिसकी 6 पंखुरियां हैं। अगर आपकी ऊर्जा इस चक्र पर ही एकत्रित है तो आपके जीवन में आमोद-प्रमोद, मनोरंजन, घूमना-फिरना और मौज-मस्ती करने की प्रधानता रहेगी। यह सब करते हुए ही आपका जीवन कब व्यतीत हो जाएगा आपको पता भी नहीं चलेगा और हाथ फिर भी खाली रह जाएंगे।

मंत्र : वं

कैसे जाग्रत करें : जीवन में मनोरंजन जरूरी है, लेकिन मनोरंजन की आदत नहीं। मनोरंजन भी व्यक्ति की चेतना को बेहोशी में धकेलता है। फिल्म सच्ची नहीं होती लेकिन उससे जुड़कर आप जो अनुभव करते हैं वह आपके बेहोश जीवन जीने का प्रमाण है। नाटक और मनोरंजन सच नहीं होते।
प्रभाव : इसके जाग्रत होने पर क्रूरता, गर्व, आलस्य, प्रमाद, अवज्ञा, अविश्वास आदि दुर्गणों का नाश

होता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए जरूरी है कि उक्त सारे दुर्गुण समाप्त हों तभी सिद्धियां आपका द्वार खटखटाएंगी।

3. मणिपुरचक्र :

नाभि के मूल में स्थित यह शरीर के अंतर्गत मणिपुर नामक तीसरा चक्र है, जो 10 कमल पंखुरियों से युक्त है। जिस व्यक्ति की चेतना या ऊर्जा यहां एकत्रित है उसे काम करने की धुन-सी रहती है। ऐसे लोगों को कर्मयोगी कहते हैं। ये लोग दुनिया का हर कार्य करने के लिए तैयार रहते हैं।
मंत्र : रं

कैसे जाग्रत करें : आपके कार्य को सकारात्मक आयाम देने के लिए इस चक्र पर ध्यान लगाएंगे। पेट से श्वास लें।
प्रभाव : इसके सक्रिय होने से तृष्णा, ईर्ष्या, चुगली, लज्जा, भय, घृणा, मोह आदि कषाय-कल्मष दूर हो जाते हैं। यह चक्र मूल रूप से आत्मशक्ति प्रदान करता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए आत्मवान होना जरूरी है। आत्मवान होने के लिए यह अनुभव करना जरूरी है कि आप शरीर नहीं, आत्मा हैं।
आत्मशक्ति, आत्मबल और आत्मसम्मान के साथ जीवन का कोई भी लक्ष्य दुर्लभ नहीं।

4. अनाहतचक्र-

हृदयस्थल में स्थित द्वादश दल कमल की पंखुड़ियों से युक्त द्वादश स्वर्णाक्षरों से सुशोभित चक्र ही अनाहत चक्र है। अगर आपकी ऊर्जा अनाहत में सक्रिय है तो आप एक सृजनशील व्यक्ति होंगे। हर क्षण आप कुछ न कुछ नया रचने की सोचते हैं। आप चित्रकार, कवि, कहानीकार, इंजीनियर आदि हो सकते हैं।

मंत्र : यं

कैसे जाग्रत करें : हृदय पर संयम करने और ध्यान लगाने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है। खासकर रात्रि को सोने से पूर्व इस चक्र पर ध्यान लगाने से यह अभ्यास से जाग्रत होने लगता है और सुषुम्ना इस चक्र को भेदकर ऊपर गमन करने लगती है।

प्रभाव : इसके सक्रिय होने पर लिप्सा, कपट, हिंसा, कुतर्क, चिंता, मोह, दंभ, अविवेक और अहंकार समाप्त हो जाते हैं। इस चक्र के जाग्रत होने से व्यक्ति के भीतर प्रेम और संवेदना का जागरण होता है। इसके जाग्रत होने पर व्यक्ति के समय ज्ञान स्वत: ही प्रकट होने लगता है। व्यक्ति अत्यंत आत्मविश्वस्त, सुरक्षित, चारित्रिक रूप से जिम्मेदार एवं भावनात्मक रूप से संतुलित व्यक्तित्व बन जाता है। ऐसा व्यक्ति अत्यंत हितैषी एवं बिना किसी स्वार्थ के मानवता प्रेमी एवं सर्वप्रिय बन जाता है।

5. विशुद्धचक्र-

कंठ में सरस्वती का स्थान है, जहां विशुद्ध चक्र है और जो 16 पंखुरियों वाला है। सामान्य तौर पर यदि आपकी ऊर्जा इस चक्र के आसपास एकत्रित है तो आप अति शक्तिशाली होंगे।

मंत्र : हं

सक्रिय है तो ऐसा व्यक्ति बौद्धिक रूप से संपन्न, संवेदनशील और तेज दिमाग का बन जाता है लेकिन वह सब कुछ जानने के बावजूद मौन रहता है। इसे बौद्धिक सिद्धि कहते हैं।

मंत्र : उ

कैसे जाग्रत करें : भृकुटी के मध्य ध्यान लगाते हुए साक्षी भाव में रहने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है।

प्रभाव : यहां अपार शक्तियां और सिद्धियां निवास करती हैं। इस आज्ञा चक्र का जागरण होने से ये सभी शक्तियां जाग पड़ती हैं और व्यक्ति सिद्धपुरुष बन जाता है।

7. सहस्रारचक्र :

सहस्रार की स्थिति मस्तिष्क के मध्य भाग में है अर्थात जहां चोटी रखते हैं। यदि व्यक्ति यम, नियम का पालन करते हुए यहां तक पहुंच गया है तो वह आनंदमय शरीर में स्थित हो गया है। ऐसे व्यक्ति को संसार, संन्यास और सिद्धियों से कोई मतलब नहीं रहता है।

मंत्र : ॐ

कैसे जाग्रत करें : मूलाधार से होते हुए ही सहस्रार तक पहुंचा जा सकता है। लगातार ध्यान करते रहने से यह चक्र जाग्रत हो जाता है और व्यक्ति परमहंस के पद को प्राप्त कर लेता है।

प्रभाव : शरीर संरचना में इस स्थान पर अनेक महत्वपूर्ण विद्युतीय और जैवीय विद्युत का संग्रह है। यही मोक्ष का द्वार है।
राधे राधे 🙏🌹🙏

31/12/2025

अत्यधिक ठंड को देखते हुए 1 जनवरी से 3 जनवरी 2025 तक जिले के सभी विद्यालयों और कोचिंग संस्थानों में शैक्षणिक गतिविधि प्रतिबंधित रहेंगे.
आदेशानुसार,
डीएम, सीतामढ़ी.

31/12/2025
अत्यधिक ठंड को देखते हुए सीतामढ़ी के सभी सरकारी और गैर सरकारी विद्यालय और कोचिंग संस्थान में 25 दिसंबर से 28 दिसंबर 2025 ...
25/12/2025

अत्यधिक ठंड को देखते हुए सीतामढ़ी के सभी सरकारी और गैर सरकारी विद्यालय और कोचिंग संस्थान में 25 दिसंबर से 28 दिसंबर 2025 तक शैक्षणिक गतिविधि प्रतिबंधित रहेंगे ❤️

आदेशानुसार :
DM, Sitamarhi

अत्यधिक ठंड को देखते हुए सीतामढ़ी के सभी विद्यालय 24 दिसंबर 2025 तक बंद रहेंगे ❤️आदेशानुसार DM, Sitamarhi
21/12/2025

अत्यधिक ठंड को देखते हुए सीतामढ़ी के सभी विद्यालय 24 दिसंबर 2025 तक बंद रहेंगे ❤️

आदेशानुसार
DM, Sitamarhi

कैसे विधवा हुई धरती माता?〰️〰️🌼〰️🌼〰️🌼〰️〰️पौराणिक कथाओं के अनुसार, धरती माता (पृथ्वी) के विधवा होने की कहानी द्यौस (आकाश) ...
20/12/2025

कैसे विधवा हुई धरती माता?
〰️〰️🌼〰️🌼〰️🌼〰️〰️
पौराणिक कथाओं के अनुसार, धरती माता (पृथ्वी) के विधवा होने की कहानी द्यौस (आकाश) और इंद्रदेव से जुड़ी है. यह जोड़ी है धरती-आसमान की, यह कहानी है पृथ्वी और द्यौस की। पृथ्वी अर्थात धरती, द्यौस मतलब आसमान। द्यौस पृथ्वी के कई बच्चे है, जैसे अग्नि, उषा, निशा, इंद्र, चंद्र। अग्नि का प्रभाव पृथ्वी के गर्भ में दिखाई पड़ता है, जहां पृथ्वी के गर्भ में आग का अस्तित्व है, उषा मतलब दिन और निशा का अर्थ है रात, तथा इंद्र और चंद्र भी द्यौस-पृथ्वी की संताने है। इस कथा में हम जानेंगे की कैसे इंद्रदेव ने अपने ही पिता द्यौस की हत्या कर के अपनी ही माँ पृथ्वी #(धरती माँ) को विधवा कर दिया। तो एक बार की बात है, जब धरती माँ पाँचवी बार गर्भवती थी। धरती देवी के पेट में इंद्रदेव पल रहे थे। ऐसे ही कुछ दिन बीत गए, अब इंद्रदेव के जन्म के दिन पास आ गए, फिर भी अभी इंद्रदेव जन्म लेने के लिए पूरी तरह से विकसित नहीं थे, ऐसा होने पर भी वह बार-बार धरती के पेट पर अंदर से प्रहार कर रहे थे, इससे धरती माँ को बहुत पीड़ा हो रही थी। तब धरती का आक्रोश सुनकर भगवान द्यौस #(आसमान) चिंतित हुए और उन्होंने धरती के पेट पर हाथ रख दिए और #इंद्र को बाहर निकलने से रोकने लगे, मगर इंद्र की शक्ति के आगे द्यौस पिता की कुछ ना चली। इंद्र ने अंतिम बार जोर देते हुए धरती का पेट फाड दिया और समय से पहले धरती के गर्भ से बाहर निकल आया। और बाहर आते ही वह शिशु अवस्था से युवा अवस्था में परिवर्तित हो गया। इसके बाद वह अपने ही पिता द्यौस से युद्ध करने लगा। भगवान द्यौस ने इंद्र को बहुत समझाया पर वह नहीं माना और वह द्यौसदेव पर प्रहार करता रहा। उनके बीच बहुत दिन युद्ध चला, फिर अंत में भगवान द्यौस की शक्ति क्षीण हो गई, वह इंद्र के विरुद्ध युद्ध में कमज़ोर पड़ने लगे। वह इंद्र को रोकने लगे परंतु द्यौस अब कमज़ोर हो गए थे। इसी अवसर का फायदा उठाकर इंद्र ने पिता द्यौस पर जोरदार प्रहार किया जिससे भगवान द्यौस धराशाही हो गए, उनकी आख़री साँसे शुरू हो गई, धरती देवी उनके पास आई और रोने लगी, ज्वालामुखीयों से निकलकर अग्नि भी उनके पास आया और उषा, निशा भी प्रस्तुत हुई, भगवान #द्यौस को लेटा देखकर सभी की आँखें नम हो गई, बस उस कपटी, पापी इंद्र को छोड़कर, जिसके कारण भगवान द्यौस का यह हाल था। इंद्र को अपने किए पर जरा भी पछतावा नहीं था, वह तो द्यौस को हराकर शैतानी हंसी हंस रहा था। भगवान द्यौस ने आखरी सांस लेते हुए धरती देवी के सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया और उसके बाद उनका हाथ धरती देवी के माथे से फिसल गया इस से धरती माँ का सिंदूर मिट गया, हां... भगवान द्यौसदेव अब हमेशा हमेशा के लिए इस दुनिया से जा चुके थे, इस तरह धरती आसमान एक दूसरे से हमेशा के लिए दूर हो गए। भगवान द्यौस की मृत्यु के बाद धरती अब सदैव के लिए एक विधवा बनकर रह गई। फिर भी धरती माँ अपने कर्तव्य को नहीं भूली, तब से वह बिना रुके लगातार भगवान #सूर्यदेव की परिक्रमा कर रही है और धरतीवासियों का पोषण भी कर रही हैं।
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