11/06/2026
अजीब विडंबना है कि जब कोई बड़ा नेता अकेले कई राज्यों की राजनीति प्रभावित करता है, सरकारें गिरती हैं, समीकरण बदलते हैं, तब शायद ही कोई यह कहता है कि "इनकी वजह से हम चुनाव हार गए।"
लेकिन जैसे ही कोई मुस्लिम नेता या उम्मीदवार चुनावी मैदान में उतरता है, हार का पूरा ठीकरा उसी के सिर पर फोड़ दिया जाता है। हार के असली कारणों—कमजोर संगठन, गलत रणनीति, जनता से दूरी, नेतृत्व की विफलता और विकास के मुद्दों पर चुप्पी—पर चर्चा करने के बजाय आसान रास्ता चुन लिया जाता है और दोष किसी एक समुदाय के नेता पर डाल दिया जाता है।
लोकतंत्र में हर नागरिक को चुनाव लड़ने और अपनी राजनीतिक भागीदारी सुनिश्चित करने का समान अधिकार है। यदि किसी समुदाय का उम्मीदवार चुनाव लड़ता है, तो उसे हार-जीत का अकेला जिम्मेदार ठहराना न केवल लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है बल्कि यह दोहरे मापदंड को भी उजागर करता है।
जरूरत इस बात की है कि हम व्यक्तियों और समुदायों को दोष देने के बजाय राजनीति की वास्तविक समस्याओं पर चर्चा करें। आखिर कब तक हार का बहाना ढूंढा जाएगा और आत्ममंथन से बचा जाएगा?
सवाल सिर्फ इतना है—क्या लोकतंत्र में सभी के लिए एक ही पैमाना होना चाहिए, या फिर अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग नियम?
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