26/07/2025
“हादसों के बाद संवेदनाएं, लेकिन सवालों का कब जवाब मिलेगा?”
हर बार जब कोई दर्दनाक हादसा होता है, तो हम एक जैसे दृश्य दोहराते देखते हैं — मीडिया ब्रेकिंग न्यूज चलाता है, नेता संवेदनाएं व्यक्त करते हैं, और सोशल मीडिया पर शोक की लहर दौड़ जाती है। फिर कुछ दिन बाद सबकुछ सामान्य हो जाता है, जैसे कुछ हुआ ही न हो।
झालावाड़ हादसा भी इससे अलग नहीं है। हादसे के बाद नेता पहुंचे, मीडिया कवरेज हुआ, संवेदना की औपचारिकताएं निभाई गईं। लेकिन यह सवाल अब भी हवा में तैर रहा है — क्या ये हादसा रोका जा सकता था? और इसका सबसे स्पष्ट जवाब है, हां।
एक प्रतिष्ठित अख़बार की रिपोर्ट बताती है कि विधानसभा के तीसरे सत्र (31 जनवरी से 24 मार्च) के दौरान शिक्षा विभाग से स्कूलों की मरम्मत को लेकर आठ विधायकों ने तारांकित प्रश्न किए। लेकिन शर्मनाक यह है कि एक भी सवाल का जवाब शिक्षा विभाग ने नहीं दिया। यह तथ्य एक छोटे से कॉलम में छपा, शायद इसलिए क्योंकि इसमें संवेदना नहीं, सिर्फ सच्चाई थी।
अगर यही बात उस समय सुर्खियों में होती, अखबार के पहले पन्ने पर बड़ी हेडलाइन बनती, तो शायद सरकार और प्रशासन को कुछ करने की प्रेरणा मिलती। लेकिन हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं, जहां एक मंत्री के शोक व्यक्त करने की खबर 'बड़ी' बनती है, और जनता की सुरक्षा से जुड़ा सवाल 'छोटा'।
शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने हाल ही में बयान दिया कि पिछली सरकार ने स्कूलों की स्थिति सुधारने के लिए कुछ नहीं किया। लेकिन मंत्री जी भूल गए कि अब आपकी सरकार को सत्ता में आए 1.5 साल से ज्यादा का समय हो चुका है। अगर पिछली सरकार ने कुछ नहीं किया, तो आपने क्या किया?
दुर्भाग्य यह है कि हादसे के बाद नेता एक-दूसरे पर दोष मढ़ते हैं, वर्तमान सरकार पूर्ववर्ती सरकार को और पूर्व सरकार वर्तमान शासन को। इस पूरे खेल में केवल एक चीज गायब होती है, 'जवाबदेही'। वैसे जवाबदेही में शिक्षा मंत्री ने कहा जिम्मेदारी मैं लेता हूँ पर इस्तीफे की बात पर मुख्यमंत्री पर फैसला छोड़ दिया, महोदय इस्तीफे का लेटर आपकी तरफ से जाएगा, आपके लैटर हेड से आपके हस्ताक्षर होंगे फिर मुख्यमंत्री पर फैसला मत छोड़िये। बयानबाजी वाले जिम्मेदार नहीं असली जिम्मेदार बनिए।
आज कई नेता झालावाड़ पहुंचे, तस्वीरें खिंचवाईं, पोस्टें डालीं। लेकिन मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि उन नेताओं की विधानसभा की सीमा के 100 किलोमीटर के दायरे में कोई न कोई स्कूल असामान्य स्थिति में होगा, कहीं छत जर्जर होगी, कहीं दीवारें गिरने को होंगी, कहीं फर्श टूटे होंगे। लेकिन वहां जाने का समय नहीं है, क्योंकि वहां हादसा अभी नहीं हुआ है।
और सच तो यह है कि दोष किसी नेता का नहीं, किसी अफसर का नहीं... दोष हमारा है।
हमें नेताओं की संवेदना से तसल्ली हो जाती है, हम मीडिया की "कवरेज" से सहानुभूति महसूस कर लेते हैं। हम सवाल पूछना भूल गए हैं, हम जवाब मांगना छोड़ चुके हैं। माफी, हम सवाल पूछते है लेकिन बस सोशल मीडिया, फेसबुक या X पर ट्रेंड चलाकर, उस ट्रेंड से नेता भी चमक जाता है, जमीन स्तर पर हमारी चुप्पी वैसी ही बनी रहती है जैसे हमने मौन व्रत कर रखा है, यही चुप्पी, यही सहनशीलता हमारे लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुकी है।
जब तक हादसे की प्रतीक्षा की जाएगी, सुधार नहीं होगा। और जब तक सुधार नहीं होगा, संवेदनाएं ही शासकों की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी बनी रहेंगी।
― राम चौधरी
#झालावाड़