17/02/2026
समाज का मिलिंद प्रश्न -
हॅलो सर
मेरा नाम धम्मदीप है। मेरे पास कुछ प्रश्न है और मैं प्रश्नों के कारण में पढ़ाई पर फोकस नहीं कर पा रहा हूॅं। क्या आप मुझे मेरे प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं?
प्रश्न -क्या बी आर आंबेडकर बुद्धिज़्म के देव या ३१ लोक पर विश्वास रखते थे?
उत्तर-
जय भीम,धम्मदीप,
आपसे जुड़कर ख़ुशी हुई। यह जानकर अच्छा लगा कि आप अपनी पढ़ाई को लेकर गंभीर हैं। मन में जब इस तरह के गहरे सवाल होते हैं, तो एकाग्रता (focus) में कमी आना स्वाभाविक है। चलिए, आपके संशय को दूर करते हैं ताकि आप वापस अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे सकें।
डॉ. बी.आर. आंबेडकर देव या 31 लोक पर विश्वास रखते थे या नहीं, इसके उत्तर से आपकी कोई दु:ख मुक्ति होने वाली नहीं। आप दु:ख मुक्त होकर सुखी जीवन बिताने की पढ़ाई करो और उसी तरह जीवन बिताओं।
पहले तो बाबासाहब का बुद्धिज़्म भगवान बुद्ध के शिक्षा से अलग मानना गलत है। कोई भी भेद निर्माण करना भगवान बुद्ध की शिक्षा नहीं हो सकती।
मैं आपको आधुनिक बुद्ध बाबासाहेब
डॉ. बी.आर. आंबेडकर के संदर्भ और भाषा में उत्तर देना चाहता हूं।
भगवान बुद्ध और उनका धम्म खंड 4 भाग 2 विभाग 5 में भ्रम के कारण
में बाबा साहब लिखते हैं,
6- भगवान बुद्ध के के जीवन काल में ही कई बार उनके वचनों के गलत प्रस्तुतीकरण की जानकारी उनको दी गई।
7-उदाहरण के तौर पर ऐसे पांच अवसरों का उल्लेख किया जा सकता है। एक का उल्लेख अलगद्दपम सुत्त में आया है, दूसरे का महाकम्मविभंग सुत्त में, तीसरे का कण्णकट्ठल सुत्त में, चौथे का महातण्हा-सांख्य सुत्र में और पांचवे का जीवक सुत्त में।
8-शायद इस तरह के और भी अनेक अवसरों पर तथागत के वचनों का गलत प्रस्तुतीकरण किया गया हो, क्योंकि हम देखते हैं कि भिक्खू भी भगवान बुद्ध के पास गए और प्रश्न किया कि ऐसी स्थिति में उन्हें क्या करना चाहिए।
9. 'कर्म' और 'पुनर्जन्म' के बारे में बुद्ध वचनों के गलत प्रस्तुतीकरण के अवसर सामान्य बात है।
10. इन सिद्धांतों को ब्राह्मणी 'धर्म' में भी स्थान प्राप्त है। परिणामस्वरूप भाणकों के लिए ब्राह्मणी मत को बौद्ध धम्म में सम्मिलित कर लेना सुगम था।
11. इसलिए त्रिपिटक में जिसे भी 'बुद्ध-वचन' के रूप में माना गया है, उसे स्वीकार करने में बहुत सावधानी की आवश्यकता है।
12. लेकिन इसके लिए एक कसौटी उपलब्ध है।
13. यदि कोई ऐसी बात है जिसके बारे में विश्वास के साथ कहा जा सकता है तो वह यह है कि उनका कोई महत्त्व नहीं होता यदि उनका कथन बुद्धिसंगत, तर्कसंगत नहीं होता। इसलिए जो कुछ भी बुद्धिसंगत और तर्कसंगत है, अन्य बातें समान होते हुए, उसे 'बुद्ध-वचन' के रूप में लिया जा सकता है।
14. दूसरी बात यह है कि भगवान बुद्ध ने कभी ऐसी बेकार की चर्चा में नहीं पड़ना चाहा जो आदमी के कल्याण के लिए लाभकारी नहीं थी। इसलिए कोई भी ऐसी बात जिसका आदमी के कल्याण से कोई सम्बंध नहीं, यदि भगवान बुद्ध के सिर मढ़ी जाती है, तो उसे 'बुद्ध-वचन' स्वीकार नहीं किया जा सकता।
15. एक तीसरी कसौटी भी है। वह यह कि भगवान बुद्ध ने सभी विषयों को दो वर्गों में विभक्त रखा था। ऐसे विषय जिनके बारे में वे निश्चित थे, और ऐसे विषय जिनके बारे में वे निश्चित नहीं थे। जो विषय पहली श्रेणी में आते हैं उनके बारे में उन्होंने अपने विचार निश्चयात्मक रूप से और अंतिम रूप से व्यक्त किए हैं। जो विषय दूसरी श्रेणी में आते हैं उनके बारे में उन्होंने अपने विचार व्यक्त किए हैं, लेकिन ऐसे विचार बदले भी जा सकते हैं।
16. वार्ता करते समय जिन तीन प्रश्नों के बारे में संदेह और मतभेद है उनके बारे में यह निर्णय करने से पहले कि भगवान बुद्ध का निश्चित मत क्या था, यह आवश्यक है कि हम इन कसौटियों को न भूलें।
भारत से बौद्ध धर्म के प्रति मुख्य रूप से तर्कसंगत (Rational) और नैतिक (Ethical) था। उनके विचारों को उनकी प्रसिद्ध पुस्तक "The Buddha and His Dhamma" के संदर्भ में समझा जा सकता है:
डॉ. आंबेडकर का 31 लोकों और देवों पर दृष्टिकोण
🌀तर्क और विज्ञान:
डॉ. अंबेडकर ने बौद्ध धर्म के उन हिस्सों पर ज़ोर दिया जो विज्ञान और तर्क की कसौटी पर खरे उतरते थे। वे बुद्ध की शिक्षाओं को सामाजिक न्याय और मानवीय नैतिकता के रूप में देखते थे।
🌀मिथक बनाम वास्तविकता:
उनके अनुसार, पारंपरिक बौद्ध ग्रंथों में वर्णित '31 लोक' (जैसे स्वर्ग, नर्क या विभिन्न देव लोक) अक्सर बाद के लेखकों द्वारा जोड़ी गई काल्पनिक या रूपकात्मक (Metaphorical) बातें थीं। वे इन्हें शाब्दिक सत्य (Literal Truth) के बजाय उस समय की सांस्कृतिक मान्यताओं का हिस्सा मानते थे।
🌀अंधविश्वास का विरोध:
उन्होंने स्पष्ट किया था कि बुद्ध ने अंधविश्वास और पराभौतिक (Metaphysical) अटकलों को कभी बढ़ावा नहीं दिया। आंबेडकरजी का मानना था कि बुद्ध का मार्ग 'अत्त दीपो भव' (अपना दीपक स्वयं बनो) का है, न कि किसी अलौकिक शक्ति या लोक की शरण में जाने का।
शुद्ध दृष्टिकोण : उन्होंने बौद्ध धर्म के ऱ्हास के कारण को उखाड़ दिया। भगवान बुद्ध के सही शिक्षा की नींव रखी, जिसमें उन्होंने बौद्ध धर्म को अलौकिक मान्यताओं से मुक्त करके एक सामाजिक और नैतिक जीवन पद्धति के रूप में प्रस्तुत किया।
संक्षेप में:
डॉ. आंबेडकर बुद्ध के मूल सिद्धांतों (चार आर्य सत्य, अष्टांगिक मार्ग) में गहरा विश्वास रखते थे, लेकिन वे 31 लोकों या अलौकिक देवों को वास्तविक आवश्यकता नहीं मानते थे। उनके लिए बौद्ध धर्म का अर्थ दु:खों का निवारण इसी जीवन में और इसी धरती पर करना था।
भगवान बुद्ध और उनका धम्म
ग्रंथ में इन शीर्षकों से ही सही बुद्धिज़्म का रास्ता मिल जाता है
तीसरा खंड- भाग चौथा-
2-ईश्वर में विश्वास धम्म का आवश्यक अंग नहीं है । .
3-ब्रह्म में लीनता पर आधारित धर्म मिथ्या धम्म है। .
6-निराधार कल्पना पर आश्रित विश्वास धर्म नहीं है।
विभाग 5
2-मृत्यु के बाद के जीवन की चिंता व्यर्थ....... .
सलाह: अब जबकि आपका यह संशय स्पष्ट हो गया हो, तो आप अपनी पढ़ाई को एक "धम्म" (कर्तव्य) मानकर उस पर ध्यान केंद्रित करें। प्रज्ञा प्राप्त करना ही सच्चे अर्थों में बुद्ध के मार्ग पर चलना है।