21/04/2026
मैं राजीव से बात करना चाहता हूँ ....
रात के 3 बजे, मालदीव के राष्ट्रपति ने इसरार की। थके हुए, मगर बेहद कृतज्ञ गयूम का सम्पर्क, सेटेलाइट फोन से राजीव से कराया गया। राजीव उस रात सोए नही थे। उन्हें इस कॉल का इंतजार था।
दिल्ली में राजीव से गयूम की मुलाकात तय थी, मगर अपरिहार्य कारणों से उनका दौरा स्थगित हो गया था।
इसकी खबर विरोधियों को नही थी।
श्रीलंका में बैठे गयूम के विरोधी अरबपति ने सरकार पलटने की योजना बना रखी थी। लंकाई चीतों से डील सेट थी। गयूम अगर दिल्ली में होते, माले में हमला होता।
भाड़े के लड़ाके, हाईजैक किये शिप से माले में उतरे।
बहुत से इसके पहले ही, आम वेशभूषा में माले पहुँच गए थे। 4 नवंबर 1988 की रात हमला हुआ।
छोटा सा शहर..
आप एयरपोर्ट, टेलीफोन एक्सचेंज, सेक्रेट्रीएट जैसी आधा दर्जन बिल्डिंग कब्जा कर लें, तो सत्ता आपकी हुई। भाड़े के विद्रोही कब्जा कर चुके थे।
लेकिन राष्ट्रपति को भी तो हिरासत में लेना होगा। वे अपने पैलेस में नही थे। हमले की खबर से वे कहीं छिप गए।
और वहीं से अमेरिका से मदद मांगी। मगर डिएगो गार्सिया से मदद आने में कुछ दिन लगते। श्रीलंका और पाकिस्तान से मदद मांगी।
पाकिस्तान ने क्षमता न होने का बहाना किया, श्रीलंका चीतों से उलझना नही चाहता था। तो ब्रिटेन से मदद मांगी।
थैचर ने सलाह दी- भारत से मदद मांगो।
राजीव कलकत्ता में थे, जब खबर आई। रक्षा और विदेश मंत्रालय की संयुक्त बैठक रखी गयी। राजीव सीधे एयरपोर्ट से वहीं पहुचें।
आर्मी, नेवी, एयरफोर्स का एक संयुक्त ऑपरेशन तय किया गया। नाम - ऑपरेशन कैक्टस।
कई योजना बनी, बिगड़ी। पैराट्रूपर्स उतारने की बात सोची गयी, मगर माले इतना छोटा की ज्यादातर सैनिक, समुद्र में गिर जाते।
फिर एक डेयरिंग योजना बनी।
शाम होते होते आगरा से हैवी एयरक्राफ्ट, फौजी, साजो-सामान, जीपें लेकर प्लेन माले चला, और सीधे हुलहले एयरपोर्ट पर उतर गया। घुप्प अंधेरे में ये लैंडिंग जानलेवा हो सकती थी।
तुरन्त ही फौजी चारों ओर बिखर गए। एयरपोर्ट थोड़ी बहुत सँघर्ष के बाद कब्जे में आ गया। इतने में और विमान उतर गए।
कुछ ही घण्टो में माले में विद्रोहियों की लाशें बिखरी पड़ी थी। खेल खत्म हो गया था।
सेफ हाउस में छिपे गयूम से माले के भारतीय राजदूत मिले। बताया कि विद्रोह कुचल दिया गया है, वे सेफ हैं।
राजीव को मदद की गुहार लगाए महज सोलह घण्टे हुए थे। त्वरित मदद से अभिभूत, थके हुए, मगर बेहद कृतज्ञ गयूम ने राजदूत से कहा - मैं प्रधानमंत्री राजीव से बात करना चाहता हूँ..।
इसके बाद, मालदीव एक स्ट्रेटजिक एसेट के रूप में भारत का ठिकाना बना। हिन्द महासागर में भारत को एक मजबूत ताकत बनाने में, वहां क्रिएट किया गया फौजी ठिकाना, हमे थाह देता रहा। तीन दशक तक ..
लेकिन आज स्थिति कुछ और है..
ग्यारह साल पहले जिस व्यक्ति के राज्याभिषेक में समारोह में सभी सार्क देशों के नेता, लाइन लगाकर हाथ मिलाने आये थे..
तब मेरे,आपके, हिंदुस्तान की जनता के निर्णय से एक नई आशा भारत में ही नही, पूरे उपमहाद्वीप में फैली थी।
सबको लगा, कुछ बड़ा होने वाला है..
ग्यारह बरस बाद, सिर्फ निराशा है।
इस दौर में राजीव की रह रह कर याद आती है। वो गरिमा, वो गम्भीरता याद आती है।
काश यह शख्स अगर 10 साल और जिया होता। तब दुनिया की हर बड़ी ताकत दिल्ली में फोन लगाकर कहती..
मैं राजीव से बात करना चाहता हूँ....
❤️