Dr Rajeev Singh

Dr Rajeev Singh उपाध्यक्ष आरोग्य भारती अवध प्रान्त, National Eminent Member BJP
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🚩🌹🙏"नवमी तिथि मधु मास पुनीता।सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीताI मध्यदिवस अति सीत न घामा। पावन काल लोक बिश्रामा।I"मयोदा पुरुषोत्...
27/03/2026

🚩🌹🙏
"नवमी तिथि मधु मास पुनीता।
सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीताI
मध्यदिवस अति सीत न घामा।
पावन काल लोक बिश्रामा।I"

मयोदा पुरुषोत्तम,कौशल्या नंदन,प्रभु श्रीरामचन्द्र जी के अवतरण दिवस चैत्र शुक्लपक्ष रामनवमी की आप सभी को सपरिवार आत्मीय शुभकामनाएं। प्रभु श्रीराम आप सबका कल्याण करें ऐसी प्रार्थना है|

आओ नववर्ष को नव बनाएँखुद को ही दीप बनाएँअँधेरों में करें उजियाराआँधियों को दूर भगाएँऔरों को दिखाएँ रास्ताखुद देख सकते हो...
20/03/2026

आओ नववर्ष को नव बनाएँ
खुद को ही दीप बनाएँ
अँधेरों में करें उजियारा
आँधियों को दूर भगाएँ
औरों को दिखाएँ रास्ता
खुद देख सकते हो अगर।

संकल्प से शक्ति की सिद्धि तीन बातों पर निर्भर करती है- संयम, सत्य और सद्भाव। जो संयम से रहता है शक्ति उसी के पास रहती है। संयम का मतलब सिर्फ आहार विहार में नहीं, बल्कि व्यवहार और स्वभाव में भी हो। दूसरा भाव है सत्य। सत्य सदा आत्मबल बढाता है क्योंकि यह हमारे व्यक्तित्व का सबसे बड़ा हिस्सा है। और शक्ति ने सगा उसी उसी का साथ दिया है जो सत्य के साथ रहा। तीसरा है सद्भाव। भेदभाव करने वाले को कभी शक्ति से यश नहीं मिलता। इसलिए किसी को न तो छोटा समझना चाहिए और ही कम।
शक्ति हमारे अंदर ही निहित है, जरूरत है जगाने की। अगर हम इन नौ दिनों में अपनो भीतर स्थित परमात्मा के अंश को रत्ती भर पहचान सके तो समझिए नवरात्र सफल हुई। नवसंवत्सर की मंगलमय शुभकामनाएं।

रंगोत्सव की सप्रेम शुभकामनाएंजाने अनजाने हमसेजो रंग अचानक खो गएहो सके तोउन रंगों को ढूंढ़ कर लाएँआओ इस बारहोली फिर रंगों...
03/03/2026

रंगोत्सव की सप्रेम शुभकामनाएं

जाने अनजाने हमसे
जो रंग अचानक खो गए
हो सके तो
उन रंगों को ढूंढ़ कर लाएँ
आओ इस बार
होली फिर रंगों से मनाएँ।

कुछ रंग
रंगों की खोज में निकले
वापस नहीं लौटे
घर उनकी ख़बर ही लौटी
कुछ रंग खूनी ऋतुओं ने निगले
कुछ रंग सरहदों पर बिखरे
कुछ रंग खेतों में तड़पते
कुछ रंगों की रूहें
अभी भी सूने घरों में तिलमिलाती
कुछ रंगों को
अभी भी उनकी माँएँ बुलातीं
ये रंग जितने भी खोए
हमारे अपने थे
इन रंगों के बिना
हमारे आंगन में
मातम है
शोक है
सन्ताप है
इन रंगों के बिना
होली रंगों की नहीं
जख्मों की बरसात है

कोशिश करें
कि कच्चे जख्मों को
फिर हँसने की कला सिखाएँ
हो सके तो
उन रंगों को
ढूँढ़ कर लाएँ
और होली इस बार फिर
रंगों से मनाएँ।

हमारा हर संकल्प और हर शब्द एक रंग की तरह है। जैसे रंग कपड़ों को रंग देते हैं, वैसे ही हमारे विचार और भावनाएं हमारे अंतर्मन को रंग देती हैं। जब हम क्रोध में किसी कक्ष में प्रवेश करते हैं, तो बिना कुछ कहे ही हमारी नकारात्मकता दूसरों को असहज कर देती है। वहीँ यदि हम शांत हों, तो हमारी उपस्थिति ही वातावरण को सहज बना देती है। यही अदृश्य तरंगों की सच्ची होली है, जो हर क्षण खेली जाती है।

स्थूल रंग तो थोड़ी देर में घुल जाते हैं, पर मानसिक तरंगों के रंग लम्बे समय तक बने रहते हैं। जब हम किसी से पुरानी कटु स्मृतियों के साथ मिलते हैं तो अनजाने में उसके ऊपर मैले रंग डाल देते हैं। पर यदि हम करुणा से बात करें तो शीतलता के रंग बिखेरते हैं। प्रश्न यह है कि - क्या हम सचेत होकर चुनते हैं कि हमें कौन सा रंग फैलाना है? कई बार हम संतोष के स्थान पर ईर्ष्या, आत्म-सम्मान के स्थान पर तुलना और क्षमा के स्थान पर पीड़ा के रंग फैला देते हैं। परिस्थियाँ कैसी भी हों, हम अपनी प्रतिक्रिया चुन सकते हैं। जब हम पर कोई नकारात्मक रंग डालता है, तो हमारे पास विकल्प होता है -उसे सकारात्मक बनाकर लौटाएं। अहंकार के बदले विनम्रता, शत्रुता के बदले सद्भाव लौटाना ही आंतरिक सामर्थ्य है। इस होली केवल चेहरे की नहीं, चेतना को रंगे। ध्यान और आत्मचिंतन से भीतर अहंकार, द्वेष और पीड़ा की होलिका को जलाएं। पवित्र संकल्प, मधुर वाणी और श्रेष्ठ व्यवहार से संबंधों में प्रेम के रंग भरें।

राष्ट्रीय युवा दिवस की शुभ कामनाएंछेड़ो है वह गान, अनंतोद्भव अबंध वह गानविश्वताप से शून्य गह्वरों में गिरि के अम्लान,निम...
12/01/2026

राष्ट्रीय युवा दिवस की शुभ कामनाएं

छेड़ो है वह गान, अनंतोद्भव अबंध वह गान
विश्वताप से शून्य गह्वरों में गिरि के अम्लान,
निमृतअरण्य प्रदेशों में जिसका शुचि जन्म स्थान,
जिनकी शांति न कनक, काम, यश, लिप्सा का नि:श्वास
भंग कर सका, जहाँ प्रवाहित सत् चित् का अविलास
स्रोतस्विनी उमड़ता जिसमें वह आनंद अयास
गाओ बढ़ वह गान, वीर सन्यासी, गूंजे व्योम।
ओम तत्सत ओम।

यह कविता स्वामी विवेकानंद जी के जीवन दर्शन का घोषणा पत्र है। इसमे त्याग निर्भीकता और आत्म स्वरूप की पहचान का उद्घोष है। इस कविता में संन्यासी को निर्भय होकर संसार के बंधनों से मुक्त होने और आत्मसत्ता की अनुभूति करने का आह्वान है।

कुछ लोगों की निगाह में हिन्दू समाज असमानता और परस्पर विरोधी तत्वों का समुच्चय है। जबकि यह प्रश्न हमारे हिन्दू जीवन के सतही अवलोकन से पैदा हुआ है। एक वृक्ष उदाहरण के लिए, टहनियों, पत्तों, फूलों और फलों के कारण ऊपर से देखने पर अनेक और विषम रूप में दिखता है। तना शाखाओं से भिन्न दिखता है, टहनियां पत्तों से भिन्न दिखती हैं, सभी मानों एक दूसरे से पूर्णतया भिन्न हैं। किन्तु हम जानते हैं कि यह बाहरी भिन्नता विविध रूप में केवल उसी वृक्ष की अभिव्यक्ति है। उसके सभी भागों में एक ही रस प्रवाहित होकर उन्हें पोषण प्रदान करता है। ठीक यही बात, हमारे हिंदू समाज की विभिन्नता, जो हजारों वर्ष में विकसित हुई है, के बारे में कही जा सकती है। वृक्ष में फूल और पत्तियों के समान हमारे समाज में विद्यमान भिन्नता, मतभेद और बिखराव का कारण नहीं है। इस प्रकार का नैसर्गिक विकास हमारे समाज जीवन की अद्भुत विशिस्टता रही है।

नया वर्षसंगीत की बहती नदी होगेहूँ की बाली दूध से भरी होअमरूद की टहनी फूलों से लदी होखेलते हुए बच्चों की किलकारी हो नया व...
01/01/2026

नया वर्ष
संगीत की बहती नदी हो
गेहूँ की बाली दूध से भरी हो
अमरूद की टहनी फूलों से लदी हो
खेलते हुए बच्चों की किलकारी हो नया वर्ष

नया वर्ष
सुबह का उगता सूरज हो
हर्षोल्लास में चहकता पाखी
नन्हें बच्चों की पाठशाला हो
निराला-नागार्जुन की कविता

नया वर्ष
चकनाचूर होता हिमखण्ड हो
धरती पर जीवन अनन्त हो
रक्त स्नात भीषण दिनों के बाद
हर कोंपल, हर कली पर छाया वसन्त हो।.......

कालचक्र के नव प्रभात के साथ जीवन में नव चेतना नव संकल्प और नव प्रकाश का उदय हो आशा की किरणें आपके पथ को आलोकित करें कर्म कर्तव्य सृजन में निरंतर उत्कर्ष हो; पश्चिमी नव वर्ष आपके जीवन को गरिमा ऊर्जा और यश से समृद्ध करें नव वर्ष की हार्दिक एवं मंगलमय शुभकामनाएं!

महर्षि वाल्मीकि को आदि कवि रूप में जाना जाता है। कहते हैं कि उन्होंने अपने ज्ञान व तप से संसार को धर्म, सत्य व करुणा का ...
07/10/2025

महर्षि वाल्मीकि को आदि कवि रूप में जाना जाता है। कहते हैं कि उन्होंने अपने ज्ञान व तप से संसार को धर्म, सत्य व करुणा का संदेश प्रदान किया था। वाल्मीकि जयंती की शुभकामनाएँ

युद्ध की जीत सैनिकों की संख्या पर निर्भर नहीं होना चाहिए, बल्कि वह तो उनके हौसले एवं दृढ़ इच्छाशक्ति पर निर्भर करती है। ...
07/10/2025

युद्ध की जीत सैनिकों की संख्या पर निर्भर नहीं होना चाहिए, बल्कि वह तो उनके हौसले एवं दृढ़ इच्छाशक्ति पर निर्भर करती है। जो सच्चे उसूलों के लिए लड़ता है, वह धर्म योद्धा होता है तथा ईश्वर उसे हमेशा विजयी बनाता है। अत: उनके बारे में यह कहा जा सकता हैं कि गुरु गोविंद सिंह जी जैसा महान पिता कोई नहीं, जिन्होंने खुद अपने बेटों को शस्त्र दिए और कहा, 'जाओ मैदान में दुश्मन का सामना करो और शहीदी जाम को पिओ। जब आप अपने अन्दर से अहंकार मिटा देंगे, तभी आपको वास्तविक शांति प्राप्त होगी;
पुण्यतिथि पर सादर नमन।

समिधा लीक पर वे चलें जिनकेचरण दुर्बल और हारे हैं,हमें तो जो हमारी यात्रा से बनेऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैं।साक्षी हों र...
07/10/2025

समिधा

लीक पर वे चलें जिनके
चरण दुर्बल और हारे हैं,
हमें तो जो हमारी यात्रा से बने
ऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैं।

साक्षी हों राह रोके खड़े
पीले बाँस के झुरमुट,
कि उनमें गा रही है जो हवा
उसी से लिपटे हुए सपने हमारे हैं।

आइये राष्ट्र के निर्माण में अपना योगदान सुनिश्चित करें।

सड़कों के हाल पर क्या बोले डॉ राजीव सिंह रायबरेली के विनाश का जिम्मेदार कौन ? | The Sach India | anchor aditya mishra,THE...

विजयादशमी पर्व की शुभकामनाएंयह सब उसके सामने है, उसके अंदर है,जहाँ अब प्रेम और प्रतिष्ठा के बीचसंशय और निष्ठा के बीचएक ट...
02/10/2025

विजयादशमी पर्व की शुभकामनाएं

यह सब उसके सामने है, उसके अंदर है,
जहाँ अब प्रेम और प्रतिष्ठा के बीच

संशय और निष्ठा के बीच
एक टूटता हुआ पुरुष है।

वही जानता है।
उसके भीतर कितना अवसाद है :

आग और रक्त के निर्णय को ठुकराता
अंतर के शून्य को गुंजाता

वही दुर्दम भय—लोकापवाद है।
क्यों वह भूल गया है,

कि वह, जो उसके इस नाटक की
विडंबना झेलती रही है

वही, छाया की तरह,
उसके साथ-सारे दुखों को झेलती रही है

दुख ही आमुख
दुख ही उसके जीवन का उपसंहार है

लंका हो या अवध
उसके लिए एक-सा कारागार है।

वर्ष-दर-वर्ष, अपने प्रतिशोध की तृप्ति के लिए
वह टालता आया है हर्ष

वह जो बनना चाहता है युग का आदर्श :
अंदर से एक साधारण आदमी निकल आया है

उसे महसूस होता है,
इतनी कीमत चुका कर

उसने जिस सत्य को पाया है,
वह सत्य नहीं, महज़ उसकी छाया है।

लेकिन अब उसे मालूम है,
यह यात्रा के अंत की शुरुआत है

नवरात्र ईश्वर की स्त्री प्रकृति को समर्पित है। भिन्न-भिन्न स्थानों पर यह विभिन्न देवियों को समर्पित है लेकिन यह पर्व मुख्य रूप से देवी या देवत्व के स्त्रैण रूप को ही समर्पित है। भारतीय संस्कृति ने सदा नारी को जीवन के सबसे शक्तिशाली आयाम के रूप में प्रस्तुत किया है। पौरुष तब तक शव है जब तक कि उसे स्त्री से शक्ति नहीं मिलती। शक्ति का अर्थ है ऊर्जा और यही ऊर्जा ब्रह्माण्ड से कार्य कराती है और इस ऊर्जा को हमेशा स्त्रैण रूप में पहचाना गया है। जब हम स्त्रैण की बात करते हैं तो इसका महिला होने से सम्बन्ध नहीं है। स्त्रैण होना शरीर नहीं उससे अधिक है।
आज समाज ने स्त्रैण प्रकृति को कमजोरी समझ लिया है। इसलिए स्त्रियां पुरुषों की तरह होने की कोशिश कर रही हैं। हर चीज आज जंगलराज की तरह हो गयी है इसमें ताकतवर ही जिन्दा रह पता है। जब ऐसा होता है तो पुरुषत्व हावी ही रहेगा। हमने प्रेम, करुणा, और कोमल गुणों के बजाय जितने की ताकत को ही चुन लिया है। आप देखेंगे कि यदि आपके पास सिर्फ पुरुषत्व है तो आपके पास हर वस्तु होते हुए भी कुछ नहीं होगा। पौरुष के स्त्रैण प्रकृति से अधिक महत्वपूर्ण होने का कारण यह है हमारा पूरा ध्यान जीवन संरक्षण पर रहा है। जीवन संरक्षण के प्रति अपना ध्यान थोड़ा करने से स्तन स्वाभाविक रूप से बहुत महत्वपूर्ण हो जायेगा। अगर स्त्रैण को बेहतर अभिव्यक्ति मिलती है तो लोग थोड़ा ज्यादा मुस्कुरायेंगे, अधिक प्रसन्न रहेंगे और अधिक प्रेमपूर्ण होने। जीवन अधिक सुन्दर होगा जो हम वास्तव में चाहते है।
एक समज में नवरात्र के माध्यम से देवत्व की स्त्रैण रूप का उत्सव मनाना बहुत महत्वपूर्ण है। अगर ऐसा नहीं होता तो दुनिया में स्त्रैण भावों के लिए कोई जगह नहीं बचेगी। अगर स्त्रैण खो जाता है जो जीवन में हर वह चीज जो सुन्दर, कोमल प्रतिस्पर्धा-रहित और पोषण देने वाली है वह लुप्त हो जाएँगी। इस नवरात्रि के विजयादशमी पर्व पर स्त्रैण के उत्सव को पूरी भागीदारी, आनंद और प्रेम से मनाएं। केवल तभी आप जीवन की सुंदरता को जाएं सकते हैं।

निर्मल पावन भावना, सभी के सुख की कामनागौरवमय समरस जनजीवन, यही राष्ट्र आराधनाचले निरंतर साधना ... {२}जहाँ अशिक्षा अंधकार ...
02/10/2025

निर्मल पावन भावना, सभी के सुख की कामना
गौरवमय समरस जनजीवन, यही राष्ट्र आराधना
चले निरंतर साधना ... {२}

जहाँ अशिक्षा अंधकार है, वहाँ ज्ञान का दीप जलाये
स्नेह भरी अनुपम शैली से, संस्कार की जोत जगाये
सभी को लेकर साथ चलेंगे, दुर्बल का कर थामना
चले निरंतर साधना ... {२}

जहाँ व्याधियों और अभावों, में मानवता तडप रही
घोर विकारों अभिशापों से, देखो जगती झुलस रही
एक एक आँसू को पोछें, सारी पीड़ा लांघना
चले निरंतर साधना ... {२}

जहाँ विषमता भेद अभी है, नई चेतना भरनी है
न्यायपूर्ण मर्यादा धारें, विकास रचना करनी है
स्वाभिमान से खड़े सभी हों, करे न कोई याचना
चले निरंतर साधना ... {२}

नर सेवा नारायण सेवा, है अपना कर्तव्य महान
अपनी भक्ति अपनी शक्ति, ये करना जन जन का काम
अपने तप से प्रगटायेंगे, मा भारत कमलासना
चले निरंतर साधना ... {२}......

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्य को अभी सौ वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। सामान्य जन की भावनाओं के अनुरूप होने के कारण शनैः-शनैः संघ कार्य की स्वीकार्यता समाज में बढ़ती जा रही है। स्वामी विवेकानंद जी से एक बार उनके विदेश प्रवास में यह पूछा गया कि आपके देश में तो ज्यादातर लोग अनपढ़ हैं, अंग्रेजी जानते ही नहीं, तो आपकी बड़ी-बड़ी बातें भारत के लोगों को कैसे पहुंचेंगी? उन्होंने कहा कि जैसे चींटियों को शक़्कर का पता लगाने के लिए अंग्रेजी सीखने की जरूरत नहीं वैसे ही मेरे भारत के लोग अपने आध्यात्मिक ज्ञान के चलते किसी भी कोने में चल रहे सात्विक कार्य को तुरंत समझ जाते हैं और चुपचाप वहीँ पहुँच जाते हैं। इसीलिए वे मेरी बात समझ जायेंगे। यह बात सत्य सिद्ध हुई। वैसे ही संघ के इस सात्विक कार्य को धीरे क्यों न हो, सामान्य जन से स्वीकार्यता व् समर्थन लगातार मिल रहा है।

संघ कार्य के प्रारम्भ से ही सम्पर्कित व् नए-नए सामान्य परिवारों द्वारा संघ कार्यकर्ताओं को आशीर्वाद व् आश्रय प्राप्त होता रहा। स्वयंसेवकों के परिवार ही संघ कार्य संचालन के केंद्र रहे। संघ द्वारा समय-समय पर राष्ट्रीय हित के कई विषयों को उठाया गया। उन सभी को समाज के विभिन्न लोगों का समर्थन प्राप्त हुआ, जिनमें कई बार सार्वजनिक रूप से विरोधी दिखने वाले लोग भी शामिल रहे। संघ का यह भी प्रयास रहा कि व्यापक हिंदू हित के मुद्दों पर सभी का सहयोग प्राप्त किया जाये। राष्ट्र की एकात्मता, सुरक्षा, सामाजिक सौहार्द तथा लोकतंत्र एवं धर्म-संस्कृति की रक्षा के कार्य में असंख्य स्वयंसेवकों ने अवर्णनीय कष्ट का सामना किया और सैकड़ों का बलिदान भी हुआ। इन सब में समाज के संबल का हाथ हमेशा रहा है।

हम उस विचार, उस जीवन दर्शन, उस संस्कृति की पहचान हैं। संघ के विचार ने लोगों में फिर से आनंद जगाया है और उनमें यह विश्वास भरा है कि वे दुनिया में ‘सर्वश्रेष्ठ समाज’ के रूप में उभरने में सक्षम है।

आज देश संघ को देशभक्ति, अनुशासन और निस्वार्थ सेवा के एक प्रभावशाली और सफल प्रतीक के रूप में देखता है। संघ, समाज को संगठित करने और उसके पुरुषार्थ को जागृत करने का प्रयास कर रहा है, ताकि वह अपने रास्ते में आने वाली सभी चुनौतियों का सामना करने में सक्षम हो सके।

हिन्द में प्रति वर्ष आती है नवमी राम की।राम का सुमिरन करा जाती है नवमी राम की।हर तरफ संसार के हर घर में हाहाकार था।देश प...
01/10/2025

हिन्द में प्रति वर्ष आती है नवमी राम की।
राम का सुमिरन करा जाती है नवमी राम की।

हर तरफ संसार के हर घर में हाहाकार था।
देश पर जब हो रहा दुष्टों का अत्याचार था।
भूमि सह सकती नही पापों का इतना भार था।
उसी समय भारत में ईश्वर ने लिया अवतार था।
यह सबक सबको सिखा जाती है नवमी राम की।
राम का सुमिरन करा जाती है नवमी राम की।
किस तरह माँ-बाप का सत्कार करना चाहिए।
किस तरह भाई से अपने प्यार करना चाहिए।
किस तरह दीनों के प्रति उपकार करना चाहिए।
किस तरह इस देश का उद्धार करना चाहिए।
राम के यह गुण बता जाती है नवमी राम की।
राम का सुमिरन करा जाती है नवमी राम की।

चक्रवर्ती राज्य पद को त्यागने में तीव्र त्याग।
भील गीध निषाद से मिलने का था शुद्धानुराग।
वन में चौदह वर्ष बस जाने में था उत्तम विराग।
बज रहा था जिस्म की रग-रग में सच्चाई का राग।
याद यह बात दिला जाती है नवमी राम की।
राम का सुमिरन करा जाती है नवमी राम की।

प्रेम करने में भरत दृग ‘बिन्दु’ का आदर्श लो।
शरण जाने में विभीषन भाव का उत्कर्ष लो।
दास बनने में सदा हनुमान का सा हर्ष लो।
मन्त्र यह प्रतिपक्ष लो प्रतिमास लो प्रतिवर्ष लो।
यह सन्देश सुभ सुना जाती है नवमी राम की।
राम का सुमिरन करा जाती है नवमी राम की।....मोहन मोहनी

पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी की जयंती पर सादर नमन क्या जंग लगी तलवारों में, जो इतने दुर्दिन सहते होIराणा  प्रताप के वंशज हो...
25/09/2025

पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी की जयंती पर सादर नमन

क्या जंग लगी तलवारों में, जो इतने दुर्दिन सहते होI
राणा प्रताप के वंशज हो,क्यों कुल को कलंकित करते हो II
आराध्य तुम्हारे राम-कृष्ण,जो कर्म की राह दिखाते थेI
जो दुश्मन हो आततायी, वो चक्र सुदर्शन उठाते थेI
श्री राम ने रावण को मारा, तुम गद्दारों से डरते होI
Iजब शस्त्रों से परहेज तुम्हें, तो राम राम क्यों जपते हो
क्या जंग लगी तलवारों में, जो इतने दुर्दिन सहते हो II
अंग्रेजों ने दौलत लूटी, मुगलों ने थी इज्जत लूटीI
दौलत लूटी, इज्जत लूटी, क्या खुद्दारी भी लूट लिया,
गिद्धों ने माँ को नोंच लिया,तुम शांति-शांति को जपते होI
इस भगत सुभाष की धरती पर,क्यों ना मर्दों से रहते हो?
क्या जंग लगी तलवारों में जो इतने दुर्दिन सहते होII ......

हिन्दू हो, कुछ प्रतिकार करो, तुम भारत माँ के क्रंदन का
यह समय नहीं है, शांति पाठ और गांधी के अभिनंदन का
यह समय है शस्त्र उठाने का,गद्दारों को समझाने का,
शत्रु पक्ष की धरती पर,फिर शिव तांडव दिखलाने काI
इन जेहादी जयचंदों की घर में ही कब्र बनाने का,
यह समय है हर एक हिन्दू के,राणा प्रताप बन जाने काI
इस हिन्दुस्थान की धरती पर ,फिर भगवा ध्वज फहराने का II
ये नहीं शोभता है तुमको,जो कायर सी फरियाद करो I
छोड़ो अब ये प्रेमालिंगन,कुछ पौरुष की भी बात करो II
इस हिन्दुस्थान की धरती के,उस भगत सिंह को याद करो,
वो बन्दूको को बोते थे,तुम तलवारों से डरते हो I
क्या जंग लगी तलवारों में जो इतने दुर्दिन सहते हो II......

पंडित दीन दयाल जी में कर्तृत्व और विचार एकात्मता के साथ मूर्तिमत थे। उनकी कर्मशक्ति बड़ी थी या बौद्धिकता, इसका फैसला आसान नहीं है। वे वैचारिक निष्ठा एवं व्यावहारिक कर्मशीलता के अप्रतिम उदाहरण थे। वे राजनीति में भारतीय तत्व के विवेचक एवं प्रवक्ता थे। उनके विचार सर्वांगीण थे; आने वाली अनंत पीढ़ियों की अनमोल विरासत हैं उनके विचार। उन्होंने स्वयं अपने बारे में कहा, "मैं राजनीति में संस्कृति का राजदूत हूँ।" वे जीवन भर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक के नाते व्रती जीवन के वाहक रहे। राजनीति का उन पर असर नहीं हुआ, उनका राजनीति पर असर हुआ। सभी उपहासों व् विरोधों को उन्होंने जनसंघ का विस्तार करके करारा जवाब दिया। १९६७ के आम चुनाव में कांग्रेस के बाद भारतीय जनसंघ दूसरे नंबर की पार्टी बन गयी। इसी वर्ष जनसंघ ने भी उन्हें अपना अध्यक्ष चुन लिया। अनाम रहकर काम करने वाले दीनदयाल नामवर हो गए। पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जन्म 25 सितम्बर 1916 को धनकिया नामक स्थान ,जयपुर अजमेर रेलवे लाइन के पास राजस्थान में हुआ था। उन्हीं अंत्योदय व एकात्म मानववाद के प्रणेता, प्रखर राष्ट्रवादी विभूति की जयंती पर सदर नमन।

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RAGHUKUL; JAIL Road
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