27/07/2026
अक्सर लोग मुझसे पूछते हैं—"सावन आते ही माँस-मछली क्यों छोड़ दी? दाढ़ी-नाखून क्यों नहीं काटते? यह कैसा नियम है जो देश के एक कोने में 17 जुलाई को शुरू होता है और दूसरे कोने में 29 जुलाई को?"
पिछले 14 सालों से हम लोग यह सब बिना सवाल पूछे करता आ रहा था। लेकिन इस बार जब ठहरकर सोचा, तो समझ आया कि इस परंपरा का मर्म कितना गहरा था, जिसे हमने सिर्फ एक रस्म बनाकर छोड़ दिया।
हमारे पूर्वजों ने सावन में माँस-मछली बंद करने का नियम सिर्फ धर्म के नाम पर नहीं दिया था। बारिश का यह महीना प्रकृति के पुनर्जन्म का समय होता है, जीवों के वंश-वृद्धि का समय होता है। जो पेट इंसान साल के 11 महीने भरता है, क्या प्रकृति के सम्मान में 1 महीना उसे संयम नहीं दे सकता? और जब धूप कम होती है, पाचन धीमा होता है, तो शरीर को शुद्ध और हल्का रखने से बड़ा धर्म और क्या होगा?
रही बात बाल-नाखून न काटने और सजने-संवरने से दूर रहने की... तो सावन हमें सिखाता है बाहरी दिखावे को छोड़कर, अपने भीतर उतरना। खुद को संवारने की दौड़ से 30 दिन का ब्रेक लेकर, अपने भीतर की मैल को साफ करना ही तो असली साधना है।
पर आज हम कहाँ आ पहुँचे हैं?
30 दिन हम थाली में माँस नहीं रखते, लेकिन बाकी 11 महीने इंसानों के प्रति मन में ज़हर और नफ़रत रखते हैं।
हम सावन में बाल और नाखून काटने से तो बचते हैं, लेकिन ज़ुबान से दूसरों का दिल काटने से नहीं कतराते।
हम कावड़ उठाकर मीलों चल लेते हैं, पर घर में बूढ़े माँ-बाप के पास 10 मिनट बैठने का समय नहीं निकालते।
देश के अलग-अलग राज्यों में तिथियाँ भले बदल जाएँ, असम में अमांत पंचांग चले और यूपी-बिहार में पूर्णिमांत... पर धर्म का मूल संदेश कभी नहीं बदलता।
शिव केवल मंदिर के पत्थरों में नहीं हैं, शिव उस हर मन में हैं जो शांत है, जो संयमी है, जो हर जीव के प्रति करुणा रखता है।
अगर इस सावन थाली के साथ-साथ हमारी नीयत और ज़ुबान भी शुद्ध हो जाए, तभी यह 30 दिन का संयम सार्थक होगा। वरना सिर्फ भोजन बदलने से विचार नहीं बदलते!
आप इस परंपरा और सोच के बारे में क्या राय रखते हैं? टिप्पणी में ज़रूर बताएँ।