18/08/2026
मुझे नहीं पता कि यह पोस्ट मुझे भी प्रधानमंत्री जी की नई श्रेणी के किसी “दिमागी नक्सल” में डाल देगी या नहीं — लेकिन सवाल पूछने की पुरानी आदत अभी गई नहीं है।
रीतिका खेड़ा का लेख VB-GRAM-GA को लेकर एक सीधा सवाल उठाता है: जो दिक्कतें अभी दिख रही हैं, वे सिर्फ शुरुआती अड़चनें हैं या किसी बड़ी गड़बड़ी के संकेत?
जुलाई में इस नई योजना के तहत मिला रोजगार, पिछले साल जुलाई के मनरेगा रोजगार का लगभग आधा रहा। नई और बेहतर योजना के लिए यह शुरुआत बहुत उत्साहजनक नहीं कही जा सकती।
और असली चिंता इससे भी बड़ी है। कागज पर 100 की जगह 125 दिनों की गारंटी दी गई है, लेकिन साथ ही राज्यों पर खर्च का बोझ भी काफी बढ़ा दिया गया है। गरीब राज्यों के लिए यही सबसे बड़ी मुश्किल बन सकती है — जहां रोजगार की जरूरत सबसे ज्यादा है, वहीं सरकारों के पास अतिरिक्त पैसा सबसे कम है।
असल सवाल बहुत साधारण है:
जब कोई गरीब ग्रामीण परिवार काम मांगेगा, तो क्या उसके लिए पैसा वास्तव में उपलब्ध होगा?
अगर रोजगार का अधिकार इस बात पर निर्भर करने लगे कि आप किस राज्य में पैदा हुए हैं और उस राज्य की तिजोरी कितनी भरी है, तो यह राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कम और किस्मत की लॉटरी ज्यादा हो जाएगी।
इसे सिर्फ “teething trouble” कहकर टालना जल्दबाजी होगी।
और हां, अगर इतना सोचना भी अब “दिमागी नक्सल” होने की निशानी है, तो क्या कीजिए!