06/07/2025
उस रात उसका फ़ोन आया था —
ठीक 2:47 AM पर।
मैं जागा नहीं।
फोन बजा,
बंद हुआ,
फिर दोबारा बजा।
फिर… हमेशा के लिए ख़ामोश हो गया।
सुबह उठा तो
उसका नाम स्क्रीन पर चमक रहा था —
3 मिस्ड कॉल।
मैंने सोचा,
"फिर कोई फ़िजूल की बहस रही होगी…"
और मोबाइल साइड में रख दिया।
10 मिनट बाद
दोस्त का कॉल आया —
"वो नहीं रही…"
क्या?"
सिर्फ यही एक शब्द निकला मुँह से।
और फिर बिल्कुल शून्य।
ना आंसू निकले,
ना गुस्सा,
ना यकीन।
बस एक कंपकंपी थी —
जिसने दिल को भींच लिया था।
मैंने सोचा कोई मज़ाक है,
फिर हँसने की हिम्मत भी नहीं हुई।
क्योंकि अचानक
दिल में एक सिहरन उठी —
“क्या उसने… मरने से पहले मुझे कॉल किया था?”
मैं भागा,
उसके घर,
उसकी गली,
उसकी आख़िरी तस्वीर तक।
सब जगह एक ही बात थी —
“वो बहुत देर तक अकेले बैठी रही…
आख़िरी बार किसी को फोन कर रही थी…
किसी को माफ़ करने की कोशिश में थी।”
अब मैं हर रात 2:47 पर उठता हूँ।
फोन घूरता हूँ।
दिल करता है,
कभी फिर से वो कॉल आए…
बस एक बार।
उसकी यादें अब सिर्फ़
वो तीन मिस्ड कॉल बन चुकी हैं —
जो मैं कभी उठा नहीं पाया।
लोग कहते हैं,
"जो गया, उसे जाने दो..."
पर कोई उनसे पूछे —
"जिसने जाने से पहले तुम्हें पुकारा हो,
क्या उसे भुलाया जा सकता है?"