27/09/2016
सेना को मिला राफेल का बल
डॉ. लक्ष्मीशंकर यादव
तकरीबन डेढ़ दशक से अधिक की लंबी प्रतीक्षा के बाद आखिरकार भारतीय वायु सेना के लिए बहु-उद्देश्यीय भूमिका वाले 36 लड़ाकू विमानों की खरीद के सबसे बड़े रक्षा सौदे पर 23 सितंबर को मुहर लग गई। इस रक्षा समझौते पर भारतीय रक्षा मंत्री मनोहर पíरकर और फ्रांस के रक्षा मंत्री यां जीन यीव्स ली डियान की मौजूदगी में हस्ताक्षर हुए। उनके साथ डसॉल्ट एविएशन, थेल्स व एमबीडीए के सीईओ के साथ अन्य शीर्ष अधिकारी उपस्थित थे। इस डील के तहत भारत फ्रांस से 36 लड़ाकू विमान प्राप्त करेगा। यह सौदा सात दशमलव आठ मिलियन यूरो यानी लगभग 59000 करोड़ रुपये का है। पिछले 20 सालों की अवधि में यह लड़ाकू विमानों की खरीद का पहला सौदा है। पिछले साल अप्रैल माह में अपनी फ्रांस यात्र के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फ्रांस से 36 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद की घोषणा की थी। फिर इस साल जनवरी में फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद की भारत यात्र के दौरान इस समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। शुरुआत में इसके लिए 10 अरब यूरो की मांग की गई थी, लेकिन भारत की कड़ी सौदेबाजी के बाद फ्रांस सरकार छूट देने तथा अन्य कई मानकों पर काम करने को राजी हो गई थी।
इस सदी की शुरुआत के पहले से ही वायु सेना ऐसे लड़ाकू विमानों की मांग कर रही थी। इसके सौदे के लिए 1999-2000 में बातचीत शुरू हुई थी। तब वायु सेना ने मल्टी रोल वाले 126 लड़ाकू विमान खरीदे जाने की इछा जताई थी। जब वायु सेना की यह मांग निरंतर बढ़ती गई तो 2005 में रक्षा मंत्रलय ने इनकी खरीद के लिए टेंडर जारी किए, लेकिन जारी करने के बाद कुछ परिस्थितियों के कारण टेंडर वापस ले लिए। दो वर्ष बाद अगस्त 2007 में पुन: टेंडर जारी किए गए जिसके उत्तर में विश्व की छह बड़ी विमान निर्माता कंपनियों ने निविदाएं भेजीं। इनमें स्वीडिश कंपनी ग्रिपन, अमेरिकी कंपनी बोइंग, जनरल इलेक्टिक, रूसी विमान कंपनी मिग-35, ब्रिटेन, जर्मनी, इटली व स्पेन की कंपनियों द्वारा मिलकर बनाया गया यूरोपीय कंसोर्टियम यूरोफाइटर तथा फ्रांस की डसॉल्ट एविएशन शामिल थीं।
इन कंपनियों की निविदाओं को अप्रैल 2010 से अप्रैल 2011 तक भारतीय वायुसेना ने 643 पैमानों पर परखा व जांचा। परखने की इस प्रक्रिया में सभी प्रतिस्पर्धी लड़ाकू विमानों का सर्वाधिक ऊंचाई वाले लेह क्षेत्र में, अधिक तापमान वाले जैसलमेर क्षेत्र व बेहद उमस वाले इलाके बेंगलुरू में परीक्षण किया गया। इस तरह विभिन्न परिस्थितियों में किए गए परीक्षणों के बाद नाटो देशों का यूरोफाइटर व फ्रांस का राफेल मुकाबले में रह गए। इसके बाद इन कंपनियों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति में 4 नवंबर, 2011 को विमानों के मूल्य वाले लिफाफे खोले गए और कीमतों का आंकलन विमान की प्रति यूनिट कीमत, इंजन की कीमत, तकनीकी हस्तांतरण तथा 40 साल के रख रखाव पर आने वाले खर्च के मद्देनजर किया गया। अंतत: बाजी फ्रांस की कंपनी के हाथ लगी।
फ्रांस में राफेल का अर्थ ‘तूफान’ होता है। यह दो इंजन वाला विमान है। 1970 में फ्रांसीसी वायु सेना ने अपने पुराने पड़ चुके लड़ाकू विमानों को बदलने की मांग की। जिसके बाद चार यूरोपीय देशों के साथ इस विमान की परियोजना पर काम शुरू हुआ, लेकिन कुछ मतभेदों के बाद फ्रांस ने इस पर अकेले काम प्रारंभ किया। राफेल विमान ने सबसे पहले 4 जुलाई, 1986 को अपनी पहली उड़ान भरी थी। 2001 में पहला लड़ाकू विमान फ्रांस की वायु सेना को प्राप्त हुआ। यह 2006 से नौसेना में अपनी सेवाएं दे रहा है। इसके तीन संस्करण हैं। पहला राफेल सी सिंगल सीट वाला है, दूसरा राफेल बी दो सीटों वाला है। तीसरा राफेल एम सिंगल सीट कैरियर बेस्ट संस्करण है। भारत राफेल बी दो सीटों वाले विमान खरीद रही है। इसकी खरीद पर यूपीए सरकार के समय की कीमत से करीब 560 करोड़ रुपये सरकार बचा रही है। हस्ताक्षर होने के 36 माह के भीतर यानी कि 2019 में लड़ाकू विमान आना शुरू हो जाएंगे। सभी 36 विमान 66 माह में प्राप्त होंगे। इसके एक विमान की कीमत 70 बिलियन आती है।
इसकी अधिकतम रफ्तार 2390 किलोमीटर प्रति घंटा तथा उड़ान की क्षमता 40 से 60 हजार फीट ऊपर तक की है। इस विमान की लंबाई 15.27 मीटर, ऊंचाई 5.34 मीटर व इसके विंगस्पैन 35.4 फीट हैं। इस विमान का वजन 14016 किलोग्राम व रेंज 1000 नॉटिकल मील है। यह 24500 किलोग्राम वजन ले जाने में सक्षम है। इसकी रफ्तार 2200 से 2500 किलोमीटर प्रति घंटा है। इसमें एक दशमलव तीन मिलीमीटर की गन होगी जो एक बार में 125 राउंड गोलियां निकाल सकती है। इसके अलावा इसमें घातक मिसाइलें लगी होती हैं। अगर विशेषताएं देखी जाएं तो इसमें दो रडार लगे हैं जिनकी रेंज 150 किलोमीटर तक की है। डसॉल्ट इसे उन्नयन कर 170 किलोमीटर तक बढ़ाने को तैयार है। इसका स्पेक्टा सॉफ्टवेयर सिस्टम इसके बचाव के अनेक अवसर देता है। इससे विमान का आधुनिक सिस्टम और कारगर बन जाएगा।