25/07/2026
#वक्फ की हिफाज़त साझा ज़िम्मेदारी: मौलाना #महमूद मदनी
ऑल इंडिया #मुतवल्लियान कॉन्फ्रेंस में वक्फ के खिलाफ #साज़िशों को नाकाम बनाने के लिए पारदर्शी प्रबंधन और कानूनी तैयारी पर ज़ोर
नई दिल्ली, 24 जुलाई: वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 के खिलाफ जारी सामाजिक और कानूनी संघर्ष के बीच आज जमीयत उलेमा-ए-हिंद के तत्वावधान में ऐवान-ए-ग़ालिब, नई दिल्ली में ऑल इंडिया मुतवल्लियान कॉन्फ्रेंस आयोजित की गई। सम्मेलन की अध्यक्षता सैयद शाह हाफ़िज़ मोहम्मद अली अल-हुसैनी, सज्जादानशीन दरगाह हज़रत ख़्वाजा बंदा नवाज़ गेसूदराज (रह.), गुलबर्गा शरीफ ने की। स्वागत भाषण जमीयत उलेमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना मोहम्मद हकीमुद्दीन क़ासमी ने दिया, जबकि संचालन मौलाना मुफ़्ती हस्सान क़ासमी ने किया।
सम्मेलन को संबोधित करते हुए जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने कहा कि वक्फ केवल संपत्ति नहीं, बल्कि अल्लाह की अमानत और इस्लामी सभ्यता का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। इसलिए इसकी सुरक्षा, अभिलेखों का संरक्षण और आवश्यकता पड़ने पर कानूनी लड़ाई लड़ना भी इबादत का हिस्सा है।
उन्होंने कहा कि वक्फ की सुरक्षा केवल मुतवल्लियों का मामला नहीं, बल्कि पूरी उम्मत की सामूहिक ज़िम्मेदारी है। उन्होंने कहा, "जिस क़ौम ने अपनी अमानतों की हिफाज़त छोड़ दी, इतिहास ने भी उसकी हिफाज़त छोड़ दी।"
मौलाना मदनी ने कहा कि वक्फ संस्थानों को जिन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, उनमें बाहरी ख़तरों के साथ-साथ हमारी अपनी लापरवाही, कमजोर प्रशासन और दस्तावेज़ों की उपेक्षा भी शामिल है। वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 का उल्लेख करते हुए उन्होंने सरकार से अपील की कि हर परिस्थिति में न्याय और संवैधानिक मूल्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।उन्होंने कहा, "न्याय किसी एक समुदाय पर किया जाने वाला एहसान नहीं है, बल्कि राज्य की सबसे बड़ी शक्ति है। कानून का सम्मान तभी कायम रहता है, जब वह सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू हो।"
मौलाना मदनी ने मुतवल्लियों से अपील की कि वे वक्फ संपत्तियों का पूरा रिकॉर्ड सुरक्षित रखें, उसे डिजिटल स्वरूप में तैयार करें, वित्तीय पारदर्शिता सुनिश्चित करें, नियमित ऑडिट कराएं तथा अवैध कब्जों के विरुद्ध प्रभावी कानूनी कार्रवाई करें। उन्होंने वंशानुगत प्रबंधन की उस प्रवृत्ति से बचने की भी सलाह दी जो संस्थाओं की विश्वसनीयता और मूल भावना को प्रभावित करती है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में वक्फ की सुरक्षा के लिए आंशिक नहीं बल्कि पूर्णकालिक प्रयासों की आवश्यकता है। "यदि हम ईमानदारी, योजनाबद्ध ढंग और निरंतर परिश्रम के साथ काम करें, योग्य लोगों को तैयार करें और पूरी उम्मत को इस मिशन से जोड़ें, तो अल्लाह हमारी कोशिशों को स्वीकार करेगा और वक्फ के खिलाफ होने वाली हर साज़िश को नाकाम बनाएगा।"
पटना उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति इक़बाल अंसारी ने कहा कि जहां मुतवल्ली मौजूद हैं, वहीं वक्फ संपत्तियों के पंजीकरण और कानूनी मामलों में सबसे अधिक कठिनाइयाँ सामने आती हैं। इसलिए मुतवल्लियों को अपनी ज़िम्मेदारियों का विशेष रूप से एहसास होना चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकार और जनता के बीच उत्पन्न विवादों का निर्णय अदालतों को संविधान की सीमाओं के भीतर रहकर करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान समय में यह कहना कठिन होता जा रहा है कि न्यायालय पूरी तरह न्यायोचित ढंग से कार्य कर रहे हैं।
मरकज़ी जमीयत अहले हदीस हिंद के अमीर मौलाना असगर अली इमाम महदी सलफ़ी ने कहा कि वक्फ की जिम्मेदारी केवल मुतवल्लियों या सरकार पर नहीं डाली जा सकती, बल्कि पूरी उम्मत और समाज को इसमें अपनी भूमिका निभानी होगी।
जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के उपाध्यक्ष मलिक मोतासिम ख़ाँ ने कहा कि वक्फ संस्थाओं को अधिक प्रभावी और जनहितकारी बनाना समय की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि वक्फ संपत्तियों पर अवैध कब्ज़ों और विवादों का एक बड़ा कारण कुछ मुतवल्लियों की लापरवाही तथा वक्फ संपत्तियों को निजी संपत्ति समझने की प्रवृत्ति है, जिससे वक्फ को गंभीर नुकसान पहुँचा है।
अपने अध्यक्षीय भाषण में सैयद शाह मोहम्मद अली अल-हुसैनी ने कहा कि पिछले दो वर्षों में वक्फ संरक्षण आंदोलनों के कारण समाज में वक्फ के प्रति उल्लेखनीय जागरूकता आई है, जिसे और अधिक संगठित करने की आवश्यकता है। उन्होंने वक्फ संपत्तियों की सुरक्षा, अवैध कब्ज़ों के विरुद्ध समयबद्ध कानूनी कार्रवाई तथा वक्फ कानूनों की व्यापक जानकारी को समय की आवश्यकता बताया। उन्होंने संपन्न लोगों से नए वक्फ स्थापित करने की अपील करते हुए कहा कि शिक्षा, स्वास्थ्य और जनकल्याण के क्षेत्रों में वक्फ की भूमिका को और मजबूत बनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि मुतवल्ली की पहली जिम्मेदारी वाकिफ़ (दानकर्ता) की मंशा का पूरी निष्ठा से पालन करना है।
शाह सैयद यादुल्लाह हुसैनी, उप सज्जादानशीन, रौज़ा ख़ुर्द, गुलबर्गा शरीफ ने वक्फ की सुरक्षा के लिए एक प्रभावी समिति गठित करने का सुझाव दिया, जो वक्फ संपत्तियों की निगरानी, सुरक्षा और कानूनी संरक्षण के लिए ठोस कार्ययोजना तैयार करे।
साउथ एशियन माइनॉरिटीज़ लॉयर्स एसोसिएशन (SAMLA) के अध्यक्ष एडवोकेट नासिर अज़ीज़ ने प्रत्येक क्षेत्र में वक्फ संरक्षण समितियाँ और कानूनी प्रकोष्ठ स्थापित करने, अवैध कब्ज़ों के विरुद्ध त्वरित कानूनी कार्रवाई तथा मुतवल्लियों द्वारा पारदर्शी प्रशासनिक एवं वित्तीय व्यवस्था अपनाने पर बल दिया। उन्होंने कहा कि वक्फ की सुरक्षा पूरी उम्मत की सामूहिक जिम्मेदारी है और इसके लिए जनजागरण, युवाओं की भागीदारी तथा वक्फ की आय का उसके मूल धार्मिक, शैक्षणिक और सामाजिक उद्देश्यों के लिए उपयोग सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
सांसद हरेंद्र मलिक ने कुछ स्थानों पर वक्फ संपत्तियों में कुप्रबंधन और अपारदर्शिता पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि वक्फ की आय का उपयोग गरीबों और जरूरतमंदों के कल्याण के लिए होना चाहिए। उन्होंने वक्फ संरक्षण के इस अभियान में हरसंभव सहयोग का आश्वासन दिया।
सांसद मौलाना मोहिबुल्लाह नदवी ने जमीयत उलेमा-ए-हिंद की सेवाओं की सराहना करते हुए वक्फ संरक्षण के लिए संगठित और साझा प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया।
सांसद इमरान मसूद ने वक्फ के संबंध में सरकार की नीतियों की आलोचना करते हुए कहा कि धार्मिक संपत्तियों की सुरक्षा का प्रश्न केवल मुसलमानों तक सीमित नहीं है। उन्होंने कहा कि देश के अन्य धार्मिक स्थलों को भी विभिन्न प्रकार के विवादों का सामना करना पड़ रहा है, इसलिए सभी धार्मिक संस्थाओं और उनकी संपत्तियों की सुरक्षा के लिए हिंदुओं और मुसलमानों को मिलकर संघर्ष करना होगा।
अब्दुल वाहिद हुसैन अंगारा (दरगाह अजमेर शरीफ) ने कहा कि केवल कानूनों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है, बल्कि जनजागरूकता, विश्वास और सामूहिक सहयोग ही वक्फ की प्रभावी सुरक्षा की वास्तविक गारंटी हैं।
मौलाना सिद्दीक़ुल्लाह चौधरी, अध्यक्ष, जमीयत उलेमा पश्चिम बंगाल ने देश को पाँच प्रशासनिक क्षेत्रों में विभाजित कर वक्फ प्रबंधन को अधिक प्रभावी बनाने का सुझाव दिया।
इसके अतिरिक्त आईआरएस अकरमुल जब्बार ख़ाँ, एडवोकेट हाजी मोहम्मद हारून (अध्यक्ष, जमीयत उलेमा मध्य प्रदेश), एडवोकेट इक़बाल शेख (पूर्व सदस्य, केंद्रीय वक्फ परिषद), आईआरएस सैयद महमूद अख्तर, एडवोकेट ताहिर मोहम्मद हकीम, सांसद अब्दुल वहाब (केरल) तथा पूर्व सांसद हारिस बीरन ने भी अपने विचार व्यक्त किए।
सम्मेलन में नवाब अहमद हमीद (बागपत), एडवोकेट फिरोज़ ग़ाज़ी (महासचिव, SAMLA), मरज़िया ख़ाँ (मुंबई), प्रो. निसार अहमद अंसारी (महासचिव, जमीयत उलेमा गुजरात), मौलाना याह्या करीमी (महासचिव, जमीयत उलेमा हरियाणा, हिमाचल प्रदेश एवं पंजाब), मास्टर मोहम्मद क़ासिम महू, मौलाना मोहम्मद क़ासिम नूरी (अध्यक्ष, जमीयत उलेमा दिल्ली), मौलाना आफ़ताब आलम सिद्दीकी, मौलाना क़ारी अब्दुल समीअ, ओवैस सुल्तान ख़ाँ सहित जमीयत उलेमा-ए-हिंद, जमीयत उलेमा दिल्ली, हरियाणा, मेवात और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बड़ी संख्या में पदाधिकारी तथा देशभर से आए 500 से अधिक मुतवल्ली उपस्थित रहे। इस अवसर पर विशिष्ट अतिथियों का शॉल ओढ़ाकर सम्मान भी किया गया।
Jamiat Ulama-i-Hind