17/02/2021
अह्मस्मि योध: न कदापि खण्डित:
मैं कभी न खंडित होने वाला योद्धा हूं। "
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अर्थात : " मैं क्षत्रिय ! अपने वचनों पर अटल रहने वाला , कभी भी संघर्षों के आगे न झुकने तथा अपने धर्म की रक्षा हेतु कभी भी पीछे न हटने वाला अखंडित योद्धा हूं । "
इतिहास में जहां भी उच्च कोटि के सात्विक त्याग की महिमा है, जहां भी अद्वितीय शूरवीरता और युद्ध कौशल की चर्चा है तथा जहां अपने वचनों पर अटल रहने का गुणगान है, वहां क्षत्रियों ( राजन्य - राजपूत - राजपुत्र ) का चरित्र सदा से ही उज्जवल और प्रशंसनीय रहा है।
"अह्मस्मि योध: न कदापि खण्डित: " की नीति का अनुसरण कर धर्म रक्षार्थ बलिदान होने क्षत्रियों का विशेष गुण है। इनकी जज्वलमान और निशंक युद्ध प्रियता का उदाहरण किसी समाज या देश के इतिहास में नहीं मिलता ।
राजपूत कभी युद्ध का परिणाम देखकर नहीं लड़ते , उन्हें अपने प्राणों का भय युद्ध स्थल से बाहर नहीं खींच सकता था । अपने क्षात्र धर्म और कर्म पर अटल रहने वाले सनातन धर्म रक्षार्थ युद्ध रूपी यज्ञ में प्राणों की आहुति चड़ाने वाले वीर सच में बेशकीमती प्रतिभा के धनी थे।
विजय या पराजय की बजाय " विजय या वीरगति " का मौलिक उद्देश्य लेकर रण क्षेत्र में कोहराम मचाने वाले ये अल्हड़ वीर जीते जी कभी शत्रु को अपनी भूमि पर अधिकार नहीं देते थे।
समर प्रांगण में काल बनकर टूटने वाले इन वीरों की प्रसंशा खुद शत्रु भी किया करते थे।
खानवा युद्ध के पश्चात् बाबर ने अपनी आत्मकथा में लिखा कि -
" राजपूत ना तो जय-पराजय का भय रखते है और ना ही युद्ध में छल प्रपंच का प्रयोग करना जानते है , उन्हें बस युद्ध स्थल में मरना प्रिय है। "
रण चंडी का आशीर्वाद लेकर जन्मे ऐसे राजपूतों का जितना बखान किया जाय कम ही है।
साभार ,
पोस्ट लेखक : भंवर देवेन्द्र सिंह रहलाना ©