18/04/2017
बाबू वीर कुंवर सिंह का विजयोत्सव
यानी, अंग्रेजों के खिलाफ भारत में स्वतंत्रता आंदोलन के सिंहनाद का विजय उत्सव
बाबू वीर कुंवर सिंह ने 23 अप्रैल 1857 को अपने जगदीशपुर के किले पर से अंग्रेजों का यूनियन जैक उतारकर और भारतीय तिरंगा झंडा फहराकर आजाद कराया था| यह दिन और इस दिन की घटना भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के लिए न केवल ऐतिहासिक थी, बल्कि संभवतः पहली भी थी| आजादी के लिए बेचैन पूरे देश के लिए यह रास्ता दिखाने वाला प्रेरक उदहारण भी बन गयी| इस दिन को बाबू वीर कुंवर सिंह के विजयोत्सव के रूप में मनाया जाता है|
बाबू वीर कुंवर सिंह जी ने इस दिन के लिए लम्बा संघर्ष किया| अंग्रेजी सेना उनसे भय से थरथर कांपती थी| सीमित साधनों से ही कुशल रणनीति और जोरदार हौसले के बल पर वे अंग्रेजी सेना के दांत खट्टे कर देते थे| एक बार अंग्रेजों से लोहा लेते हुए उनकी बांह में गोली लग गयी और जहर फैलने का खतरा हो गया तो 80 साल के इस निर्भीक योद्धा ने अपने ही हाथों तलवार से गोली लगा अपना दूसरा हाथ काट कर गंगा मााँ को समर्पित कर दिया| बाबू वीर कुंवर सिंह की बहादुरी के किस्से बिहार के गांव-गांव में कहे-सुने जाते हैं|
बाबू वीर कुंवर सिंह भारतीय या बिहारी सामाजिक परिस्थितियों के सच्चे राजा थे| उनमें जबरदस्त संगठनिक व सामरिक क्षमता थी| सामाजिक समरसता की भावना भी उनमें कूट-कूट कर भरी थी| राजपूत राजा होने के बावजूद उनके मंत्रिमंडल और सेना में दलित, अल्पसंख्यक और पिछड़े वर्ग के लोग अति महत्वपूर्ण पदों पर थे| उन्होंने कई मस्जिद बनवाए और ताजिये का जुलूस हर साल उनके यहाँ से निकलता था| होली के एक उत्सव में एक दलित बालिका ने जब उनपर परंपरा के अनुसार कीचड़ (या पानी) नहीं डाला तो समाजप्रेमी राजा ने बालिका से सवाल कर दिया| शिष्ट बालिका ने कहा- आप तो मेरे पिता तुल्य हैं, आप पर कैसे कीचड़ डालूंगी| इसपर खुश होकर बाबू वीर कुंवर सिंह ने वह इलाका उस बालिका के नाम कर दिया| आज भी वह इलाका "दुसाध बाज़ार" के नाम से जाना जाता है| बाबू वीर कुंवर सिंह द्वारा स्थापित आपसी एकता और भाईचारा आज भी वहां की सामाजिक-धार्मिक गतिविधियों में दिखती है, जब विभिन्न धर्मों और जाति के लोग मिलकर इसे मनाते हैं|
कई बार ऐसा लगता है कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में बाबू वीर कुंवर सिंह जी का योगदान जितना बड़ा है, देश के स्तर पर उन्हें उस प्रकार से याद नहीं किया जाता| देश में स्वतंत्रता आंदोलन की नींव रखने वाले इस अमर सेनानी को उनके योगदान और सम्मान के अनुरूप याद किये जाने की जरूरत है, ताकि नई पीढ़ी अपने इस नायक को सही ढंग से जान सके और प्रेरणा ले सके| 23 अप्रैल 2017 को हमने उत्तर प्रदेश के गोंडा जनपद में बाबू वीर कुंवर सिंह विजयोत्सव के 160 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष में उस दिन 160 दिए प्रज्वलित कर बाबू वीर कुंवर सिंह को श्रद्धांजलि देने का निर्णय किया है। यह हमारी तरफ से एक छोटी सी पहल है जिससे बाबू वीर कुंवर सिंह की शौर्यगाथा को जन जन तक पहुंचाया जा सके। साथ ही आप सब से यह निवेदन भी करना चाहूंगा कि 23 अप्रैल 2017 रविवार को पड़ रहा है और अधिकांश लोगों को उस दिन अवकाश होगा। यदि आप सब भी अपने अपने क्षेत्र में एकत्र होकर दीप प्रज्वलित करने का कार्यक्रम करें तो 1857 की क्रांति के असली नायक की शौर्य गाथा को स्थानीय लोगों के सहायता से फैला सकेंगे।
जय क्षात्र धर्म
बाबू वीर कुंवर सिंह अमर रहें
निवेदक
राहुल सिंह उज्जैन