05/12/2025
आज भारत एक तेज़ी से बदलते दौर से गुजर रहा है—राजनीतिक विमर्श बदल रहा है, सामाजिक समीकरण बदल रहे हैं, सूचना का स्वरूप बदल रहा है, और नागरिकों के अधिकारों व कर्तव्यों की समझ भी बदल रही है। ऐसे समय में डॉ. भीमराव आंबेडकर का परिनिर्वाण दिवस केवल श्रद्धांजलि का दिन नहीं, बल्कि आत्म-मंथन और नए संकल्प का अवसर है।
यह वह क्षण है जब बहुजन समाज को यह तय करना चाहिए कि आने वाली पीढ़ियों के लिए किस दिशा का चयन करना है—भ्रम या बोध, तकरार या तर्क, गुलामी या गरिमा।
डॉ. आंबेडकर की सीखों का मूल संदेश है—“शिक्षित बनो, संगठित बनो, संघर्ष करो।”
लेकिन आज की परिस्थितियाँ इस नारे को और भी व्यापक अर्थ देती हैं।
शिक्षा का अर्थ केवल डिग्री नहीं बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपनाना है। बहुजन समाज यदि आधुनिक भारत में मजबूती से खड़ा होना चाहता है, तो उसे ज्ञान को सबसे बड़ी पूंजी बनाना होगा। युवा पीढ़ी को यह प्रतिज्ञा लेनी होगी कि वह फेक न्यूज़, अंधविश्वास और जातिवादी प्रचार के बजाय सत्य, तर्क और तथ्य का मार्ग चुनेगी। आज सूचना का युद्ध चल रहा है—जो जागरूक है वही टिकेगा, जो भ्रमित है वही हार जाएगा।
दूसरी प्रतिज्ञा संगठन की होनी चाहिए। इतिहास गवाह है कि बहुजन तभी शक्तिशाली हुए हैं जब वे एकजुट रहे हैं। परस्पर जातिगत उप-भेद, राजनीतिक एजेंडों की खींचतान, और अनावश्यक विवाद समाज को कमजोर ही बनाते हैं। डॉ. आंबेडकर ने बंधुत्व को लोकतंत्र की आत्मा कहा था। वही बंधुत्व अगर बहुजन समाज में जीवित हो जाए तो कोई ताकत उसका मार्ग नहीं रोक सकती। संगठन केवल मंचों की भीड़ नहीं, बल्कि साझा दिशा, साझा मिशन और साझा चेतना का नाम है।
तीसरी प्रतिज्ञा संवैधानिक मूल्यों की रक्षा की होनी चाहिए।
आज कई तरह की वैचारिक आँधियाँ चल रही हैं—कुछ समानता को चुनौती देती हैं, कुछ स्वतंत्रता को, और कुछ न्याय को ही संदिग्ध बनाती हैं। बहुजन समाज को यह संकल्प लेना चाहिए कि वे संविधान को केवल किताब में नहीं, जीवन में उतारेंगे। समानता, गरिमा और अधिकार केवल अपने लिए नहीं बल्कि पूरे समाज के लिए सुरक्षित किए जाएँगे। लोकतंत्र कमजोर तब होता है जब नागरिक चुप हो जाएँ; बहुजन समाज को यह चुप्पी तोड़नी होगी।
चौथी प्रतिज्ञा आर्थिक आत्मनिर्भरता की होनी चाहिए।
नौकरी की प्रतीक्षा में पीढ़ियाँ गुजर जाती हैं, लेकिन कौशल और उद्यम आने वाले समय की असली शक्ति हैं। डॉ. आंबेडकर ने आर्थिक स्वतंत्रता को मानव स्वतंत्रता का मूल कहा था। बहुजन समाज को यह निश्चय करना चाहिए कि वह कौशल, व्यवसाय, तकनीक और सामूहिक आर्थिक मॉडल को अपनाएगा। जब अर्थशक्ति बढ़ती है, तभी राजनीतिक और सामाजिक शक्ति टिकती है।
पाँचवीं प्रतिज्ञा बहुजन महिलाओं को केंद्र में रखने की होनी चाहिए।
एक ऐसा समाज जो अपनी माताओं, बहनों और बेटियों को शिक्षा, सुरक्षा और नेतृत्व नहीं दे सकता, वह कभी ऊँचाई नहीं छू सकता। आंबेडकर स्त्री-स्वतंत्रता के सबसे बड़े योद्धा थे। बहुजन समाज को यह स्पष्ट और असंदिग्ध संकल्प लेना चाहिए कि स्त्री सशक्तिकरण विकल्प नहीं—आधार है।
छठी प्रतिज्ञा यह हो कि “जय भीम” केवल नारा न रह जाए, बल्कि चरित्र बन जाए।
इसका अर्थ है—ईमानदारी, सत्य, न्यायप्रियता और विचारशीलता को जीवन में स्थापित करना। आज कई स्थानों पर नारे तो उठते हैं, पर विचार गायब हो जाता है। परिनिर्वाण दिवस हमें याद दिलाता है कि आंबेडकरवाद व्यवहार में उतरे बिना समाज में परिवर्तन असंभव है।
अंत में, सातवीं प्रतिज्ञा संघर्ष की होनी चाहिए—परंतु संविधानसम्मत और अहिंसक संघर्ष की।
बहुजन समाज को अन्याय, भेदभाव, अपमान या अधिकारों के उल्लंघन पर मौन नहीं होना बल्कि संगठित और वैचारिक प्रतिरोध करना चाहिए। इतिहास हमेशा उन लोगों का साथ देता है जो सत्य और न्याय के पक्ष में खड़े रहते हैं।
6 दिसंबर डॉ. आंबेडकर का परिनिर्वाण दिवस हमें यह याद दिलाता है कि किसी महान व्यक्ति को सच्ची श्रद्धांजलि फूलों से नहीं, संकल्पों से दी जाती है। आज के भारत को वैचारिक परिपक्वता, सामाजिक सद्भाव, वैज्ञानिक दृष्टि और मजबूत लोकतांत्रिक भावना की ज़रूरत है। यह बहुजन समाज की जिम्मेदारी है कि वह इन मूल्यों को सबसे आगे बढ़कर निभाए।
यदि बहुजन समाज यह प्रतिज्ञाएँ ले ले—तो आंबेडकर का भारत केवल सपना नहीं, आने वाला यथार्थ बन जाएगा।