Prof. Shiva Jatan Thakur

Prof. Shiva Jatan Thakur Former Member Bihar Public Service Commission and Former Head Of the Department oF English Patna University Bihar

संविधान के अनुच्छेद 51 (क) के उप धारा (ज) में यह स्पष्ट आदेश दिया गया है कि प्रत्येक नागरिक का यह मौलिक कर्तव्य है कि वह...
09/04/2025

संविधान के अनुच्छेद 51 (क) के उप धारा (ज) में यह स्पष्ट आदेश दिया गया है कि प्रत्येक नागरिक का यह मौलिक कर्तव्य है कि वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद तथा अन्वेषण तथा अनुसंधान करने के लिए कृत संकल्प रहे।
पंरतु गत् एक दशक में उपरोक्त संवैधानिक मूल्यों और आदर्शों को तार-तार कर धर्मांधता की आड़ में केवल अंधविश्वास, ढोंग और पाखंड फैलाया जा रहा है। राम नवमी के दिन जब आदरणीय नरेंद्र मोदी जी श्रीलंका से वापस भारत लौट रहे थे, तब उन्होंने सोशल मीडिया पर यह लिखा कि "मैं दिव्य रामसेतु और प्रभु श्री राम का अलौकिक सूर्य तिलक का दर्शन कर अभिभूत हो गया"। "दिव्य" और "अलौकिक" शब्दों से देवत्व की आभा उत्सर्जित होती है जो दैविक दर्शन का समानार्थी है। परंतु अयोध्या के रामलला के ललाट पर सूर्य तिलक दैविक नहीं यांत्रिक प्रबंधन का प्रतिफल था। एक करोड़ 20 लाख रुपए की लागत से अयोध्या मंदिर के तीसरे तल्ले पर Reflector Box लगाया गया था। जिसमें पीतल के पाइप में चार अन्य लेंस लगाए गए थे जिसके द्वारा सूर्य की किरणें परावर्तित होकर मूर्ति के सिर पर 70 mm व्यास का गोला बना रहा था। इसी परावर्तित किरणों के भौतिक प्रकिया को गोदी मीडिया इसे दैविक चमत्कार बताते हुए उसे सीधे प्रसारित कर रहा था और दर्शकों को अंध विश्वास के महासागर में डुबोकर जनमानस को दिग्भ्रमित कर रहा था। भक्तगण जय श्रीराम के उद्घोष कर रहे थे।
उल्लेखनीय है कि कर्नाटक के दलित मूर्तिकार अरुण योगी राज ने अपने अपूर्व कला कौशल से रामलाल की मूर्ति तरासी थी। परंतु राम मंदिर अथवा उनके न्यास परिषद में दलित मूर्तिकार का ना तो कोई चर्चा है और ना हीं उन्हें न्यास परिषद का सदस्य ही मनोनीत किया गया।
स्मरणीय है कि मोदी सरकार ने न्यास परिषद में चार सदस्यों को मनोनीत किया जो सभी ब्राह्मण है उनमें से कुछ भारतीय प्रशासनिक सेवा के कई सेवानिवृत अधिकारी हैं। मोदी जी यदि चाहते तो भारतीय प्रशासनिक सेवा से निवृत दलित, महिला, अन्य पिछड़ा वर्ग और मुसलमान के अधिकारियो को भी न्यास परिषद में मनोनीत कर सबका साथ सबका विकास के अपने नारे को चरितार्थ करते। परंतु भारतीय जनता पार्टी पूर्णतः एक मनुवादी दल है जिसमें बहुजनों के लिए कोई स्थान नहीं है। यह भी एक विचारणीय प्रश्न है कि भाजपाई लोग "जय श्री राम का नारा" क्यों लगाते हैं ? जिसका उत्तर रामचरित मानस के उत्तर कांड की इन चौपाइयों में अंकित है :
“पूर्ण्य एक जग महू नहीं दूजा, मन क्रम बचन विप्र पद पूजा। सुनत सुधामय बचन राम के, हरष गहे पद कृपा निधान के।। “
अर्थात लंका विजय करने के बाद जब भगवान राम अयोध्या लौटे तब अपनी प्रजा को दिव्य ज्ञान देते हुए यह उपदेश दिया कि संसार में मन, क्रम, वचन से ब्राह्मणों के पैर की पूजा करने से बढ़कर कोई दूसरा अन्य पुण्य नहीं है। भगवान के मुख से अमृत तुल्य यह उपदेश सुनकर सभी भक्तों ने इस मूलमंत्र के लिए उनके पैरों में लिपटकर आभार प्रकट किया। स्पष्ट है कि प्रभु की भक्ति, सूख और समृद्धि की प्राप्ति का एकमात्र साधन है ब्राह्मण की चरण वंदना, उनको दक्षिणा और उनकी अर्चना।
प्रसंगवश यहां यह भी उल्लेख करना आवश्यक है कि भगवान श्री राम ने ही तपस्वी शंवुक का इसलिए वध किया था कि शूद्र होकर भी वह वेदोंच्चार कर तपस्या में लीन था। हिंदू ग्रंथों में शूद्रों को तपस्या करने, वेदाध्ययन और पूजा करने का अधिकार नहीं है। इसी वैदिक दर्शन के कारण भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद जी को ब्राह्मणों ने जगन्नाथ पुरी के गर्भ गृह में जाने से 18 मार्च 2011 को जबरन रोक दिया था, जिसपर राष्ट्रपति सचिवालय ने कड़ी आपत्ति दर्ज की थी। देश के तत्कालीन राष्ट्रपति को इतना बड़ा सार्वजनिक अपमान होने पर भी भाजपा सरकार ने जगन्नाथ पुरी के ब्राह्मणों के खिलाफ "अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989" के अंतर्गत अब तक कोई मुकदमा दर्ज नहीं किया है, और गिरफ्तारी की तो बात ही दूर।
सारांश यह है कि मनुवाद को बढ़ावा देकर भाजपाई लगातार अंधविश्वास को परोस कर बहुजनों को हिंदुत्व के सोम रस में डुबोकर उन्हें मदहोश रखते हैं, और उनके वैधानिक आरक्षण और गरिमामय जीवन जीने के अधिकार से उन्हें वंचित रखने के लिए सदा तत्पर रहते हैं।

वक्फ संशोधन विधेयक 2025 संसद में कल पारित हो गया है। इस संशोधन द्वारा वक्फ बोर्ड में महिला और दो गैर मुस्लिम सदस्यों को ...
06/04/2025

वक्फ संशोधन विधेयक 2025 संसद में कल पारित हो गया है। इस संशोधन द्वारा वक्फ बोर्ड में महिला और दो गैर मुस्लिम सदस्यों को शामिल किया गया है। उनके शामिल करने के संबंध में सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया है कि मोदी सरकार की नीति है कि "सबका साथ सबका विकास"। गैर मुस्लिम और महिला सदस्यों को बोर्ड में शामिल कर इसका धर्मनिरपेक्ष स्वरूप और समावेशी लक्ष्य को साधा गया है। सरकार का यह भी दावा है कि इस संशोधन द्वारा गरीब और "पासमांदा मुसलमान" (पिछड़ा वर्ग के मुसलमान) का अब बहुत शैक्षणिक और आर्थिक चमत्कारी विकास होगा।
परंतु आश्चर्य है कि समावेशी विकास की इस नीति को श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट और श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास के मामले में क्यों नहीं लागू की गई? केंद्रीय और राज्य अधिनियमों द्वारा गठित इन दोनों के 30 सदस्यीय न्यास परिषद में शामिल हैं - सर्व श्री नृर्पेंद्र मिस्र, अनिल मिश्र, चंपत राय, गोपाल दास, नागेंद्र पांडे, दीपक मालवीय, चंद्रमौली उपाध्याय, ब्रज भूषण ओझा इत्यादि। न्यास परिषद में केवल एक ही जाति विशेष के सदस्य को शामिल किया गया है जैसा उपरोक्त नाम से स्पष्ट है। न्यास परिषद में महिला, मुसलमान, राजपूत, कायस्थ, दलित, आदिवासी, पिछड़ा और अति पिछड़ा के एक भी सदस्य को शामिल नहीं कीया गया है। क्या समावेशी विकास का अर्थ है केवल मनु वादियों का विकास और बहुजनों का समूल विनाश? सरकार की नीति के अनुसार न्यास परिषद में भी महिला, मुसलमान, दलित, आदिवासी, पिछड़ा और अति पिछड़ों को प्रतिनिधित्व देना चाहिए था। परंतु श्री राम जन्मभूमि तीर्थ ट्रस्ट और श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास में उनका प्रतिनिधित्व बिल्कुल शून्य है। संशोधन विधेयक के पीछे सरकार का दूसरा तर्क यह है कि वक्फ बोर्ड के पास 872 लाख एकड़ जमीन है, जिससे गरीब और पसमांदा मुसलमान को अब तक कोई लाभ प्राप्त नहीं हुआ है। विधेयक पारित होने के बाद महिला और पिछड़े वर्ग मुसलमानों के लिए कल्याणकारी योजना शुरू की जाएगी, जिसके कारण उनके शैक्षणिक और आर्थिक विकास में चमत्कारी लाभ होगा।
उल्लेखनीय है कि दक्षिण भारत के मंदिरों के पास लगभग 10 लाख एकड़ जमीन है जो वक्फ बोर्ड के जमीन से बहुत अधिक है। फिर भी 10 साल की मोदी सरकार ने इन मंदिरों के 10 लाख एकड़ जमीन को महिला, दलित, आदिवासी, पिछड़ा और अति पिछड़ा वर्ग के शैक्षणिक और आर्थिक चमत्कारी विकास एवं कुशल प्रबंधन के लिए इन जमीनों का अभी तक अधिग्रहित क्यों नहीं किया है?
स्मरणीय है की श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास और श्री राम जन्मभूमि तीर्थ न्यास को गत् 5 वर्षों में उनकी आय तीनगुनी हो गई है। इन मंदिरों के पुरोहितों का वेतन प्रति माह 18000 से बढ़ाकर 32000 रुपए कर दिया गया है। श्री राम जन्मभूमि ट्रस्ट ने पिछले वर्ष 4 करोड़ रुपए आयकर दिया है। स्पष्ट है कि उपरोक्त दोनों मंदिरों की मोटी कमाई का लाभ केवल एक जाति विशेष को ही मिल रहा है। परंतु बहुजन समाज उससे पूरी तरह वंचित है। स्पष्ट है कि वक्फ बोर्ड विधेयक और मंदिर न्याय अधिनियम मोदी सरकार के दोहरा चरित्र, भेदभावपूर्ण नीति और अल्पसंख्यकों के लिए पीड़क के रूप में उजागर हुआ है।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि भाजपा केवल मनुवादी दल है। भोले-भाले जनमानस को धर्मांधता के सोम रस में डुबोकर भारतीय जनता पार्टी उन्हें मदहोश रख कर बहुजनों एवं अल्पसंख्यकों को उनके आरक्षण और वैधानिक अधिकारों से वंचित रखने के लिए षड़यंत्ररत है।

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