12/12/2018
"बिहार केसरी" Dr.Sri Krishna Sinha (श्रीबाबू) was among those who were "heavyweights in their own right and brought into political administration a texture of Nationalism, Federalism, Realism, and even some touch of pragmatic Socialism", and that he "lived Poor, died Poor and identified himself with the Poor."
काश की आज श्रीबाबू होते तो मुंगेर और दीघा(पटना) का पुल 10 वर्ष पहले ही बन गया होता।
विदित है कि बिहार केसरी के शासन काल में निर्मित राजेन्द्र सेतु, मोकामा का निर्माण मात्र 06 वर्षों में ही हो गया था। जबकि उस समय बड़ा-बड़ा जेसीबी और क्रेन नहीं होता था, इंजीनियर को एक फोन कॉल करने के लिये भी 3-3 दिन का इंतजार करना पड़ता था, चौड़ी सड़कें नहीं थीं जिस कारण पुल के स्टील गार्टरस को स्टीमर/जहाज से लाना पड़ता था । बावजूद इसके राजेंद्र पुल का निर्माण मात्र 06 वर्ष में पुरा कर लिया गया था।
क्या थे वो लोग और क्या था वह जज्बा,जोश और जज्बात !
"बिहार केसरी" श्रीबाबू ने बेगूसराय को "मिनी कलकत्ता" और "दूसरा टाटा" बनाने का सपना देखा था । इसी सोच के तहत विभिन्न तरह के दबाब के बावजूद उन्होंने इसे एक बेहतर सोच-समझ व दूरदर्शिता के साथ विश्वप्रसिद्ध इंजीनियर विश्वेश्वरैया के निर्देशन में इसे पटना के बजाय मोकामा-बरौनी के बीच निर्मित करवाया। इस पुल का शिलान्यास तत्कालीन प्रधानमंत्री महोदय ने व उद्घाटन तत्कालीन राष्ट्रपति महोदय ने किया था।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार राजेंद्र सेतु आजादी के बाद गंगोत्री से गंगासागर के बीच गंगा नदी पर निर्मित, यह प्रथम रेल सह सड़क पुल है।
इस पुल के निर्माण से उत्तर भारत, विशेषकर उत्तर बिहार व पुर्वोत्तर के राज्यों के करोड़ों लोगों का दक्षिण भारत से सीधा सड़क व रेल संपर्क स्थापित हो सका था। इसी पुल के निर्माण के साथ बरौनी में रिफाइनरी, फर्टिलाईजर, थर्मल, डेयरी, गढहरा यार्ड, बरौनी औद्योगिक क्षेत्र, एनएच-28 & 31 इत्यादि के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ था।